आज शिक्षक दिवस पर शिक्षकों की चीत्कार सुनने वाला कोई नहीं…औपचारिकता और रश्म अदायगी मात्र रह गया गुरु गरिमा दिवस

अति पिछड़ी जनजातियो ,शिक्षक भर्ती , विशेष छूट, शिक्षाकर्मियो,अनुकंपा नियुक्ति,राहत,नहीं,छत्तीसगढ़,शिव सारथी,क्रमोन्नति/समयमान वेतनमान, प्रमुख सचिव गौरव द्विवेदी,छग सहायक शिक्षक फेडरेशन,बिलासपुर(शिव सारथी/सहायक शिक्षक)।आज पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिवस याने शिक्षक दिवस है सही मायने में आज का दिन गुरु को गुरु दक्षिणा देने और उसे मान सम्मान देने का दिन है न कि उसे शाल श्रीफल देकर औपचारिकता निभाने का दिवस है आज सिर्फ छग प्रदेश ही नही वरन पूरा देश की राज व्यवस्था शिक्षकों का शोषण करने और उसे मात्र प्रताड़ित करने का काम कर रहा है ।

यह कहना है छग मुख्यमंत्री गौरव अलंकरण से सम्मानित शिक्षक और संगठन नेता शिव सारथी का जिन्होंने प्रदेश के शिक्षकों की आभाव भरी जिंदगी को न सिर्फ देखा है बल्कि खुद जिया भी है वह वक्त बड़ा कठिन होता है जब शिक्षको की सारी अहर्ताएं रखने के बावजूद कोई भी राज्य शासन इन्हें पैरा शिक्षक की श्रेणी में रखता है और कई-कई महीनों की परिश्रमिक से वंचित रखकर उनके जीवन को नासूर बनाता है।

वह क्षण भयावत होता है जब दो तीन महीने से वेतन के अभाव में शिक्षक परिवारिक आर्थिक परिपूर्ति के लिए अपनो से मुँह छिपाते समय उसका बच्चा किसी चीज की मांग करता है और रुहासि मन से वह अपने को इनकार करता है।

और अगर कभी शासन की इच्छा शक्ति से उसके किसी समस्या का समाधान निकाला भी जाता है तो वह आधा अधूरा ताकि वह शिक्षक जीवनभर अभाव और संघर्ष में जीता रहे और अपने कर्तव्य परायणता से बैमानी करता रहे क्या यही है।

गुरु की गुरु दक्षिणा या शिक्षक के सम्मान का दिवस अगर शासन और समाज शिक्षक को उसके राष्ट्र निर्माता के नाम और कर्म के लिए सम्मानित करना चाहता है तो उसके समस्याओ का अंत कर दे फिर देखे उस गुरु की कार्य क्षमता और उसकी निपुणता तब यह समाज कभी यह शिकायत नही करेगा कि शिक्षक का कर्तव्य उत्कृष्ट नही है ।

आज के इस दिवस पर शासन सहित इस सभ्य समाज को मैं यह बताना चाहता हूँ कि किसी भी देश या राज्य का सर्वांगीण विकास उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर होता है आज हम स्वच्छता, राष्ट्रवादी,समाजवादी,ईमानदारी,की कोरी परिकल्पना करते हुए कार्यक्रम के बहाने व्यवस्था सुधारने की बात करते है जो कि वास्तव में स्कूल की पाठचर्या है।

जिसे शासन और समाज को समझना होगा तथा शिक्षको के मान सम्मान के पहले उसकी समस्या को निराकृत करना श्रेष्ठकर होगा क्योंकि अगर अच्छे समाज की परिकल्पना को सार्थक करना है तो निश्चित ही शिक्षकीय व्यवस्था के साथ शिक्षक की समस्या की व्यवस्था भी अतिआवश्यक होता है जिससे मुँह छुपाये लोग खड़े है और शिक्षा के माध्यम से अच्छे समाज और राष्ट्र की कल्पना को सकार करना चाहते है।

जो बैमानी है कहते है सभ्य और विकसित समाज व राष्ट्र के लिये पाठशाला की मजबूत नीव जरूरी है और सबसे ज्यादा जरूरी पाठशाला की बुनियाद कहे जाने वाले प्राथमिक शाला की जबकि आज सबसे बदहाल यही प्राथमिक विद्यालय और उसके आचार्यो की है जिसे जानना समझना और निराकृत करना होगा वरना बिना इसके सब निर्थक होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *