पद्मश्री पंडित श्यामलाल ने अटलजी के साथ अनुभवों को किया साझा…बताया..जाजोदिया धर्मशाला में रूके थे भारत रत्न

  बिलासपुर—पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी करोड़ों भारतीयों के दिल में जगह बनाकर हमेशा हमेशा के विदा हो गए। खबर मिलते ही देश के साथ बिलासपुर शहर भी सन्नाटे में डूब गया। निधन की खबर मिलते ही..क्या कांग्रेस..क्या भाजपा और क्या आम और क्या खास सभी अवाक हो गए। एक बार तो लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा हमेशा के लिए दूर चले गए हैं। बड़े वरिष्ठों ने इस दौरान उनके बिलासपुर प्रेम को लेकर जमकर चर्चा की। इन्ही बड़े वरिष्ठों में पद्मश्री पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी भी हैं। जिन्होने भारत रत्न अटल को ना केवल करीब से देखा बल्कि उनके साथ समय भी बिताया। बतौर पत्रकार कवर भी किया। बिलासपुर में अटल के खासे करीब पंडित श्यामलाल ने निधन पर दुख जताया। उन्होने कहा अपने पत्रकारिता के समय ही महसूस हो गया था कि अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म किसी बड़े उद्देश्य के लिए हुआ है। पद्मश्री ने बताया कि अटल सादगी और सरलता की मूर्ति थे। उन्हें बिलासपुर से गहरा लगाव था।
                   अटल के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए पद्मश्री पंडित श्यामलाल ने कहा कि भारत रत्न अटल बिहारी से पहली बार साल 1951 में मुलाकत का अवसर मिला। अटल जी जनसंघ की स्थापना को लेकर देश भ्रमण में थे। इसी दौरान उनका बिलासपुर भी आना हुआ। उन्होने स्थानीय जाजोदिया धर्मशाला में अपना ठिकाना बनाया। अपने साथ एक थैला और होलडाल रखा था। होलडाल को बिछाया और आराम की मुद्रा में बैठ गए।
             पंडित श्यामलाल ने बताया कि इस दौरान उनके साथ 11 सदस्य थे। उनके मिशन में बतौर 12वें सदस्य मैं भी शामिल था। श्याम लाल ने बताया कि गाँधी जी हत्या के आरोप के चलते उन दिनों आरएसएस विचारधारा से लोग कन्नी काट रहे थे। नुकसान की भरपाई करने जनसंघ स्थापना मिशन चलाया गया। बाजपेयी भी अभियान के हिस्सा बने। आरएसएस विचारधारा के कारण उन्हें भी तकलीफ थी।
        पद्मश्री श्यामलाल ने बताया कि अटल जी सादगी और सरलता की मूर्ति ते। उनका बिलासपुर कई बार आना हुआ। उन्होंने बिलासपुर में अपने फ़टे कपड़े को सिलवाने का आग्रह किया था । उनका कुर्ता किनारे से फट गया था। कालर भी फटा हुआ था। कुर्ता सिलवाया..लेकिन दूसरा कुर्ता पहनना मुनासिब नहीं समझा। यद्यपि कालर को नहीं सिला जा सका।
                श्यामलाल के अनुसार एक बार अटल बिहारी वाजपेयी शादी समारोह में शामिल होने बिलासपुर आए।  लोगों ने उनसे कार में विवाहस्थल तक चलने को कहा। लेकिन वाजपेयी ने निवेदन को ना केवल ठुकराया बल्कि पैदल चलकर विवाह स्थल तक पहुंचे। फक्कड़ मिजाजी बाजपेयी ने साधारण लोगों की तरह रहना उचित समझा।
                श्यामलाल ने वाजपेयी से जुडे एक संस्मरण सुनाया। उन्होने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी को बिलासपुर से नागपुर जाना था। मैं भी उनके साथ पहुंचाने रेलवे स्टेशन गया। ट्रेन आने में कुछ देरी थी। किसी ने उन्हें बैठने के लिए कुर्सी लाया। लेकिन वाजपेयी ने दो टूक कहा कि मैं बैठू और लोग खड़े रहे..अच्छा बात नहीं है। उन्होने कुर्सी को किनारे रख सबके साथ ट्रेन का इंंतजार किया। गाड़ी आने के बाद नागपुर चले गए। चूंकि बिलासपुर में रिपोर्टिंग के दौरान लिखते रह गया। भाषण का आनन्द नहीं मिला तो उनके साथ मैं रायपुर चला गया। वहा जाकर मेरा पेट भरा। भाषण सुनने के बाद बिलासपुर लौटा।
                चतुर्वेदी के अनुसार वाजपेयी जी का भाषा और शब्दो पक गजब का नियंत्रण था। जादुई शक्ति थी …उनकी भाषण कला में। पद्मश्री ने बताया कि अपनी पुस्तक “भोलव भोलाराम बनिस” को लेकर वाजपेयी जी के पास गया। किताब भेंट किया। किताब की दूसरी प्रति में उन्होने अपना संस्मरण लिखा। आज भी सुरक्षित है। उसे देखने के बाद मन गदगद हो जाता। उनके जाने के बाद भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा खालीपन आ गया है। आने वाले 100 साल तक इस खालीपन को भरना नामुमकिन है।

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