छत्तीसगढ़ में कुपोषण नक्सलवाद से बड़ी समस्या

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रायपुर ।    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि प्रदेश के बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से भी बड़ी समस्या बच्चों में व्याप्त कुपोषण है। इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिए सबसे पहले ग्रामीण अंचल खासकर वहां की माताओं-बहनों को इस बारे में जागरूक करना जरूरी है। मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह मंगलवार को  नवीन विश्राम भवन में राज्य योजना आयोग द्वारा यूनिसेेफ के सहयोग से आयोजित एक दिवसीय ‘पोषण संगोष्ठी’ को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री  पुन्नूलाल मोहले, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री  अजय चंद्राकर, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती रमशिला साहू और भारत में यूनिसेफ के प्रतिनिधि  लुई जार्ज अर्सनॉल विशेष अतिथि के रूप उपस्थित थे।
डॉ. सिंह ने मुख्य अतिथि की आसंदी से कहा कि हमारे प्रदेश में महिलाओं में अंत में और बचा-खुचा खाने की एक पुरानी और खराब परम्परा अभी भी बाकी है। इस परम्परा को बदलने की जरूरत है, क्योंकि गर्भ से ही बच्चों में कुपोषण की समस्या शुरू हो जाती है। यदि गर्भावस्था में मां ने पोषण युक्त भोजन नहीं लिया, तो जन्म के बाद उस बच्चे में बीमारी से लड़ने की क्षमता कम होने और कुपोषित  होने के साथ ही बौनेपन की समस्या हो सकती है। उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से गर्भवती और शिशुवती माताओं को नियमित रूप से पूरक पोषण आहार दिया जाता है। ज्यादातर यह देखने में आया है कि उस पोषण आहार का उपयोग पूरा परिवार करता है, जबकि यह आहार मां और  बच्चों के लिए ही है।
डॉ. सिंह ने कहा कि राज्य सरकार इस बड़ी समस्या को आम जनता की भागीदारी से दूर करना चाहती है। इसके लिए लोगों में व्यापक जागरूकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुपोषण के संबंध में लोगों को जानकारी देने के लिए रेडियो और दीवार लेखन उपयुक्त और प्रभावकारी साबित होगा। बेहतर यह होगा कि लोगों को  उनकी स्थानीय बोली में जानकारी दी जाए।
राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष  सुनिल कुमार ने कहा कि कुपोषण से निजात पाने के लिए भौतिक संसाधनों के साथ-साथ कुशल नेतृत्व और दृढ़ इच्छा शक्ति जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पिछले एक दशक में राज्य में कुपोषण की दर में उल्लेखनीय कमी आई है। उन्होंने नीति के स्तर पर कुपोषण मुक्ति को प्राथमिकता देने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि मैदानी स्तर पर  ग्राम पंचायतों को इस विषय को आत्मसात करना होगा। कुपोषण को चुनौती के रूप में लेते हुए इससे मुक्ति के लिए व्यापक आंदोलन चलाना होगा।
संगोष्ठी के शुभारंभ के बाद आयोजित प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता टाटा सामाजिक विज्ञान संस्था के निदेशक प्रोफेसर एस. परशुरामन ने की। इस सत्र में यूनीसेफ की भारत में पोषाहार विशेषज्ञ श्रीमती जी. ह्यून राह द्वारा कुपोषण-वैश्विक परिदृश्य पर, महाराष्ट्र पोषाहार मिशन की सुश्री सुप्रभा अग्रवाल द्वारा महाराष्ट्र के अनुभव पर, सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी तथा यूनीसेफ के सलाहकार डॉ. एन.सी. सक्सेना द्वारा देश में पोषण बजट प्रक्रिया पर और भारत सरकार के पूर्व सचिव (समन्वयन) डॉ. सतीश अग्निहोत्री द्वारा ’कुपोषण से मुक्ति-लगान एप्रोच’ विषय पर प्रस्तुतिकरण दिया गया। द्वितीय तकनीकी सत्र में कुपोषण कम करने संबंधी कार्यक्रम, कुपोषण के संदर्भ में समुदाय आधारित पहुंच, केरल अट्टापडी टिल्स, पलक्कड़ जिले में आदिवासी क्षेत्र में कुपोषण विषय पर कार्य और महाराष्ट्र के नन्दुरवार जिले में अति कुपोषण का सामुदायिक प्रबंधन, पोषाहार आदि विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा जानकारी दी गई। संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग के सचिव  देबाशीष दास और राज्य योजना आयोग के सदस्य  पी.पी. सोती भी उपस्थित थे।

 

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