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नए शिक्षा सत्र की दस्तकः फिर खड़ा हो गया ई-अटेंडेंस का भूत… शिक्षकों में संशय की स्थिति

[wds id=”13″] भोपाल ।नए शिक्षा  सत्र की दस्तक के साथ ही सरकारी स्कूलों में ई-अटेडेंस ( एम- शिक्षा मित्र ) को लेकर फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है। इस व्यवस्था के तहत शिक्षकों  औऱ कर्मचारियों की हाजिरी दर्ज करने को लेकर शिक्षा विभाग की ओर से फिर आदेश जारी किए गए हैं, वहीं शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच संशय की स्थिति बनी हुई है। उधर शिक्षकों औऱ कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि पिछले सत्र के दौरान ई-शिक्षा मित्र को लेकर जिस तरह के सवाल उठाए गए थे, उनका निराकरण अब तक नहीं हो सका है। ऐसी स्थिति में यह सिस्टम लागू करने से कई तरह की समस्याओँ का सामना करना पड़ेगा।मध्यप्रदेश के अध्यापक नेता  रमेश पाटिल का कहना है कि लोक शिक्षण संचनालय द्वारा शालाओं में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों के लिए ई-अटेंडेंस को लेकर पिछले 3 मार्च को आदेश प्रसारित किए गए थे। ई-अटेंडेंस को लागू करने की समुचित व्यवस्था और वातावरण ना होने के कारण शाला में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों में भारी रोष व्याप्त था। ई-अटेंडेंस के व्यापक विरोध को देखते हुए मुख्यमंत्री  को भी कहने के लिए विवश होना पड़ा था कि “किसी भी प्रकार की अपमानजनक व्यवस्था मैं शिक्षकों-अध्यापकों पर लागू नहीं होने दूंगा।” जिससे शालाओं में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों का वर्ग निश्चिंत हो गया था कि हमें अभी ई-अटेंडेंस नहीं लगानी है। लेकिन नवीन शैक्षणिक सत्र के आरंभ होते ही अटेंडेंस का भूत फिर से खड़ा हो गया है। जिसके कारण शालाओं में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारियो में भारी संशय की स्थिति बन गई है।
  उन्होने आगे कहा कि  यह बताना जरूरी है कि शालाओं में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारी ई-अटेंडेंस का विरोधी बिल्कुल नही है। वह ई-अटेंडेंस को लागू करने का पक्षधर है ताकि उसे अपनी उपस्थिति को लेकर उठ रहे आरोपो से सप्रमाण मुक्ति मिल जाए। लेकिन ई-अटेंडेंस को लेकर उसके मन में ढेरों आशंकाएं है। जिसका समाधान शासन स्तर पर अभी तक नहीं किया गया है और इस उपस्थिति की ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लागू करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। जिसे सही नही ठहराया जा सकता है। ई-अटेंडेंस से उपस्थिति दर्ज नहीं कराने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और जून माह का वेतन ई-अटेंडेंस पर प्रदर्शित उपस्थिति के आधार पर निकालने के आदेश अधिकारी वर्ग द्वारा प्रसारित किए गए है।शाला में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर व्यथित महसूस कर रहा है क्योंकि उसकी आशंकाओ का अभी तक कोई समाधान नहीं किया गया है। ई-अटेंडेंस के लिए स्मार्ट फोन की अनिवार्यता है।
अधिकारी-कर्मचारियों का मानना है कि उपस्थिति दर्ज करने के लिए स्मार्ट फोन की व्यवस्था नियोक्ता द्वारा की जानी चाहिए। हम अपने निजी यंत्रों का शासकीय कार्य के लिए उपयोग क्यों करें या स्मार्ट फोन खरीदना ही पड़ा तो इसका आर्थिक व्यय नियोक्ता द्वारा वहन किया जाना चाहिए। स्मार्ट फोन से ई-अटेंडेंस  लगाने के लिए नेट-पैक का होना जरुरी है। नेट-पैक का व्यय कौन देगा? बिजली ना होने के कारण मोबाइल चार्ज नहीं हो पाया तो क्या होगा? घर में मोबाइल भूलने, खराब होने, गुम होने या चोरी होने  की स्थिति में क्या होगा? शासन द्वारा विद्यार्थियों के लिए अनेक जन कल्याणकारी योजनाए संचालित की जाती है।
जिसके लिए शिक्षक, अध्यापक, प्राचार्य, प्रधान पाठक  को बार-बार शहर की ओर कंप्यूटर सेंटर, बैंक, विभागीय कार्यालय और अनेक विभागों में कार्य संपादित करने के लिए शाला छोडकर जाना पडता है। शाला की आवश्यक सामग्री क्रय करने, व्यवस्था बनाने हेतु भी शाला छोडकर अन्यत्र जाना पड़ता है। उस स्थिति में क्या होगा ? उच्च अधिकारियों द्वारा शासन की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए आदेश प्रसारित कर  शैक्षणिक कर्मचारियों की ड्यूटी लगा दी जाती है। उस स्थिति में वह ई-अटेंडेंस से उपस्थिति किस लोकेशन से दर्ज करे यह भी गंभीर समस्या  है। वास्तविक शाला की लोकेशन न बताना  भी एक विकट समस्या बनी हुई है। ऐसी ही अनेकों शंकाओ का समाधान नहीं किया गया है। शैक्षणिक कर्मचारी का लोक सम्पर्क ज्यादा होने के कारण उसे अनेक सामाजिक दायित्वो का भी निर्वहन करना पडता है।जो बहुत ज्यादा जरूरी भी है। जिसको निभाने के बाद भी वह प्रयास करता है कि उसके हिस्से का शैक्षणिक कार्य प्रभावित न होने पाए। ई-अटेंडेंस मशीनीकृत उपस्थिति की व्यवस्था होने के कारण वह किसी की भावनाओ को समझने मे सक्षम नही है। परिणामतः शैक्षणिक कर्मचारी सामाजिक दायित्वो से पूरी तरह वंचित हो जाएगा जो भविष्य मे उसके लिए तनाव का कारण बनेगा।
रमेश पाटिल ने कहा कि  इन परेशानी को समझे बिना ई-अटेंडेंस को बहाल कर दिया गया है। बहुत से कर्मचारी तो ऐसे भी है जो स्मार्टफोन जैसे तकनीकी यंत्र को चलाना तक नहीं जानते। उनका क्या होगा? ई-अटेंडेंस व्यवस्था कही न कही आपके निजी जीवन की गोपनीयता पर भी अतिक्रमण करती है।जो न्याय संगत नही है।इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि ई-अटेंडेंस के लिए स्मार्ट फोन की अनिवार्यता के कारण इसका दुरुपयोग भी होना प्रारम्भ हो जाए और स्मार्ट फोन का दुरूपयोग कई आपराधिक घटनाओ को शाला परिसर मे जन्म दे सकता है!उन्होने बताया कि    ई-अटेंडेंस को लेकर कुछ साथियों ने  उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंड पीठ मे भी याचिका दायर कर रखी है। जिसका जवाब शासन स्तर पर दिया जाना है और याचिका का निराकरण नही हुआ है। उसके पूर्व ही ई-अटेंडेंस को अनिवार्य किया जाना  न्यायालय के सम्मान को ठेस पहुंचाने की ओर भी संकेत करता है? शाला में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों को ई-अटेंडेंस लगाने में कोई आपत्ति नहीं है। बशर्ते शासन स्तर पर अधिकारी-कर्मचारियों की शंकाओ का समाधान कर दिया जाए और इसे अन्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों पर भी अनिवार्य कर दिया जाए।

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