नौकरशाहों पर लटकी तलवार

SUNDAY_FILE_SD(संजय दीक्षित)दो आईपीएस और एक आईएएस के फोर्सली रिटायरमेंट के बाद खबर है भारत सरकार देश के 14 और दागदार नौकरशाहों को रिटायर करने की तैयारी में है। इनमें दो आईपीएस, पांच आईएएस और सात आईएफएस हैं। आईपीएस के लिए राहत की बात होगी कि इन दो में से छत्तीसगढ़ से कोई नहीं है। लेकिन, आईएएस में तीन हैं। दो तो प्रिंसिपल सिकरेट्री हैं। आईएफएस में भी छत्तीसगढ़ से दो अफसर हैं। इन दो में से एक तो 25 साल से डीएफओ हैं। खराब सर्विस रिकार्ड के चलते उनका प्रमोशन नहीं हो पाया। हायर सूत्रों की मानें तो डीओपीटी और एमएचए ने पीएमओ को 14 अफसरों की सूची सौंपी थी। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ अफसरों की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुए। लिहाजा, पीएमओ ने डीओपीटी और एमएचए से और डिटेल मांगा है। कुल मिलाकर 2017 नौकरशाहों के लिए डरावना रहेगा।

जारी रहेगी डीई

92 बैच के आईपीएस राजकुमार देवांगन को भारत सरकार ने खराब परफारमेंस के कारण नौकरी से छुट्टी कर दी। मगर इसका ये मतलब नहीं कि उनके खिलाफ चार्ज खतम हो गए। राजकुमार के खिलाफ विभागीय जांच जारी रहेगी। 99 में बाराद्वार डकैती हुई थी। 17 साल से इसकी जांच चल रही है। फिलहाल, डीजी जेल एवं होम गार्ड गिरधारी नायक राजकुमार की डीई कर रहे हैं। नायक ने अगर आरोप साबित कर दिए तो राजकुमार के खिलाफ राज्य सरकार को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगां। इसमें पेंशन रोकने से लेकर एफआईआर दर्ज कराने तक।

ट्राईबल कार्ड

रेवन्यू सिकरेट्री केएम पिस्दा को सरकार ने पीएससी का चेयरमैन बनाकर एक तीर से कई निशाने लगाए हैं। पहला, पिस्दा हल्बा आदिवासी हैं। यह तबका कुछ कारणों से सरकार से संतुष्ट नहीं था। सो, पिस्दा की ताजपोशी कर सरकार ने हल्बा समुदाय को साधने का प्रयास किया है। याद होगा, आदिवासी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए ही सरकार ने 2013 के विधानसभा चुनाव से एक साल पहिले 2012 में सरजियस मिंज को मुख्य सूचना आयुक्त बनाया था। सरकार ने फिर आदिवासी कार्ड खेला है। दूसरा, दीगर राज्यों की तुलना में प्रमोटी आईएएस को हांसिये पर रखने से वे भी सरकार से खफा हैं। पहले 27 जिलों में से बारह-तेरह प्रमोटी कलेक्टर होते थे। अभी सिर्फ पांच हैं। प्रमोटी आईएएस की ऐसी दुर्गति देश के किसी और राज्यों में नहीं है। यूपी, पंजाब में तो प्रमोटी का ही दबदबा है। इलाहाबाद, वाराणसी जैसे जिलों के कलेक्टर, एसपी प्रमोटी हैं। पिस्दा के अपाइंटमेंट से प्रमोटी को मरहम लगा है। तीसरा, पीएससी के लिए पिस्दा सूटेबल भी थे। आरएस विश्वकर्मा ने पीएससी की जो साख बनाया, उसे मेंटेन करने के लिए साफ-सुथरी छबि के अफसर की जरूरत थी। याने एक पंथ, कई काज।

दंगल का असर?

खेल विभाग पर अबकी सरकार ने जमकर दरियादिली दिखाई। मंत्री और सिकरेट्री ने जो मांगा, वह तथास्तु हो गया। ढाई करोड़ की लागत से रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और जगदलपुर में स्पोर्ट्स कांप्लेक्स। रायपुर मे तीन, राजनांदगांव में दो। इसके अलावा छोटे कस्बो एवं ब्लाकों में 31 मिनी स्टेडियम। यह नया कांसेप्ट होगा…..छोटी जगहों में हाईटेक स्टेडियम। ग्रामीण इलाके के टेलेंट को निखारने की दिशा में सरकार की एक बड़ी पहल होगी। एक पर 30 करोड़ रुपए खर्च होंगे। सरकार कुछ दिन पहले आमिर खान की दंगल फिल्म देखने गई थी। कहीं उसका तो असर नहीं है ये।

सिंह इज किंग?

पीसीसीएफ बीएल शरण 10 महीने की पारी खेलकर 31 जनवरी को रिटायर हो जाएंगे। उनके बाद सीनियरटी में आरके टम्टा आते हैं। टम्टा का रिटायरमेंट नवंबर में है। उन्हें अगर वन विभाग की कमान मिलती है तो 10 महीने का उनका कार्यकाल होगा। लेकिन, यह तभी होगा, जब सलेक्शन के लिए सीनियरटी ही मापदंड हो। वरना, पीसीसीएफ आरके सिंह को भी पीसीसीएफ का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। सिंह का रिटायरमेंट अक्टूबर 18 है। उनके लिए यह प्लस है। वे अगर पीसीसीएफ बनते हैं तो पौने दो साल इस पोस्ट पर रहेंगे। एकेडमिक प्रोफाइल भी उनका स्ट्रांग हैं। लंबे समय तक अमेरिका में वर्क किए हैं। भारत सरकार में भी कई अहम प्रोजेक्ट पर काम करने का उन्हें तजुर्बा है। मध्यप्रदेश में वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के लिए उन्हें आज भी जाना जाता है। फॉरेस्ट में होने के बाद भी छबि ईमानदार की है। सरकार ने अगर टेन्योर और पारफारमेंस को मापदंड बनाया तो सिंह इज किंग…..हो सकता है।

कुजूर का रिकार्ड

छत्तीसगढ़ में चुनाव कराने का रिकार्ड अभी तक एडिशनल चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर के नाम है। पिछले आठ साल में उनकी 11 बार चुनाव ड्यूटी लगी। एकाध साल में आलोक अवस्थी उनके रिकार्ड को ध्वस्त कर सकते हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने आलोक को अबकी अमृतसर को आब्जर्बर बनाया है। यह उनका नौंवा चुनाव होगा। याने कूजूर से सिर्फ दो पीछे। हालांकि, आलोक का रिकार्ड भी बहुत लंबे समय तक नहीं चलने वाला। भूवनेश यादव तेजी से उनका पीछा कर रहे हैं। पिछले तीन-चार साल में ऐसा कोई भी चुनाव नहीं रहा, जिसमें उनकी ड्यूटी न लगी हो।

अप्रैल में पहली लिस्ट

जोगी कांग्रेस सबसे आगे निकलते हुए इस साल अप्रैल में उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर देगी। 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों को पर्याप्त मौका मिल सकें, इसलिए पार्टी यह कदम उठाने जा रही है। पहली सूची में जोगी के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले लगभग सभी नेताओं के नाम होंगे। जोगी ने कुछ खास मीडियाकर्मियों से मुलाकात में इसके संकेत दिए।

जोगी का नया शगूफा

मीडिया में बनें रहने का गुर कोई सीखे तो अजीत जोगी से सीखे। हाल में उन्होंने यह बयान देकर सबको चौंका दिया कि उनकी सरकार आई तो राजधानी उठाकर बस्तर ले जाएंगे। जाहिर है, मीडिया में इसको स्पेश मिलना ही था। मगर इसे सियासी शगूफा से ज्यादा कुछ समझना नादानी होगी। क्योंकि, जोगी दूरदर्शी नेता हैं, जिन्होंने सीएम रहने के दौरान बिलासपुर में हाईकोर्ट होने के बाद भी वहां लॉ यूनिवर्सिटी खोलने की तरफदारी नहीं की। जबकि, वो खुद बिलसपुरिया हैं। वजह? रायपुर कैपिटल होने के साथ ही हवाई सुविधाओं से जुड़ा है। बात सही भी है। तो भला बस्तर में राजधानी कैसे संभव हो सकती है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बजट पूर्व सीएम द्वारा किए विभागों के रिव्यू में एसीएस बैजेंद्र कुमार सभी विभागों की बैठकों में मोर्चा संभाले रहे। सरकार उन्हें किसी खास भूमिका के लिए तैयार तो नहीं कर रही है?
2. पीडब्लूडी में बदलाव के बाद मंत्री राजेश मूणत इंजीनियरों की बैठक में बड़े गुस्से में दिखे। इससे वे क्या मैसेज देना चाहते हैं?

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