हमार छ्त्तीसगढ़

जंगल में लूटतंत्र (राजनीति 2)

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सियार का तीखा भाषण सुनकर सिंह की मुखमुद्रा बदलने लगी, परन्तु जामवंत शांत रहे। मंत्री की आलोचना के बाद सियार ने सिंह को आड़े हाथों लेना आरंभ किया। उसने कहा- कुछ माह पूर्व ध्यान भंग होने के बाद राजा सिंह अपने मंत्री के साथ वेश बदलकर नंदन वन के निरीक्षण पर निकला, लंगड़े लूटतंत्र में कलकल करते बहती विकास की गंगा देख राजा को प्रसन्न होना था, उसे वन्यप्राणियों की सराहना करनी थी, परन्तु अद्भुत विकास देख वह जलभुन गया।

राजा ने निरीक्षण के दौरान जिस तरह आतंक फैलाया, उससे सिद्ध हो गया है कि वह धर्मभ्रष्ट, कला विरोधी, संस्कृतिहीन व अत्याचारी हो गया है। निरीक्षण आरंभ करते ही राजा ने परम् धर्मात्मा नागों और उल्लुओं को धमकाया, उसने तपस्वी बाबाओं को पाखंडी कहा और उनका डेरा डंडा उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। फिर उसने महान अदाकारा, जंगल क्वीन लोमड़ियों और संगीतकार श्वानों को आंखें दिखाईं।

राजा से रहा नहीं गया तो उसने हमारे जंगल के ज्ञान शिरोमणि लेखक बगुलों और कवि सम्राट चीलों को भी पागल कह दिया। पता चला है इसी बीच उसने कपिला गाय और उसके पति नंदी को उनके बेटों के खिलाफ भड़का दिया, फिर सुनसान इलाके में मारकर उनका भक्षण कर लिया।

अनैतिक कृत्य करने के बाद उसने क्रांतिकारी चिकित्सक अद्भुत सेवाभावी डाक्टर लकड़बग्घा को पीटा, प्राणघातक हमला कर उसे लूट लिया। आगे जाकर राजा और मंत्री ने फिर वेश बदल लिया, उन्होंने नंदन वन में शिक्षा की अलग जगाने वाले मूषकों पर उल्टे सीधे आरोप लगाए, सत्यवादी कौवों को बरगलाकर जंगल में अफवाह फैलाने के लिए प्रेरित किया। कौवों के अफवाह नहीं फैलाने से वह नाराज हो गया।

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वह जंगल का राजा है, यहां मुख्य रूप से राजा का ही कानून चलता है, पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, फिर भी डाक्टर द्वारा पुलिस से शिकायत करने के बाद वह डरपोक राजा घबराकर मंत्री के साथ फरार हो गया, हमें पता चला है फरार राजा मंत्री के साथ जंगल का खजाना अय्याशी में लुटा रहा है। शीघ्र ही खजाना खाली हो जाएगा और नंदन वन निर्धन हो जाएगा।

सियार ने गरजते हुए कहा- हे देवों के प्रिय वन्यप्राणियों, अब हमारे जागने का समय आ गया है। इस निर्णायक मोड़ पर भी हम नहीं जागे, तो फिर हमें न जाने कब तक राजा, मंत्री और उनके अधिकारियों की गुलामी झेलनी पड़ेगी। अब हमें अत्याचारी राजा और मंत्री के कुचक्र से मुक्ति का हर संभव प्रयास करना है।

इस आधुनिक दौर में संपूर्ण विकास के लिए संपूर्ण लूटतंत्र आवश्यक है। इसमें हमारे भाग्य का नियंता राजा नहीं होगा, हम स्वयं अपने भविष्य के निर्माता होंगे, हम पूरे नंदन वन के विकास की नीतियां बनाएंगे, कानून भी हमारा होगा। हम सब अपने हितों के हिसाब से शासन चलाएंगे। इस वन के संसाधनों का अपने हिसाब से उपयोग करेंगे।

उसने महाकवि चील के रहस्यमय गीत की चार पंक्तियां सुनाकर कहा- हम अपनी लड़ाई बंद नहीं करेंगे। इस जंगल के शांति के पुजारी भालू, साहित्यकार, कलाकार, डाक्टर, व्यापारी सभी हमारे साथ हैं। जंगल का मीडिया भी हमारे साथ है।

सियार ने कहा- हमें पता चला है कि राजा चुपके चुपके शीघ्र ही अपनी गुफा पहुंचने वाला है। राजा की वापसी के बाद पहले हम उससे शांति से संपूर्ण लूटतंत्र लागू करने की मांग करेंगे। उसके नहीं मानने पर इन शांति के पुजारी भालुओं और आप सभी के सहारे ईंट से ईंट बजा देंगे।

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इस सियार के बैठने के बाद दूसरे सभी सियारों ने भी इसी तरह का भड़काऊ भाषण दिया, इससे वन्यप्राणियों की रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा, सभी जोर जोर से नारे लगाने लगे….जंगल वार सियार सियार… आर पार सियार सियार… भीषण वार सियार सियार, सियारों की सत्ता लाना है, जंगल को बचाना है… वीर सियार आगे बढ़ो, हम तु्म्हारे साथ हैं…

इस बीच कौवों ने जंगल में इस सभा की सूचना का प्रसारण आरंभ कर दिया। सूचना मिलते ही दूसरे वन्यप्राणी भी सभास्थल की ओर दौड़ने लगे। सियारों की कुचाल देख सिंह की भुजाएं फड़क उठीं, परन्तु उसने चुप्पी साधे रखी। जामवंत राजा को गुफा की ओर ले गए…

( आगे है राजा की जय जयकार…)

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