मेरा बिलासपुर

क्या ग्रामीण नहीं चाहते विकास… ? सेमरताल आदर्श गांव की कथा

VIDHAYAK GAON

( भास्कर मिश्र की रिपोर्ट ) बिलासपुर शहर से महज 13 किलो मीटर दूर एक ऐसा गांव जिसके पास आदर्श ग्राम का तमगा हासिल है। लेकिन सुविधा के नाम पर यहां आदर्श गांव जैसा कुछ भी नही है। हम बात कर रहे हैं बेलतरा विधानसभा के सेमरताल गांव की। यहां के लोग आज भी सडक, पानी, बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। इस गांव को बेलतरा विधायक बद्रीधर दीवान ने गोद लिया है। गांव के विकास का जिम्मा भी उन्ही का है। ग्रांम पंचायत के सरपंच और सचिव की माने तो विकास कार्य चल तो रहा है लेकिन गांव वाले ही इसका लाभ नही लेना चाहते है। सुनकर कुछ अजीब लगता है।

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           आजादी के पहले गांवो की कल्पना हम कभी कभी कल्पना जरूर करते होंगे कुछ उसी कल्पना के अनुरूप सेंमरताल गांव है। आजादी के बाद यहां बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। यदि है भी तो चन्द मीटर की सड़कें वह इसलिए हैं कि किसी मंत्री या विधायक का कार्यक्रम यहां कुछ दिनों या महीने पहले हुआ था। विकास के नाम पर यहां सड़कों के पुराने अवशेष भी दिखाई दे जाते हैं। जो काफी टूटी फूटी और जर्जर स्थित में है। जिस पर चलना उंट की सवारी करने जैसे है। उससे कहीं अच्छा गांव की पगडंडी है।

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             ग्राम पंचायत सेमरताल में पानी निकासी की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। गलियों में घर का गंदा पानी बहता है। जो बीमारियों को खुला निमंत्रण देते हैं। नालियों का निर्माण भी नही हुआ है काम सी सी रोड जरूर है लेकिन उसने नाली का शक्ल ले लिया है। मुख्यमंत्री गौरवपथ योजना अन्तर्गत बनी सड़क भ्रष्टाचार की कहानी कहते हैं। सडक निर्माण मे खर्च की गयी राशि कम से कम काम देखने के बाद मेल नहीं खाता है। ऊपर से सरपंच का दावा है कि गांव मे सड़को और नालियो का निर्माण कराया गया है। शौचालय भी बनकर तैयार हो चुका है। लेकिन ग्रामीणों की लापरवाही से सड़कें और शौचालय की स्थित काफी बुरी हो गयी है।    SADAK                       सेमरताल की आबादी तीन हजार से अधिक है। गांव में मुख्यमंत्री गौरव पथ योजना के अन्तर्गत बन रही सड़कों की गुणवत्ता भी ठीक नहीं है। डब्लू बी एम सड़कों पर चलना अपनी जान को जोखिम में डालने जैसा है। गांव में तालाब हैं। शासन का नहीं पुरखों का बनवाया हुआ। लेकिन यहां पचरी का कोई नामो निशान नहीं है। पचरी निर्माण के लिए अस्सी हजार रूपए खर्च भी हो चुके हैं।

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         सेमरताल में निर्मल ग्राम योजना अंतर्गत शत प्रतिशत शौचालय का निर्माण किया जा चुका है। वास्तविकता कुछ अलग ही है। योजना के तहत यहां कुल संख्या के मात्र तीस प्रतिशत शौचालयों का ही निर्माण हुआ है। उसकी भी हालत जर्जर हैं। गांव के सचिव सचिव का कहना है कि ग्रामीण शौचालय का उपयोग नहीं करते हैं। जिसके चलते सभी शौचालय जर्जर स्थिति में आ गये हैं। इसलिए अब और शौचालयों का निर्माण नहीं किया जा रहा है। नाली निर्माण को लेकर भी सचिव महोदय का ऐसा ही कुछ कहना है।

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           सेमरताल गांव में बिजली के तार पैदल चलने वालों के सिर को छूने को बेताब रहते हैं। अब तक तार के चपेट में आने से कई पालतू जानवरों की मौत हो चुकी है। सरपंच से लेकर बिजली विभाग के कई शिकायतों के बाद भी उदासीन हैं। शायद किसी ग्रामीण के मौत के बाद ही उनका ध्यान इधर जाएगा।

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           आजादी के 65 साल से अधिक बीत चुके हैं। सरकार का दावा है कि प्रदेश में विकास की गंगा बह रही है। यह गंगा कहां बह रही है यह तो नहीं मालूम लेकिन सेमरताल में तो नहीं दिखाई देती है। यदि बहती भी होगी तो वह गुप्त गंगा के रूप में जिसे देखने के लिए दिव्य नजर की जरूरत होती है। जो फिलहाल सीजी वाल के पास नहीं है।

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               सेमरताल की खस्ता हाल सड़कें,जर्जर स्कूल, बिजली के झूलते तार पानी के दिर दर-दर भटकते लोगों को देखकर तो यही लगता है शायद इसी कों आदर्श ग्राम कहा जाता है। जहां कि जनता गूंगी और बहरी हो। ताकि अधिकारियों और नेताओं का कोठार भरते रहे। लेकिन सेमरताल गांव को देखने के बाद इतना जरूर समझ में आया कि शहर से लगे विधायक आदर्श ग्राम सेमरताल की स्थिति जब ऐसी है तो उन गांवों का क्या स्थिति कैसी होगी जो जिला मुख्यालय से कोशों दूर हैं।

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