‘तपेश’ से मेरा सवाल

सत्यप्रकाश पाण्डेय।caption_sppझूठ ही सही मगर खुश होने के लिए ये ख़बर अच्छी है कि अचानकमार टाईगर रिजर्व में बाघ दिखाई देने लगे हैं वो भी बड़ी संख्या में । किसी ने देखा नहीं, इसका खुलासा तबादले पर जगदलपुर गए एक अफ़सर के सोशल मीडिया पर आये बयान और कुछ अखबारों की सुर्ख़ियों से हुआ है । बाघ कहाँ देखे गए और कितनी संख्या में हैं ये सिर्फ तपेश झा को मालूम है और ट्रैप कैमरे की नज़र में है ।”
                                       अचानकमार टाईगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर तपेश झा का मुख्य वन संरक्षक पद पर जगदलपुर तबादला हो गया। जाते-जाते उन्होंने अपनी वाल (सोशल मीडिया) पर मन में बिलबिला रहे ग़ुबार को बाहर निकाला । मीडिया, सोशल मीडिया, मातहत अधिकारियों और पर्यावरण से जुड़े असंख्य लोगों पर कई सवाल खड़े किये । अचानकमार टाईगर रिजर्व में अपने कार्यकाल के अनुभवों का खुला चिठ्ठा सोशल मीडिया पर छोड़ने वाले तपेश ने जिन-जिन वर्गों को सवालों के कटघरे में खड़ा किया और अपनी वृहद् सोच के साथ कार्यशैली का बखान किया उसे उनकी कायराना हरकत कहूँ तो शायद गलत न होगा । झा साहेब ने अपनी कार्यकुशलता और बुद्धिमता का आंकलन खुद कर लिया, उन्होंने अचानकमार टाईगर रिजर्व में कई ऐतिहासिक काम करवाये । इस बात का खुलासा उन्ही के शब्दों ने किया । उन्होंने अपनी वाल (फेसबुक ) पर काफी कुछ लिखा है। उस पोस्ट की तस्वीर…
इस वन अफ़सर के आभार और निवेदन पत्र की पहली लाईन पर गौर करें तो उन्होंने कम समय के कार्यकाल में 15 से 19 बाघ ढूंढ निकाले हैं जो मूलतः अचानकमार टाईगर रिजर्व के निवासी बताए जा रहें हैं । उन बाघों के साथ कई शावकों के मिलने की पुष्टि भी तपेश झा की वाल पर लगी पोस्ट से होती है । उन्होंने इस बात का जिक्र भी खुलकर किया है कि बाघों को ढूंढने में उनके साथ जमीनी अमला लगा था, रेंजरों को भी खबर नहीं दी क्योंकि गोपनीयता भंग होने का खतरा था । रेंज के अधिकारियों की मदद के बिना उन्होंने करीब 19 बाघ ढूंढ निकाले । ये बाघ पिछले डेढ़ दशक से कहाँ थे शायद झा साहब बता पाएं । उनकी एक बात को पढ़कर हंसी भी आ रही है, उन्होंने जिक्र किया है बाघों की सीधी रिपोर्टिंग उन्हें ही थी क्योंकि उन्हें अपने अफसरों पर भरोसा नहीं था । उन्हें इस बात का डर खाये जा रहा था कि किसी रेंजर को अगर पता चल गया तो वो बाघ को इलाके से खदेड़कर बाहर भगा सकता है । गज़ब की कार्यशैली है, जो काम दशकों से नहीं हुआ उसे करीब दो साल में कर दिखाना झा साहेब की कुशाग्र बुद्धि का ही नतीजा है । सवाल अब यहीं से शुरू होता है । अचानकमार टाईगर रिजर्व में 27 से 29 बाघ होने के आंकड़े इन्ही के अफ़सरान पेश करते रहें हैं । इनके मुताबिक़ 19 बाघ मिल गए है, अगर कुछ दिन और होते तो शायद और मिल जाते । क्या जिन 15 से 19 बाघों के मिलने की पुष्टि साहब करके जगदलपुर चले गए वो पर्यटकों की नज़रों में कभी आ सकेंगे ? अगर इतने बाघ हैं तो टाईगर रिजर्व बनने (2009) के बाद सफारी पर गए कितने पर्यटकों ने बाघ देखा ? जंगल सफारी की डायरी से कितने पर्यटकों की संतुष्टि के आंकड़े सामने लाये गए ? दूसरे टाईगर रिजर्व की तुलना में इस टाईगर रिजर्व में कितनी सुविधाएँ पर्यटकों को मुहैय्या कराई गईं ? क्या जंगल सफारी के लिए तय किया गया मार्ग उचित है ? क्या पर्यटकों की तुलना में विभाग के पास पर्याप्त संसाधन हैं ? क्या विभागीय का अमले आचरण पर्यटकों के प्रति मित्रवत है ? ऐसे-ऐसे कई सवाल हैं।
