उत्सव और सोशल मीडिया की सक्रियता

Social media buttons

बिलासपुर-भारत में सोशल मीडिय़ा का प्रचलन क्रांतिकारी घटना क्रम से कम नहीं है। लोगों में इसका प्रयोग अप्रत्याशित ठंग से बढ़ा है। अभिव्यक्ति का यह अब तक का सबसे सशक्त माध्यम जो है। सोशल मीडिया का से लोगों में अधिकारों को लेकर चेतना आयी है। लेकिन कर्तव्यबोध बहुत पीछे छूट गया है। लोग धुंआधार लिख रहे हैं..खूब लिख रहे हैं..क्या लिख रहे हैं…उन्हें ही नहीं पता है…लेकिन बिनाकामा और फुल स्टाप लिख रहे हैं।

रतनपुर घटनाक्रम को अभी भी लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया है। कुछ साल पहले मुम्बई में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था। उसे तो अब लोगों ने भुला ही दिया है। लेकिन रतनपुर के ताजा तरीन मामले को लोग शायद ही अभी भूले हों। बावजूद इसके लोग लिख रहे हैं। बिना सोचे समझे लिख रहे हैं..किसकी पगड़ी उछाल रहे हैं..इससे किसी को लेना- देना नहीं है। क्योंकि सोशल मीडिया ने नव- लिखाड़ों की लम्बी जमात तैयार कर दिया है।

इसमें कोई शक नहीं कि सोशल मीडिया बहुत सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है। जैसा ट्रेंड चल रहा है उसमें खबरों को तलाशना भूंसे में सुई जैसा है। अब इसे धमकी और रसूख का औजार बना लिया गया है। कुछ इसी तरह का एक मामला फिर देखने को मिला है। किसी ने शहर की अव्यवस्था पर उंगली क्या उठाई…दूसरी तरफ से धमकी भरा जवाब आ गया…गुरू हो..गुरू की तरह रहो। जाहिर सी बात है कि ऐसा लिखने वाला कोई सामान्य व्यक्ति तो होगा नहीं। लेकिन इतना तय है कि जिसे लिखा गया वह सामान्य नहीं तो असामान्य से कमभी नहीं होगा। क्योंकि लिखने वाले ने कहा है कि गुरू हो..गुरू की तरह रहो। सभीको मालूम है कि हमारे समाज में गुरू को सदियों से सम्मान का दर्जा प्राप्त है। इसलिए उसका असामान्य होना कोई नई बात नहीं है।

हो सकता है कि किसी का काम किसी के लिए पीड़ादायक हो…लेकिन यह  काम किसी के लिए ठंडी बयार साबित हो सकता है…। हमेशा देखने में आया है कि जब भी कोई व्यक्ति व्यवस्था पर उंगली उठाता है तो शहर में प्रतिक्रिया वादियों की बाढ़ आ जाती है। धऱना, प्रदर्शन, हड़ताल,चक्काजाम किसी को पसंद नहीं है…। ना चाहते हुए भी लोगों को इसका सामना करना पड़ता है। यह अलग बात है कि लोग कुछ कहते नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में यह बाते सामान्य दर्जे में गिनी जाती हैं। लेकिन सोशल मीडिया उस समय बहुत ज्यादा पैनिक नज़र आया जब नेता के जन्मदिन पर एक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर लिख दिया कि गुरू हो गुरू की तरह रहो।

देखने में आता है कि लोग शौर्य और रसूख दिखाने के लिए बड़े बड़े आयोजन करते हैं.. आयोजन में लाखों रूपए खर्च होते हैं। इस दौरान किसी की सुविधाओँ और असुविधाओं को बिलकुल ख्याल नहीं रखा जाता है। इस बात की भी नहीं कि सार्वजनिक स्थल का आयोजन किसी के लिए परेशानियों का कारण भी हो सकता है।

तीन महीने पहले ही बिलासपुर में एक नेता का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। मुख्य मार्ग जाम हो गया। नन्हें बच्चों को पूरे चार घंटे तक चिलचिलाती धूप में नेता जी के जन्मदिन पर अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा। उन्हें जो समय स्कूल में गुजारना चाहिए था…लेकिन बंद बसो में गुजर गया। बच्चों के परिजन और अन्य राहगीर कार्यकर्ताओं के सामने बेबश नजर आए। तात्कालीन समय यह बेबशी किसी को नहीं दिखाई दी। नेता जी को लोगों की बेबशी दिखने का सवाल ही नहीं उठता…। लेकिन एक सहृदय आत्मा ने जब इसे अपने फेसबुक पर पोस्ट क्या किया तो जैसे सोशल मीडिया मे तूफान आ गया। फिर क्या था पोस्ट पर टिप्पणिय़ों की बौझार होने लगी।

एक व्यक्ति ने तो इतना लिख दिया कि गुरू हो..गुरू की तरह रहो..राजनीति मत करो…अन्यथा….। समझा जा सकता है कि उसने ऐसा क्यों लिखा होगा। समझना जरूरी है कि क्या पोस्ट करने वाले ने कुछ गलत लिख दिया। जिस पर नेताजी के प्रतिनिधि गरम हो गये… सच्चाई यह है कि उस दौरान सड़क पूरी तरह से जाम था। बच्चे रो रहे थे…लेकिन उस मंजर को देखने के बाद किसी का दिल नहीं पिघला..पिघला तो उस व्यक्ति का जो जिसे नेताजी के प्रतिनिधि ने गुरू कहा है…जिसे बच्चों का दर्द दिखाई दिया…तीन महीने बाद ही सही..लेकिन उसने लिखा कि..रसूख जमाने के लिए क्या सड़क ही था…जन्मदिन कहीं और मनाया जा सकता था। इससे बच्चों और उनके परिवार और अन्य लोगों को परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता। लोकप्रिय नेता के बंदे को यह सब पसंद नहीं आया और धमकी दिया कि गुरू हो…गुरू की तरह रहो। कुल मिलाकर उसने गुरू की औकात नापने का प्रयास किया। क्या यह उचित है..क्या यह सोशल मीडिय़ा के शान के अनुकूल है…इस पर सबको विचार करना होगा।

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