आज बालक श्रीकृष्ण की नहीं…योगीराज…परामक्रमी अर्जुन सखा की जरूरत…कृष्ण ने ही बताया था राष्ट्र सर्वोपरि

बिलासपुर(पाठक की कलम से)—जन्माष्टमी पर पूरा देश श्रीकृष्णमय हो जाता है। श्रीकृष्ण को हम सबसे ज्यादा मानते हैं। लेकिन हम श्रीकृष्ण को जानते कितना हैं..यह प्रश्न आज के संन्दर्भ मेें बहुत ही प्रासंगिक है। यह एक बड़ा प्रश्न है…। यही मौका है कि इसे जानें। जानकार लोगों को खुशी होगी कि भगवान के अवतार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी लोग पर 125 वर्ष गुजारे।
                            हमें जिस श्रीकृष्ण के बारे में सबसे ज्यादा मालूम है…वह लगभग आठ वर्ष के थे। श्रीकृष्ण के बारे में ज्यादातर कथाएं, ज्यादातर बातचीत, उनका रास, उनका प्रेम, उनकी शरारत, जिसकी बात पूरी दुनिया सबसे ज्यादा करती है।  वह केवल आठ साल की अवस्था तक की है।
                                           कहने का मतलब आज जितने लोग कृष्ण को जानते हैं…वह कहीं से भी पूरा नहीं है। ऐसा कर हमने श्रीकृष्ण को समग्र रूप से नहीं  जानकर ना केवल अपने साथ बल्कि भगवान के साथ भी न्याय नहीं किया है। श्रीकृष्ण जो थे वह हम गाते नहीं, श्रीकृष्ण ने जो किया उसे हम समग्रता से बताते नहीं। ऐसा कर हम जाने अन्जाने बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। श्रीकृष्ण ने जो हमसे चाहा कि हम करें…लेकिन हम वैसा करते नहीं हैं।
             हमारा भला हो, हमारे समाज का भला हो। उसके लिए उन्होंने जितने सिद्धांत दिए, जितना अध्ययन किया, हम वैसा श्रीकृष्ण के लिए कुछ नहीं करते। बस नाच लिए, गा लिए, श्रीकृष्ण के भजन हो गए, लल्ला की पैजनिया बज गई, बस हम इतना ही जानते हैं।
क्या है कृष्म का मूल स्वरूप
             तो फिर क्या है कृष्ण का मूल स्वरूप? श्रीकृष्ण का मूल स्वरूप योगीराज का है। जब श्रीकृष्ण आठ साल के  बालक थे…उस समय उन्होने नाचा, गया,बांसुरी बजाया..शरारतें कीं, लेकिन उसके बाद वैसा कुछ कभी नहीं किया…? क्या इस पर किसी ने ध्यान दिया। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी ग्रंथों में नहीं है। लेकिन लोगो को कौन समझाए..कि श्रीकृष्ण ने इससे आगे भी जनहित में कई लीलाएं की हैं।
कितनी जानकारी है लोगों को
                       श्रीकृष्ण के बालपन के आठ  साल बाद लोगों को बस इतनी जानकारी है कि उन्होने महाभारत में नेतृत्व किया। अर्जुन के सारथी बने। गीता उपदेश दिया। शायद जनमानस को इतनी ही जानकारी है।
                    क्या लोगों को मालूम है कि श्रीकृष्ण बहुत बड़े ज्योतिषी थे। श्रीकृष्ण गो-पालन, कृषि, आयुर्वेद ज्ञान के बहुत बड़े खजाना थे। श्रीकृष्ण ने ही  सबसे पहले भगवान गणेश और मां सरस्वती की आराधना की परम्परा को जन्म दिया। रंगों, फूलों का उन्हें वृहद ज्ञान था। कृष्ण कई राग रागिनियों के जन्मदाता भी थे।
समय पराक्रमी श्रीकृष्ण का
                                              हमें अपने युग के हिसाब से अपने देवता की पूजा करनी चाहिए। हमारे देवता की प्रतिमा हमारे युग के हिसाब से होनी चाहिए। इस समय  जिस संकट से हिन्दुस्थानी गुजरा..निश्चित रूप से संघर्षमय है। हमारी लड़ाई केवल धन, आराम तलब वाली जिन्दगी से ही नही। बल्कि हमारी लड़ाई इस वक्त अपने अस्तित्व सभी है।
          हिन्दुस्थानियों की लड़ाई अपने अस्तित्व के लिए है। भारत के अस्तित्व के लिए है। हमारे लिए हमारे पड़ोसी देश ही हमारे लिए खतरा हैं। पूरे विश्व में कई देश हमारे लिए खतरा बने हुए हैं। हमें फिर योगीराज श्रीकृष्ण की जरूरत है। इस समय हमें नाचने-गाने वाले श्रीकृष्ण की जरूरत कम है। हालांकि जीवन के लिए यह भी आवश्यक है।  लेकिन कृष्ण का योगीराज स्वरूप हमें शक्ति देता है। जिंदगी जीने का मार्ग बताता है।

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