मेरा बिलासपुर

” गाँधी तेरे क़दमों के निशां अब तक मिटे नहीं ……”

mahatma_gandhi

            बिलासपुर । छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और नौजवानों की बेहतरी के लिए अपनी मौलिक सोच को लेकर मित्रों के बीच चर्चाओँ में रहने वाले रविशंकर सिंह का मानना है कि महात्मा गाँधी का रास्ता आज भी कारगर और बेहतर है। उनके रास्ते पर चलकर ऐसा समाज बनाया जा सकता है, जिसमें अमीरी और गरीबी के बीच का फासला काफी कम हो सकता है।अपनी इन भावनाओं को उन्होने सोशल मीडिया पर व्यक्त किया है। जिसे हम जैसा – का – तैसा प्रस्तुत कर रहे हैं….। इस उम्मीद के साथ कि – ऐसे मुद्दों पर भी लोगों की राय सामने आनी चाहिए….। गाँधी जयंती पर तो लोग गाँधी जी के बताए रास्ते पर चलने की कसम एक बार फिर उठाएंगे …..। और वह दिन भी ( 2 अक्टूबर ) नजदीक ही आ रहा है , जब  गाँधी जी की बातें और उनकी बाते करने वाले सुर्खियों में रहेंगे । क्यूं न उसके पहले  इस पर कुछ बात होनी चाहिए…….।  ( सीजीवॉल )

ravi singh

रविशंकर सिंह ने जो लिखा…..  

इस देश में अक्टूबर आते आते गांधी और उनके खादी की चर्चा जोड़ पकड़ लेती है। दो अक्टूबर गांधी जी का जन्मदिन है और अक्टूबर के महीने में ही खादी के कपड़ों पर सरकार सब्सिडी देती है। इस देश का ये दुर्भाग्य ही है, कि न तो लोगों ने गांधी को ठीक से समझा ….. और न ही खादी के उनके आंदोलन को समझा गया !

असल में देश को मिली राजनैतिक आज़ादी को गाँधी जी ने अधूरी आज़ादी माना था। उनका सपना पूर्ण स्वराज का था, जिसे वो देश के आर्थिक आज़ादी से जोड़ कर देखते थे ।

खादी ग्रामोद्योग को मिला हाईकोर्ट का सहारा...

खादी, आर्थिक आज़ादी की लड़ाई का हथियार भी था और हमारी आत्मनिर्भरता का सूचक भी। गांधी कभी बड़े बांध और उद्योगीकरण के हिमायती नहीं रहे। वो तो छोटे बाँध, लघु और कुटीर उद्योग एवं सहकारिता कृषि के सहारे देश की प्रगति चाहते थे।

एक ऐसे भारत का सपना, जहाँ हमारी तरक्की की गति धीमी जरूर होती, पर अमीरी और गरीबी का फासला बहुत कम होता। गांधी जी के आर्थिक रास्ते से आगे बढ़ने से लोग खूब अमीर भले न हो पाते, पर ये कभी संभव नहीं था, कि कोई अपनी गरीबी के कारण भूख से मर जाता !

पर गाँधी के राजनैतिक अनुयायियों ने, एक मिश्रित अर्थव्यवस्था पर आगे बढ़ने के निर्णय के साथ, गांधी की खादी और आर्थिक आज़ादी के सपने को सन् सैंतालिस में ही छोड़ दिया था !

इस नए आर्थिक रास्ते पर बढ़ते जाने का नतीजा ही था, कि अस्सी के दशक तक आते आते हमें अपना टनों सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़ा और उदारीकरण के लिए दरवाज़े भी खोलने पड़े।

असल में गांधी और उनकी खादी को उनके तथाकथित अनुयायिओं ने अब तक इसलिए कायम रखा, क्यों कि ये उनके वोट बटोरने के सबसे बड़े माध्यम थे !

तभी तो ये कहा जाता है, ” गाँधी तेरे क़दमों के निशां अब तक मिटे नहीं, क्यों कि कोई उस पर अब तक चला नहीं ” !

इस सच को जान लें, ….. आज नहीं तो कल, हमें गांधी के आर्थिक रास्ते ही जाना होगा ….. पर ये भी सच है, कि बिना सब कुछ गंवाये, हम इस सच को मानने वाले भी नहीं !

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