                “थोथा चना बाजे घना” ये कहावत तो झा साहब ने भी पढ़ी, सुनी होगी । इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ । साहेब ने लिखा अपने समकक्ष अधिकारीयों और मीडिया से अपनी अव्यवहरिक्ता और दूरी बनाये रखने के लिए हमेशा आलोचित होते रहे फिर भी उन्हें आलोकित होने का आभास है । उन्होंने साफ़ लिखा है मैं आलोचित होकर भी आलोकित होता रहा । कहाँ उनके आलोक का प्रकाशपुंज फैला वो ही बता पाएंगे । ” अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता” पर झा साहब ने कर दिखाया । हाँ उन्होंने ये नहीं बताया कि अचानकमार में बाघों की संख्या घटी या फिर बढ़ गई । उन्होंने ये भी खुलासा नहीं किया कि जिन रास्तों पर पर्यटकों को लेकर जाया जाता हैं वहां क्या बाघ दिखाई पड़ सकता है ? शायद सब कुछ गोपनीय है, खतरा मीडिया, समकक्ष अधिकारियों और पर्यावरण प्रेमियों से है । वैसे आप जिस मिज़ाज के है ये स्थिति हर जगह बनी रहेगी । साहब ने जंगल और जंगली आदमियों से प्रेम का भी खुलासा किया है । उन्होंने कुछ तस्वीरें भी अपनी पोस्ट पर लगाई जिनका आशय सिर्फ वो ही समझ सकते हैं । उन्होंने आदिवासियों से प्रेम और उनके साथ पारंपरिक गीत गाने की बात भी लिखी है। उन्होंने ये नहीं बताया की इतने प्रेम के बावजूद कितने आदिवासी परिवारों को उन्होंने मनाकर पुनर्वास करवाया ! अचानकमार टाईगर रिजर्व से करीब 20 से अधिक गाँव का विस्थापन होना अभी बाकी है । अचानकमार इलाकें में सक्रिय दैहान और उसकी आड़ में होते अवैध कब्जे पर कितना अंकुश लगा ? क्या आपके रहते अचानकमार के बिगड़े भूगोल की सूरत बदली ? क्या आपने जिन लोगों को अवैध और गैर कानूनी कार्यों को अंजाम देने का हवाला देकर जेल भिजवाने का जिक्र किया उसमें एक भी रसुखदार या फिर सियासी चेहरा था ? बड़े मगरमच्छ आज भी उतने ही बेफिक्र और बिंदास हैं। उनकी नज़र में आप जैसे ना जाने कितने आये और चलते बने।
                 अरे साहब … आप भी जानते है और आपके ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी भी, क्या कुछ नहीं होता अचानकमार टाईगर रिजर्व इलाके में । आपने कुछ किया नहीं सिवाय जंगल में अपनी मौजूदगी दिखाने के । आपकी चाकरी और आपके भ्रमण को लेकर जंगल के रास्तों में तैनात जमीनी अमला शायद जंगल की सुरक्षा में मुस्तैद होता तो लगता जंगल के प्रति साहब का रवैय्या सकारात्मक है । अरे भाई साँझ को आंच क्या… बिना कुछ किये आप कायरों की तरह सामने आये भी तो कहाँ, उसी सोशल मीडिया पर जिसकी एक तस्वीर (सोनू हाथी) ने वन महकमें की असंवेदनशीलता और निकम्मेपन का सच सामने लाकर आप जैसे कर्मठ लोगों के पसीने छुड़ा दिए । साहब ने लिखा सीमित और अल्पज्ञानी मीडिया को जब अचानकमार टाईगर रिजर्व में वीवीआईपी ट्रीटमेंट नहीं मिला तो वे हाथी जैसे मुद्दे को लेकर सामने आ गए ।
