हमार छ्त्तीसगढ़

जंगल में लूटतंत्र (मंत्रणा 2)

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लोकतांत्रिक दुर्गति के आरंभ की कहानी बताने के बाद जामवंत ने राजा को एक नई संस्कृति के अस्तित्व में आने की जानकारी दी, उन्होंने कहा- राजन्, लोकतंत्र के घुटने टेकते ही इस राष्ट्र में एक नई संस्कृति का विकास होने लगा, वह है मुखौटा संस्कृति। विचारवान होने के कारण मनुष्य एक ओर स्वयं को सभ्य और सुसंकृत बताना चाहता है, परन्तु वह अपने अंदर की पशुता का त्याग नहीं कर पाता, वह अधिकारों का उपयोग करना चाहता है, परन्तु कर्त्तव्यों का पालन नहीं करना चाहता, इसलिए मनुष्यों ने नैतिकता का मुखौटा लगाकर अनैतिक कार्य करना आरंभ कर दिया।

इस मुखौटा संस्कृति की चपेट में आकर धर्म, कला, संस्कृति, साहित्य चौपट हो गए, शिक्षा भी नैतिकता के विकास के लिए नहीं, डिग्री प्राप्त कर शिक्षित होने का मुखौटा लगाने के लिए दी जाने लगी। राजन्, धर्म के क्षेत्र में ज्ञान का मुखौटा लगाकर अनेक अज्ञानी विषधर सक्रिय हो गए, स्वयं को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करने वाले इन अज्ञानियों ने बिना परिश्रम व संघर्ष के सफलता दिलाने का दावा किया, अपने आसपास निकम्मों की भीड़ एकत्रित की और उन्हें लूटना आरंभ कर दिया।

इससे आस्था को झटका लगा, धर्म आडंबर बनता गया। इन सबसे वास्तविक ज्ञान विलुप्त हो गया, आदर्श किताबों में कैद हो गया, नैतिकता हवा में तैरने लगी, अनैतिकता पवन वेग से दौड़ने लगी।

मुखौटा संस्कृति ने साहित्य व कला को भी झटका दिया। प्राचीन काल से साहित्य व कला समाज को दिशा देकर संस्कृति का विकास करते रहे हैं, इसलिए साहित्यकारों व कलाकारों को समाज में सम्मानजनक स्थान मिलता रहा है, मुखौटाधारियों ने साहित्य व कला के क्षेत्र में भी कब्जा करना आरंभ कर दिया। राष्ट्रीय रंगमंच पर सम्मान के भूखे अनेक ऐसे लोग साहित्यकार का मुखौटा लगाकर छा गए, जिनका साहित्य या बुद्धिजीविता से कोई लेनादेना ही नहीं था।

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सम्मान, संपत्ति और सत्ता के इन लालची साहित्यकारों व पूर्वाग्रह से ग्रसित बुद्धिजीवियों ने समाज को दिशा देना छोड़, उसे भटकाना आरंभ कर दिया। परिणामस्वरूप समाज साहित्य से दूर होता गया। कलाकार तो इनसे भी आगे बढ़ गए। मांग और पूर्ति के फंदे में फंसी कला ने आरंभ में सभ्यता का मुखौटा लगाया, फिर उस मुखौटे को भी उतार फेंका।

हे राजन्, कला का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की जागृत विचारशीलता को गति देकर उसके अंदर की पशुता समाप्त करना होता है, परन्तु इस क्षेत्र में सक्रिय हुए मुखौटाधारियों ने वास्तविक कला को किनारे कर दिया।

समाज में फिल्म व फिल्मी संगीत का प्रचार प्रसार किया गया, इसे कला का दर्जा देते हुए मांग और पूर्ति का कुचक्र चलाया गया, परिणामस्वरूप जिस कला से मनुष्य के अंदर की पशुता समाप्त होनी थी, उसी कला ने पशुता को उभारना आरंभ कर दिया, पशु प्रवृत्तियों के खुले प्रदर्शन से समाज की स्थिति बिगड़ती गई, मनुष्यों के तथाकथित सभ्य समाज में पशुता को सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता गया।

अब समाज में कला का मुखौटा लगाए इन नरपशुओं का अत्यधिक सम्मान किया जाता है। करोड़ों लोग इन्हें आदर्श मानते हैं, इनकी प्रत्येक गतिविधियों पर नजर रखते है, इन्हीं के जैसे वस्त्र पहनते हैं, इनके जैसे ही चलते, बोलते व इनके चरित्र की नकल करते हैं। व्यापक जन समर्थन प्राप्त होने के कारण कोई इन नरपशुओं के विरोध की हिम्मत नहीं कर पाता है।

राजन्, धर्म, कला, साहित्य के मुखौटा संस्कृति की चपेट में आने से राष्ट्र की वास्तविक संस्कृति नष्टभ्रष्ट होती गई, शिक्षा भी इसकी चपेट में आने से नहीं बच सकी। शिक्षा का मूल उद्देश्य नैतिकता का विकास होता है, ताकि शिक्षा प्राप्त करने वाला पशु प्रवृत्तियों का त्याग कर सके, सत्य यही है कि पशु प्रवृत्तियों का त्याग करने वाला ही शिक्षित होता है, परन्तु शिक्षा इस मूल उद्देश्य से भटक गई। मुखौटाधारियों ने इसे अक्षर ज्ञान और डिग्री प्राप्त करने का खेल बना दिया, ताकि शिक्षित होने का मुखौटा लगाकर डिग्रियों के सहारे धन अर्जित किया जा सके। अनेक शिक्षा की दुकानें खुल गईं, इन दुकानों से डिग्रियां बेची जाने लगीं…..

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( आगे है…मुखौटाधारी व्यापारी, जनसेवक…)

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