हमार छ्त्तीसगढ़

जंगल में लूटतंत्र (न्याय-1)

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उद्यान में रात्रि विश्राम के बाद सिंह ने सुबह ध्यान लगाया और भगवान से सत्य व न्याय की विजय के लिए प्रार्थना की। तत्पश्चात् उसने आशा और विश्वास के साथ उत्साहित होकर मंत्री से कहा- हे जामवंत, जीत हमेशा सत्य की होती है, असत्य को पराजय का मुख देखना ही पड़ता है, अतः चलिए अब सत्य को विजयश्री दिलाएं।

पुलिस ने डिग्री घोटाले की जांच नहीं की, इसलिए हम किसी बड़े और विद्वान अधिवक्ता की सहायता से न्याय के मंदिर में घंटी बजाएंगे । आशा है हमें त्वरित न्याय की प्राप्ति हो जाएगी।

कुछ देर बाद जामवंत के साथ वह अधिवक्ताओं की कालोनी में गया। यहां दर्जनों बारहसिंगा अधिवक्ता मिले, सभी के आकर्षक चेंबर दिखाई दिए। सिंह को ऐसे योग्य विद्वान अधिवक्ता की तलाश थी, जो पलक झपकते न्याय दिला सके।

विचार विमर्श कर वे एक प्रसिद्ध अधिवक्ता से भेंट करने गए। दफ्तर में प्रवेश करते ही एक जूनियर वकील से उनका सामना हुआ। उसने बताया वकील साहब अभी व्यस्त हैं, एक घंटे के बाद ही उन्हें साहब से साक्षात्कार का अवसर प्राप्त हो सकता है।

एक घंटे बाद उन्हें वकील साहब का दर्शन लाभ मिला। चमकदार चेंबर में बैठे बारहसिंगा वकील ने बड़े प्यार और स्नेह से उनसे वार्तालाप आरंभ किया। सिंह ने वकील को शिक्षा संस्थान में चल रहे घोटाले की जानकारी दी। यह भी बताया कि पुलिस मामले की जांच करने को तैयार नहीं है, इसलिए वह न्यायालय की शरण में जाना चाहता है।

वकील साहब ने सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा- आप वन्यप्राणियों के हितार्थ कार्य कर रहे हैं। अनैतिकता के विरुद्ध युद्ध करना ही चाहिए, न्याय के लिए संघर्ष नहीं करने से ही अन्याय को बढ़ावा मिलता है, संघर्ष से बचने वालों के कारण ही अन्यायियों व आततायियों का बोलबाला हो जाता है, वे शीर्ष तक पहुंचकर अत्याचार करने लगते हैं। वकील साहब ने सिंह को बारंबार बधाई दी, फिर बातों ही बातों में स्वयं के विद्वान होने का प्रमाण प्रस्तुत करना प्रारंभ किया।

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उन्होंने पहले वेद, वेदांत के श्लोक फेंके, फिर हवा में 25-30 देशों के संविधान से लेकर तमाम कानूनी धाराओं को तैरा डाला। नंदन वन के कानून की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा -पुलिस को इस मामले में जांच करनी ही पड़ेगी, जांच के बाद इस तरह के काले कारनामे करने वाले चूहों का संस्थान बंद तो हो ही सकता है, उन चूहों को कम से कम 10 साल के लिए जेल भी जाना पड़ सकता है।

जामवंत व सिंह उनकी विद्वताभरी बातें सुनते रहे। एक घंटे की ज्ञान चर्चा के बाद वकील साहब ने सिंह से कहा- आज मुझे कई बड़े मामलों की पैरवी करनी है, शाम तक दम मारने का भी समय नहीं मिलेगा, अतः जूनियर आपका काम करा देगा। कार्यवाही प्रारंभ होने के बाद मैं आगे की प्रक्रिया पूर्ण करा दूंगा।

फीस जमा कराने के बाद वकील ने सिंह और जामवंत को दोपहर तक न्यायाधीश चीते की अदालत में उपस्थित होने कहा। वे सही समय में अदालत पहुंच गए, यहां का दृश्य देख राजा भौंचक रह गया। उसे चारों ओर न्याय के लिए भागदौड़ करते वन्यप्राणी नजर आए। न्याय दिलाने के लिए पसीना बहाते अनेक वकील भी दिखे। कई भैंसे थानेदार व सिपाही आरोपी वन्यप्राणियों को साथ लेकर आते जाते नजर आते रहे।

न्यायालय में उन्होंने जूनियर वकील साहब से मुलाकात की, आवेदन देने की तैयारी आरंभ की गई, इस बीच जूनियर वकील को अनेक दूसरे कार्य भी करने पड़ रहे थे, अतः तैयारी में घंटों लग गए, विलंब होने के कारण मामला दूसरे दिन के लिए टल गया।

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दूसरे दिन वे पुनः कोर्ट में उपस्थित हुए, भागदौड़ आरंभ हुई, आवेदन दिया गया, सुनवाई हुई, कोर्ट ने संबंधित थानेदार को नोटिस देकर 15 दिनों में जवाब प्रस्तुत करने कहा। सिंह की तत्काल न्याय मिलने की आशाएं कुछ धूमिल हुईं, परन्तु उसने इंतजार करने का निर्णय लिया….

( आगे है पेशी पर पेशी… कानून व प्रक्रिया का अध्ययन )

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