जंगल में लूटतंत्र (राजनीति 5)

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सर्वदलीय मंच की बैठक में सियारों के मुखिया ने सभी को राजनैतिक संकट की जानकारी दी। उसने कहा- राजा संपूर्ण लूटतंत्र लागू करने पर तो राजी है ही नहीं, वह वर्तमान व्यवस्था को भी परिवर्तित करने का निर्णय ले चुका है, किसी भी दिन वह नई व्यवस्था लागू करने की घोषणा कर सकता है। 

नई व्यवस्था कैसी होगी, यह हम नहीं जानते, परन्तु यह अवश्य जानते हैं कि व्यवस्था लागू होते ही हममे से बहुत से सियार कारागार में बंद कर दिए जाएंगे, बहुतों को यमलोक की यात्रा भी करनी पड़ेगी। हमारे पास समय कम है, हमें तत्काल भविष्य की रणनीति बनानी होगी। मुखिया ने सर्वप्रथम वरिष्ठ सियारों को इस संबंध में विचार प्रस्तुत करने कहा। 

कुछ वरिष्ठ सियारों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अपने अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रायः सभी ने राजा से पुनः मुलाकात कर उसे समझाइश देने की बात कही। यह भी कहा कि राजा के नहीं मानने पर वन्यप्राणियों को साथ लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन किया जाए, राजा तपस्वी है, वह कत्लेआम या हिंसा के सहारे अपना आदेश लागू कराने का प्रयास नहीं करेगा। सभी वन्यप्राणियों द्वारा मांग किए जाने पर वह उन्हें राज्य सौंप देगा। 


दूसरे अनेक सियारों ने इस पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा, उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ेगी। इन्होंने कहा आक्रामक रैलियां निकालकर, मीडिया के माध्यम से सूचनाएं प्रसारित करवाकर वन्यप्राणियों को राजा के विरोध के लिए उकसाया जाए, आक्रामक आंदोलन कराया जाए। 

आवश्यकता पड़ने पर भोजन, रुपया, सुख सुविधाओं की सामग्री, मदिरा, पद का लालच देकर अधिक से अधिक वन्यप्राणियों को इस पुनीत कार्य में सहयोग प्रदान करने के लिए लुभाया जाए। युवा वन्यप्राणियों को उकसाकर तोड़फोड़ कराई जाए, गुंडे, मवालियों, चोर, डाकू, लुटेरों को संरक्षण देकर उन्हें कार्यकर्ता बना लिया जाए। इन सबके अलावा भालुओं को संगठित कर उन्हें हथियार पकड़ाया जाए। उग्रवाद फैलने पर राजा डरे या नहीं, वन्यप्राणी जरूर भयभीत होकर हमारा साथ देने लगेंगे। 

वरिष्ठ सियारों ने इन प्रस्तावों का विरोध किया, परन्तु चतुर सियार अपने प्रस्तावों पर अड़े रहे। अंत में नाराज वरिष्ठ सियारों ने उनका साथ देने से इनकार कर दिया, उन्होंने कहा संपूर्ण लूटतंत्र के लिए वे अपने हिसाब से ही आंदोलन करेंगे। इस तरह आंदोलन प्रारंभ होने के पहले ही सर्वदलीय मंच विभाजित हो गया। 


वरिष्ठ सियारों के साथ छोड़ने के बाद चतुर सियारों ने रणनीति तय की। अगले दिन वे वन्यप्राणियों के समक्ष उपस्थित हुए। तमतमाते हुए उन्होंने वन्यप्राणियों से कहा- अब भी राजा की अकड़ समाप्त नहीं हुई है। हमारी आशंका सत्य सिद्ध हो गई, राजा ने दो टूक कह दिया है कि वह लूटतंत्र समाप्त करने वाला है। निकट भविष्य में वह सभी वन्यप्राणियों की संपत्ति, घर द्वार लूट लेगा। 

भालुओं की ओर संकेत करते हुए सियारों ने कहा- राजा इन भालुओं पर बहुत नाराज है, वह इन्हें कुचल डालना चाहता है, न जाने किसने उसे इन भोले भाले भालुओं के खिलाफ भड़का दिया है। किसी ने राजा से कह दिया है कि भालू संगठित होकर सशस्त्र विद्रोह करने वाले हैं।


यह सुनते ही भालू डर गए, परन्तु सियारों ने उन्हें भड़काने का प्रयास जारी रखा। सियारों ने भालुओं को दिलासा देते हुए कहा- डरने की कोई बात नहीं है। राजा बूढ़ा हो गया है, उसका मंत्री भी निर्बल है, हमने राजा के उच्चाधिकारी सभी शेरों, चीतों और उसके सैनिक तेंदुओं में फूट डाल दी है। 


सियारों ने भालुओं को आजादी के मतवाले बनने की प्रेरणा दी, साथ ही कल्पित सरकार में महत्वपूर्ण स्थान देने का लालच दिया, फिर कहा- हम तुम्हें हथियार दिला देंगे, तु्हारे पीछे सभी वन्यप्राणी रहेंगे, तुम्हें सिर्फ हथियार दिखाकर भय का संचार करना है, हथियार चलाना नहीं है। 

डरते डरते भालू इस फर्जी त्याग के लिए तैयार हो गए। कुछ दिन बाद रात के अंधेरे में सियारों ने भालुओं को आग्नेयास्त्र उपलब्ध करा दिया…. कुचक्र की गति बढ़ाने के बाद सियारों ने विभन्न तरीकों से वन्यप्राणियों को लुभाना आरंभ किया, गुंडों, चोरों, डाकुओं को पार्टी पदाधिकारी बनाकर संगठन को मजबूती प्रदान करने का कार्य भी किया गया। सियारों को लगा अब जल्द ही सफलता मिल जाएगी, परन्तु राजनीति अनेक करवटें ले रही थी, इन सियारों के सामने जामवंत थे, जो अपने गुप्तचरों के सहारे सबकुछ देख रहे थे….

(आगे है मीडिया की सूचनाओं का चमत्कार….)

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