मेरा बिलासपुर

जंगल में लूटतंत्र (शिक्षा)

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शिक्षा-बैल की सामान्य चिकित्सा से स्वस्थ होने के बाद सिंह विचारमग्न हो गया। निरीक्षण के दौरान उसे लगातार छद्म नैतिकता, पाखंड का तांडव दिख रहा था, हर जगह नैतिकता दयनीय स्थिति में नजर आ रही थी। निरीक्षण करते शाम हो रही थी, इसलिए वह जामवंत को साथ लेकर एक उद्यान में गया, वहां शांत मुद्रा में बैठकर वह मंत्री से विचार विमर्श करने लगा।

उसने जामवंत से कहा- इस धरती पर मनुष्यों से अधिक शिक्षित कोई दूसरा प्राणी नहीं है, उनकी शिक्षा का मूल आधार ही नैतिकता है, हमने इसीलिए मानवों की उत्कृष्ठ शिक्षा प्रणाली अपनाई। उसी शिक्षा प्रणाली में शिक्षित वह डाक्टर लकड़बग्घा लुटेरा कैसे बन गया ?

जामवंत ने कहा- राजन, आप जिस शिक्षा प्रणाली की बात कर रहे हैं, वह तो अब लुप्तप्राय है, नैतिकता के सहारे तेजी से धनी नहीं हुआ जा सकता है, इसलिए अब अनैतिकता की ओर धकेलने वाली शिक्षा व्यवस्था अस्तित्व में आ गई है। आधुनिक शिक्षा नैतिक विकास के लिए नहीं, धनोपार्जन पर जोर देती है, ताकि अधिक से अधिक धन कमाकर विलासी जीवन व्यतीत किया जा सके।

अब शिक्षा का उद्देश्य मेडिकल, इंजीनियरिंग और दूसरी बड़ी डिग्रियां प्राप्त करना होता है। डिग्री प्राप्त करते ही लूट की खुली छूट मिल जाती है, इसलिए यह शिक्षा प्रणाली अधिक पसंद की जा रही है। राजा ने पूछा- नंदन वन में नीति शिक्षा देने वाले विद्यालयों की स्थापना क्यों नहीं की गई?

जामवंत ने कहा- राजन् आरंभ में यहां अनेक विद्यालयों की स्थापना की गई थी। उनमें संस्कारी व मेधावी हाथियों को शिक्षक नियुक्त किया गया था, ताकि वे नन्हें वन्यप्राणियों को नैतिकता की कड़वी घुट्टी पिलाकर आधुनिक शिक्षा दें, विचार किया गया कि इससे बच्चों को आधुनिक शिक्षा तो मिलेगी, परन्तु वे नैतिकता का त्याग नहीं करेंगे।

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महाविद्यालयों की स्थापना कर विभिन्न विषयों का अध्यापन आरंभ कराया गया, ताकि बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपना विकास करें, साथ ही वन्यप्राणियों की निःस्वार्थभाव से सेवा भी करते रहें। आरंभ में वन्यप्राणियों ने अपने बच्चों को इन विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ने के लिए भेजा।

हाथियों ने भी उन्हें शिक्षित करने के लिए दिन रात एक कर दिया। इन विद्यालयों व महाविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण करने वाले संस्कारी तो हो गए, परन्तु धन कमाने की मशीन नहीं बन पाए। राजन्, वो ज्ञानी वानर, नंदी बैल, तोते, कथा श्रवण करने वाला हाथी, कोयल, मोर और ये डाक्टर, इन सभी ने इन्हीं विद्यालयों व महाविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण की थी। आपने देख ही लिया है कि वे किस हालत में हैं।

राजन्, धनाभाव से वन्यप्राणियों की धारणा बदलने लगी, इसी बीच नंदन वन में शिक्षा की दुकानें अस्तित्व में आईं, वन्यप्राणियों के बच्चे इन दुकानों में भर्ती किए जाने लगे, ताकि वे आगे जाकर कर धनोपार्जन की मशीन बन सकें। वो अंग्रेजी बोलने वाली लोमड़ियां, डाक्टर लकड़बग्घा, नंदी बैल के बेटों ने इन दुकानों से शिक्षा प्राप्त की है।

हे राजन्, अब कुछ अकिंचन वन्यप्राणी अपने बच्चों को मनोरंजनार्थ इन पुराने विद्यालयों में भेज देते हैं, ताकि वे घर में उत्पात न मचाएं और बाहर सुरक्षित रहें। संस्कारी हाथी इन्हीं विद्यार्थियों को शिक्षित करने का प्रयास कर समय व्यतीत करते रहते हैं।

महाविद्यालयों से जो छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे कुछ दिन तो नैतिकता के लिए संघर्ष करते हैं, परन्तु अंत में वे भी सामाजिक व आर्थिक दबाव के कारण नैतिकता का त्याग करने पर विवश हो जाते हैं, दूसरों की तरह लूटतंत्र का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।

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यह सुनकर सिंह को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा शिक्षा की दुकानों से डिग्री कैसे ली जाती है? जामवंत ने कहा- राजन् इस संबंध में मुझे भी अधिक जानकारी नहीं है, चलिए किसी बड़े संस्थान में चलते हैं।

उन्हें जंगल मीडिया की पत्र पत्रिकाओं में निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के ढेरों विज्ञापन और इनकी प्रशंसा में लिखे समाचार दिखे। हर विज्ञापन में संबंधित शिक्षा संस्थान की सर्वश्रेष्ठता का दावा किया गया था। सिंह और जामवंत ने इनमें से एक का चयन किया। उद्यान में रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन वे विज्ञापन के आधार पर एक बड़े शिक्षा संस्थान में गए। यहां प्रोफेसर व अधिकारी बनकर शान से बैठे बड़े बड़े चूहे दिखाई दिए…

( क्रमशः )

( आगे है डिग्रियों की कीमत, कौवों की प्रेस कांफ्रेंस )

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