                    मैं आपके असीमित ज्ञान और बुद्धिशाली वैभव का कायल हो गया । सोनू हाथी का मुद्दा जिसे आप ऐसा-वैसा कह रहें हैं तपेश जी वो ऐसा-वैसा मुद्दा नहीं है । हाँ ये बात दिगर है कि सोनू (हाथी) ने आप जैसे कई बड़बोले और अहंकारी अफसरों की नींद हराम कर दी । उस पर होते जुल्म और उसके मरणासन अवस्था में पहुँचने की पहली तस्वीर मैंने ही खींची जो बाद में स्थानीय फिर राष्ट्रीय स्तर पर कई अखबारों, पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित हुईं । अरे साहब.. आप लोग तो पहले ही एक हाथी मार चुके थे, यक़ीनन तस्वीर सामने नहीं आती तो सोनू भी अब तक दफनाया जा चूका होता । वैसे भी सोनू [हाथी] के मामले में  आप सभी ने किस तरह हाईकोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की, कैसे सिंहावल सागर में हाथियों के लिए रेस्क्यू सेंटर बनाने का करोड़ों का प्रस्ताव लेकर आप लोग हाईकोर्ट के समक्ष हाजिर हुए किसी से छिप न सका।  दरअसल आप हाथी की आड़ लेकर अपनी  निराशा और कुंठा को जग-जाहिर कर गए। अरे जिन नौकरशाहों का चापलूस और दरबारी होना मीडिया को बता रहें हैं वो नौकरशाह कौन हैं ? कौन मीडिया वाला है ? कीजिये उसका नाम सामने, निश्चित तौर पर दरबारी और चरणभाठ लोगों का नाम सामने आना चाहिए।
                                                                मेरा आपसे अनुरोध है जब आप इतने रुष्ट हैं साहब, तो सभी का नाम उजागर कीजिये । निःसंदेह कुछ लोगों ने हाथी जैसे मुद्दे पर रोटी सेंकने की कोशिश की होगी । ये भी सच है कि पर्यावरण और वन्य जीव प्रेमी बनकर कई ठेकेदार जंगल को लूटते रहे, पर ये काम आपके विभागीय अधिकारियों की सहमति से होता रहा । जंगल को लूटने के खेल में हिस्सेदारी सबमें हुई । सत्ता से लेकर प्रशासनिक चौखट तक जंगल की मिट्टी के अंश मिले । इस हिस्से का कुछ अंश मेरे (मीडिया) साथियों को भी मिला। कौन बचा, कोई नहीं । सबने अपने-अपने हिस्से का पाया और जंगल की आबरू को खुले बाज़ार में छोड़ दिया लुटने के लिए । अरे आपका एक अफ़सर शिवतराई के रेस्ट हॉउस को स्थाई ठिकाना बनाकर खेती-किसानी, बकरी और मुर्गी पालन कर रहा है आप उसको कितनी नसीहत दे सके ? दरअसल मुझे जो लगता है आपको किसी ने समझा ही नही शायद इसीलिए वो आपको कोसते रहे और जाते-जाते आप सभी को कोस गए । आपसे कभी मुलाक़ात नहीं हुई ना कभी जरूरत पड़ी। सिर्फ सुना हैं आप बड़े ही ईमानदार और विवेकशील अफ़सर हैं ? मेरे पास सवाल कई हैं साहब लेकिन जवाब जहां मिलने की उम्मीद न हो वहां माथपच्ची करने का कोई फायदा नहीं । वैसे भी आपने आभार और निवेदन पत्र में सोनू हाथी का जिक्र नहीं किया होता तो आप क्या, किसी भी अफ़सर के लिए मेरे पास इतना वक्त और शब्द नहीं जिसे व्यर्थ करूँ ।
“खुदा के हुक्म से शैतान भी हैं आदम भी 
                                             वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो।” 
                                आपके कार्यों का यशगान होता रहे, अचानकमार टाईगर रिजर्व में सिर्फ आप जैसे अफसरों को नहीं बल्कि पर्यटकों को भी बाघ दिखाई पड़े साथ ही जगदलपुर की आबो-हवा आपके मुताबिक हो इन्ही कामनाओं के साथ…।

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