मेरा बिलासपुर

कहीं गुम न हो जाए ” ददरिया ” ?

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बिलासपुर  ( प्रकाश निर्मलकर ) । – छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का राजा कहे जाने वाला ददरिया गीत वैसे तो शहरी परिवेश में बहुत पहले ही दम तोड़ चुका है । लेकिन ग्रामीण अंचलों में भी अक्सर बारिश के मौसम में गूंजने वाला यह दर्द और प्रेम का गीत अपनी अंतिम सांसे ले रहा है। ददरिया जिसके नाम में ही ही दर्द छुपा है। छत्तीसगढ़ में  में सर्वाधिक गाया जाने वाला लोकगीत  रहा है । यही कारण है कि इसे छत्तसीगढ़ी लोकगीतों का राजा कहा जाता है। यह गीत इतना कर्णप्रिय व मधुर होता है कि इसे दूर से ही सुनकर लोग इसकी ओर खींचे चले आते हैं और पूरी तल्लीनता  के साथ सुनते हैं।

खास बात यह है कि इस छत्तसगढ़ी लोकगीत को गाने या सीखने के लिए विशेष तालीम या रियाज की आवश्यकता नहीं है। छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास और छत्तीसगढि़या के भोले पन व मधुर स्वर का बखान करते हुए  ददरिया एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक गाते- गाते पहुंचता रहा  है। पहले के लोग जब पगडंडियों पर या आम रास्ते पर बैलगाड़ी पर सफर करते थे मनोरंजन के लिए अक्सर ददरिया गाते थे। पगडंडियों में तो अक्सर इसकी स्वर- लहरियां सुनाई देती थी। ग्रामीण अंचलों में मजदूर खेती किसानी के कार्य करते करते ददरिया गाया करते थे। खास कर बरसते पानी में रोपाई या निंदाई के कार्य में लगे मजदूर ददरिया सामूहिक रूप से गाते थे । लेकिन आधुनिकता के इस दौर में ददरिया अंतिम सांसे ले रहा है।
मैनें ग्रामीण अंचल के कुछ बुजुर्गों से से भी बात कि तो उनका कहना है कि आज की युवा पीढ़ी लोकगीतों से पूरी तरह से अनजान है। वे न लोकगीत सुनते और ना ही इसके बारे में जानते हैं तो गाना तो दूर की बात है। वे कहते हैं कि ग्रामीण अंचलों में भी ददरिया लगभग खत्म ही होने के कगार पर  है।  कभी कभी कुछ लोग मन बहलाने के लिए ददरिया गा लेते हैं। उन्होने चिंता भी जताई कि अब शायद ददरिया का दर्द कोई महसूस भी नहीं करता है ? क्योंकि नई पीढ़ी तक यह पहुंच ही नहीं पा रही है।

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ददरिया ना सिर्फ ग्रामीण अंचल अपितु छत्तीसगढ़ की पहचान है। इसे जिंदा रखने सरकार भी कोई विशेष रूचि नहीं दिखा रही है। कहने को तो छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है लेकिन इसके प्रोत्साहन के लिए कोई खास पहल सरकार की ओर से नहीं क जा रही है। पाठ्यक्रम में शामिल करने मात्र से छत्तसीगढ़ी को बढावा नहीं मिल सकेगा, जो स्पष्ट रूप से देखा भी जा सकता है । ददरिया और अन्य लोकगीतों को बढ़ावा देने के लिए स्कूल स्तर से लेकर काॅलेज और फिर राज्य स्तर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं और कार्यक्रमों का आयोजन नियिमत रूप से करना चाहिए। जिससे युवा पीढ़ी में इसके प्रति रूझान आये और एक बार फिर ददरिया या अन्य लोकगीतों की गूंज हर तरफ सुनाई दे। वर्ततान में सिर्फ आकाशवाणी के माध्यम से ही लोकगीतों का आनंद मिल पाता है। अब जरूरत है तो इस आई.टी. और सोसल मीडिया के दौर इसके कदम से कदम मिलाते हुए इन लोकगीतों के प्रचार – प्रसार की ….। जिससे इसकी गूंज देश के साथ साथ विदेशों में भी सूनाई दे।
जिस तरह सरकार अपनी विकास गाथा का गुणगान करने और प्रचार प्रसार करने के लिए रेडियो , टी.वी चैनल्स और सोशल मीडिया का उपयोग करती है उसका 5 प्रतिशत भी छत्तीसगढ़ की लोककला के प्रचार प्रसार व उत्थान के लिए उपयोग करे तो शायद दम तोड़ रहे छत्तीसगढ़  के लोकगीतों को नई उर्जा मिले और क्या पता बरसों से ग्रामीण और वनांचलों तक सिमित इन लोकगीतों को नई उंचाई मिल जाए।
बहरहाल ददरिया का दर्द या तो लोककलाकर महसूस कर रहे हैं या फिर कुछ छत्तीसगढ़ी लोककला प्रेमी …….आवश्यकता है तो इसे जिंदा रखने के लिए कुछ उचित और ठोस कदम उठाने की….।.

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