हमार छ्त्तीसगढ़

जंगल में लूटतंत्र (मंत्रणा 1)

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मायावी दुनिया का स्मरण कर राजा ने कहा- जामवंत, नंदन वन में मानवीय व्यवस्था लागू नहीं करने का आपका निर्णय उचित था, उस व्यवस्था को लागू करने से हमारे समक्ष समस्याओं के पहाड़ खड़े हो जाते। माया नगरी में तो हमने एक झटके में परिवर्तित व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर दिया, परन्तु यदि वास्तव में वह व्यवस्था लागू हो जाती और इस स्थिति तक पहुंच जाती, तो हम उसे परिवर्तित नहीं कर सकते थे। 

जामवंत ने कहा- राजन्, आपका कहना उचित है। यहां उस व्यवस्था को लागू नहीं करने के कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारण भी हैं। वन्यप्राणियों की शारीरिक संरचना को देखते हुए ऐसा कर पाना संभव नहीं था, यदि यह संभव भी होता, तो भविष्य में यह निरर्थक सिद्ध हो जाता। 

राजन्, इस वन के वन्यप्राणियों की विचारशक्ति सनंदन ऋषि के तप के प्रभाव से जागृत हुई है, ऋषि के प्रस्थानोपरांत जैसे जैसे तप का प्रभाव कम होता जा रहा है, वैसे वैसे वन्यप्राणियों की विचारशक्ति घटती जा रही है। भविष्य में आप इस संसार का त्याग कर देंगे, मैं भी यहां से चला जाउंगा, फिर धीरे धीरे वन्यप्राणी पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाएंगे. इसलिए भी मैं उस व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में नहीं था।

राजा ने कहा- जामवंत, भारत का लोकतंत्र दिखता तो सीधा है, कहा यही जाता है कि यह लगातार परिपक्व होता जा रहा है, यहां रहने वाले देवप्रिय मानव विकास के रथ पर सवार होकर उत्तरोत्तर उन्नति ही करते जा रहे हैं, परन्तु आपने इसका जो रूप दिखाया, उसमें तो पाखंड का तांडव चल रहा था, समूची व्यवस्था अवसर का लाभ उठाने वालों के कब्जे में दिख रही थी, इसका क्या कारण है ?

जामवंत ने कह- राजन्, भारतीय लोकतंत्र दिखता तो सीधा है, सतह पर दृष्टि डालने से लगता यही है कि यह लगातार परिपक्व होता जा रहा है, परन्तु गहन विश्लेषण करने पर समझ में आता है कि वास्तव में यह लोकतंत्र शीर्षासन की मुद्रा में है।


राजन्, इस राष्ट्र में रहने वाले करोड़ों दीनहीन व क्षुधा से पीड़ित लोगों को सुरक्षा प्रदान करने, शिक्षित करने, उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक विकसित होने का अवसर देने के लिए लोकतंत्र की स्थापना की गई, परन्तु नैतिकता से विचलन के कारण यह लोकतंत्र पाखंडियों के कब्जे में जाता गया, पाखंड के सहारे लोकतंत्र का दुरुपयोग करने वाले निरंतर विकसित होते गए, दीनहीन व क्षुधा से पीड़ित लोग जहां के तहां रह गए। 

हे राजन् भारतवासियों को सदियों गुलामी झेलने के बाद कठिनाई से स्वतंत्रता प्राप्त हुई, एकाएक स्वतंत्र होने वाले भारतीयों को आवश्यकता से अधिक अधिकार दिए गए, ताकि इसके सहारे वे तेजी से विकसित हो सकें व उन्हें जीवन जीने के सर्वोत्तम अवसर की प्राप्ति हो सके, परन्तु ऐसा नहीं हो सका। 

उत्साह के अतिरेक में भारतीयों ने इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ लिया। राजन्, स्वतंत्रता का अर्थ दासता से मुक्ति तो है, परन्तु स्वतंत्रता नैतिकता की सीमाओं के घेरे में रहती है, सीमाओं का उल्लंघन होते ही यह स्वच्छंदता में परिवर्तित हो जाती है। 

जब तक व्यक्ति या समाज नैतिकता की सीमाओं के घेरे में रहता है, तब तक वह नियमों व कानूनों के दायरे में स्वतंत्रतापूर्वक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, इससे व्यवस्था का विकास होता है, परन्तु जब वही व्यक्ति या समाज नैतिकता की सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो वह स्वच्छंद हो जाता है, वह नियमों व कानूनों के परे जाकर व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति करने का प्रयास करने लगता है, इससे अराजकता फैलती है। 

भारतवासियों ने यही भूल की, सत्ता व संपत्ति की होड़ में वे लगातार नैतिकता की सीमाओं को तोड़कर अनैतिकता के घेरे में जाते गए, धीरे धीरे स्थिति गंभीर होती गई। 

राजन्, स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझने की भूल सर्वप्रथम इस राष्ट्र के अधिकारप्राप्त लोगों ने की। धन कुबेर बनने व सत्ता पर कब्जा करने के लिए इन अधिकारवानों ने नैतिकता को ताक पर रख दिया। इससे राष्ट्रीय वैचारिक वातावरण प्रदूषित होता गया, जैसे जैसे वैचारिक प्रदूषण बढ़ा, वैसे वैसे लोकतंत्र घुटने टेकता गया…

( आगे है..मुखौटा संस्कृति )

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