हमार छ्त्तीसगढ़

जंगल में लूटतंत्र (मंत्रणा 7)

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जामवंत ने कहा- राजन्, सत्य व ज्ञान की चर्चा करने वाले असंख्य लोग हैं, सभी अपने अपने तर्कों के सहारे इसकी व्याख्या करते हैं, परन्तु इसे समझना और समझाना टेढ़ी खीर है। वास्तविकता यह है इस सत्य को शब्दों में समझा पाना कठिन है। असत्य का खंडन करते हुए, सत्य के मार्ग पर चलते हुए इसका साक्षात्कार किया जा सकता है, अर्थात इसे अनुभव ही किया जा सकता है, इसकी संपूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती है।

ज्ञानियों के अनुसार यह सत्य, ज्ञान या ब्रम्ह निर्गुण और निराकार है….फिर यह सगुण और साकार भी है…यह सब कुछ है, सत्य सर्वत्र व्याप्त है और सभी का आधार अर्थात सर्वाधार है, यह एक या अखंड और कभी नहीं बदलने वाला है…इसका न कभी जन्म होता है और न कभी मृत्यु होती है…..इसे जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सका और सुखाया भी नहीं जा सकता, इसे पकड़ा नहीं जा सकता और न ही इसे छोड़ा जा सकता है….

हे राजन्, ऐसा कैसे है, सीधे और सरल शब्दों में इसे समझने का प्रयास करना ही ज्ञान योग है। इस ज्ञान योग में पहले विवेक बुद्धि का आश्रय लेकर असत्य को समझा जाता है, या उसे समझा जाता है जो सत्य नहीं है, फिर उसके बाद सत्य को समझने का प्रयास किया जाता है। इस सत्य को पहले तर्क के आधार पर समझने के बाद उसे व्यवहार में लाया जाता है ।
राजन्, आइए, असत्य को समझने के बाद अब सत्य को समझने का प्रयास किया जाए। हे राजन्, ध्यान से देखने पर इस संसार में दो विपरीत बातें दिखाई देती हैं, जैसे दिन है तो रात भी है, नर है तो नारी है, सर्दी है तो गर्मी है, मित्रता है तो शत्रुता है, सुख है तो दुख भी है, करुणा है तो क्रूरता भी है आदि आदि…

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आप विचार करते चले जाइए, इस समूचे संसार में आपको प्राणी, वस्तु, भावना, विचार का विरोधी मिल जाएगा, ध्यान से देखने पर समझ में आएगा कि सब कुछ या तो सकारात्मक है, या नकारात्मक है, या फिर दोनों का मिलाजुला परिणाम है। यह संसार टुकड़ों में विभाजित है, हर एक टुकड़े का कोई नाम और रूप है।

साथ ही यह भी दिखेगा कि इस संसार में सबकुछ अनित्य, परिवर्तनशील व क्षणभंगुर है, सुख भी परिवर्तनशील है और दुख भी परिवर्तनशील है, नाम और रूप भी परिवर्तनशील व क्षणभंगुर ही हैं।

तर्क यह है कि जब संसार में दो परस्पर विपरीत तथ्य उपस्थित हैं और दोनों परिवर्तनशील हैं, तो इस परिवर्तनशीलता के विपरीत अपरिवर्तनशीलता भी होनी ही चाहिए। कुछ ऐसा होना ही चाहिए जो कभी न बदलता हो, फिर इस अपरिवर्तनशील को सभी बातों के विपरीत होना चाहिए।

अगर संसार सापेक्ष या उत्पत्ति और विनाश के अधीन है, तो उसे निरपेक्ष या कभी उत्पन्न और कभी नष्ट नहीं होने वाला होना चाहिए, परिवर्तनशील होने के कारण अगर संसार आधारहीन है, तो उसे सर्वाधार होना चाहिए। संसार टुकड़ों में विभाजित है तो उसे अविभाजित या अखंड होना चाहिए।

राजन्, ये जो नित्य, अपरिवर्तनशील, निरपेक्ष, अखण्ड व सर्वाधार है, वही सत्य है, वही ब्रम्ह है। ब्रम्हांड में इसी की सत्ता है, सब कुछ यही है, इसके सिवा दूसरा कुछ है ही नहीं। दार्शनिकों के अनुसार अनुभव में आने वाला यह संसार जाग्रत अवस्था का स्वप्न है, माया या भ्रम है, जो इस ब्रम्ह पर अध्यस्त है।

राजा ने कहा- हे जामवंत यह संसार माया या भ्रम है, यह कैसे समझा जा सकता है ?

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जामवंत ने कहा- ज्ञानवानों ने इसे भी अनेक तरह से समझाया है। एक तर्क यह है कि जो आरंभ और अंत में रहता है वही मध्य में भी रहता है, जैसे रस्सी का एक सिरा रस्सी है, दूसरा सिरा भी रस्सी है तो बीच में वह बदलेगी नहीं, बीच में भी वह रस्सी ही रहेगी।

राजन्, जन्म के पहले आपका शरीर नहीं था, मृत्यु के बाद भी नहीं रहेगा, इसलिए वर्तमान में भी आपका अस्तित्व नहीं होना चाहिए, वास्तव में वर्तमान में आपको अपने नाम और रूप के अस्तित्व का जो बोध हो रहा है, वह भ्रम ही है, क्योंकि इस नाम रूपी शरीर के संबंध में जब तक आप सोचते हैं कि यह मैं हूं, तब तक यह दस बार बदल चुका होता है….

… आप विचार करते रहते हैं कि मैं हूं और यह बदलता रहता है, बदलते बदलते अंत में यह समाप्मृत हो जाता है, इस शरीर की समाप्ति के बाद सिर्फ वही रह जाता है जो सोचता है कि मैं हूं…मैं हूं यह सोचने वाली आपकी आत्मा है, यही सत्य है, यही ब्रम्ह है, यह आत्मा आपके जन्म के पहले भी थी, अब भी है और मृत्यु के बाद भी रहेगी…

हे राजन्, जिस तरह आपके इस शरीर का कोई अस्तित्व नहीं है, उसी तरह यह पूरा संसार भी अस्तित्वहीन है, ज्ञानियों के अनुसार इस कल्पित संसार के अस्तित्व में आने के पहले ब्रम्ह था, इसके नष्ट होने के बाद भी ब्रम्ह ही रहेगा, इसलिए मध्य में भी यह ब्रम्ह ही है, भ्रम के कारण यह संसार रूप में दिख रहा है….दार्शनिक इस भ्रम को समझने के लिए रस्सी और सांप का उदाहरण देते हैं…

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( आगे है…रस्सी को सांप समझ लिया है…)

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