एक मुलाकात

‘ बदला नहीं – बिगड़ गया ‘ मेरा बिलासपुर…

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 ‘ बदला नहीं –  बिगड़ गया ‘ मेरा बिलासपुर…

गरीबों के लिए इस शहर में जगह नहीं है। बचपन में मैने ऐसे बिलासपुर की कल्पना नहीं की थी। जैसा की अब है। 1947 में जन्में साहित्यकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल कहते हैं महानगर बनने के साथ ही मेरा बिलासपुर बहुत पीछे छूट गया। महानगर बिलासपुर में न तो मेरे कस्बा वाले बिलासपुर जैसा दिल है ना ही लोग । जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो बहुत पीड़ा होती है कि महानगर बिलासपुर ने मेरे क्स्बाई संस्कृति को क्यों छीन लिया। अरपा पार अमरूद और आम के बगीचे आज मेरे आंगन तक सिमट कर रह गये हैं। चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर दिल झूम उठता है। व्यवसायी द्वारिका प्रसाद अग्रवाल मुसलमान और हिन्दुओं के बीच बढ़ती दूरियों को लेकर चिंता जाहिर की है।

मेरे बचपन का बिलासपुर 

        सीजी वाल से बातचीत के दौरान अपने बचपन में खो गए द्वारिका प्रसाद अग्रवाल कहते हैं…हमारा परिवार कट्टर हिन्दू था..जैसा की अन्य धर्मों के परिवारों के साथ होता है । फिर भी बिलासपुर का सामाजिक सद्भभाव हमेशा मजबूत रहा। यह सिलसिला शहर बनने तक कायम रहा। लेकिन महानगर बनते ही बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान खत्म हो गयी। बचपन में मुसलमानों के खानपीन से एतराज था लेकिन धीरे—धीरे मुझे समझ में आ ही गया कि खानपीन से कोई हिन्दू, मुसलमान या फिर ईसाई नहीं होता। गुरू शिष्य परंपरा पर गर्व करते हुए द्वारिका कहते हैं हम अपने मास्टर को देखकर रास्ता बदल देते थे। एक बार पान की दुकान पर खड़ा क्या हो गया दूसरे दिन क्लास में गुरू जी ने मुझे जमकर पिटा । वह घटना आज तक याद है। अब तो न वह गुरू रहे और ना ही वैसे शिष्य। बिलासपुर शुरू से ही दिल के साथ क्षेत्रफल में भी बड़ा था। गोलबजार से रेलवे स्टेशन की दूरी पांच मील होती थी। गरीब लोग चार आना बचाने के लिए गोलबाजार पैदल आते थे। बड़े लोग तांगे से यात्रा करते थे। 1950—60 के बीच मुरूम के सड़क बन गये । मेरा बिलासपुर कस्बा से शहर बनने लगा। शाम होते ही नगर पालिका का लाल टैंकर सड़कों पर पानी छिड़काव करता । शाम को गोलबाजार पेट्रोमेक्स और लैम्प पोस्ट की रोशनी में डूब जाता था । यहीं से सांस्कृतिक मूल्यों में भी गिरावट आने लगी। लड़की वाले लड़कों के घर खान—पीन करने लगे। द्वारिका प्रसाद को गर्व है कि बिलासपुर को बाहरी लोगों ने सजाया और संवारा है। यह अलग बात है कि कोई 100 साल पहले आया तो कोई पचास साल बाद । यह शहर ही कुछ ऐसा है जो यहां आता है यहीं का हो जाता है।

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बिलासपुर को दी नई पहचान—   

द्वारिका प्रसाद कहते हैं काम करने वालों के लिए बिलासपुर में हमेशा से गुंजाइश थी। कुछ लोग होते हैं जो शहर का वातावरण बनाते हैं श्रीकांत वर्मा,शंकर शेष,सत्यदेव दुबे ऐसे ही व्यक्ति थे। गोलबाजार का निर्माण 1937 में कुंज बिहारी अग्निहोत्री ने कनाट प्लेस की तर्ज पर श्मसान भूमि पर बनवाया। सन 60 के बाद लायंस रोटरी क्लब और जेसीज संगठनों के बनने से सामाजिक क्षेत्र में जमकर काम काम हुआ।  बिलासपुर नगर शिल्पकार रामबाबू सोंथलिया इसी संगठन के पैदावार थे। डॉ.डी.पी.अग्रवाल.आर्य शर्मा का भी नाम इनमें शामिल हैं। आज तो संगठन स्वहित का माध्यम बनकर रह गया है।

नए लोगों ने बदला बिलासपुर का कल्चर

       अस्सी का दशक बिलासपुर के लिए उथल पुथल का था। नए लोगों के साथ नई संस्कृतियां भी आयी। कस्बाई सोंधी संस्क़ृति को महानगर संस्कृति ने निगल लिया। शहर विस्तार के साथ लोगों के दिल छोटे हो गए। मानवीय चिंतन पर आर्थिक चिंतन भारी पड़ने लगा। अरपा पार की बीही और आम के बगीचे गायब हो गए।

मजबूत नेता कमजोर विकास

         बिलासपुर का विकास और जनप्रतिनित्व को लेकर द्वारिका अग्रवाल को दुख है। डॉ.रामचरण राय और डॉ.श्रीधर मिश्रा मात्र दो नाम हैं जिन्होंने बिलासपुर के लिए कुछ किया। दोनो स्वास्थ्य मंत्री बनने से पहले नगर पालिका अध्यक्ष भी रह चुके थे। इन्होंने शहर को सुनियोजित करने का सार्थक प्रयास किया। बाद में फिर किसी ने ध्यान नहीं दिया। बीआर यादव अच्छे इंसान जरूर थे लेकिन राजनीतिज्ञ नहीं। जिसके बिलासपुर को काफी नुकसान हुआ। वर्तमान विधायक अमर अग्रवाल के बारे में द्वारिका कहते हैं उन्होंने अभी तक अपनी शक्ति का पूरा प्रयोग नहीं किया। यदि ऐसा होता तो बिलासपुर आज रायपुर से मीलों आगे होता। बिलासपुर राजधानी भी बन सकता था यदि डॉ.राजेन्द्र शुक्ला और बीआर यादव अपनी शक्ति का प्रयोग छवि बनाने की वजाय बिलासपुर पर खर्च करते। प्रदेश बनने के बाद तीन साल तक जोगी के काल में बिलासपुर का जमकर विकास हुआ। तब रायपुर बहुत बेचैन था। रमन सरकार के आते ही विकास का पहिया थम गया। हम आज भी 2003 में ही खड़े हैं। अमर यदि अपनी शक्ति लगा दे तो वे अकेले प्रदेश के नेताओं पर भारी हैं।

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कैसा हो मेरा बिलासपुर

       विकास की आंधी विपरीत चल रही है। जो अमीर थे वे पूंजीपति बन गए। मध्यमवर्गीय अमीर हो गये। महानगर बनते हीं गरीबों की स्थिति बद से बदतर हो गयी। षड़यन्त्र के तहत नेताओं ने इन्हें अपना वोट बैंक बना लिया । चतुर सुजानों ने अपनी फर्टिलिटी पर रोक लगाकर एक साजिश के तहत गरीबों को जनसंख्या वृद्धि के कुचक्र में धकेल दिया । जो नेताओं का वोट बैंक तैयार कर रहे हैं। गरीबी के जाल में फंसकर यह आवादी अब महानगरीय अपराध का पर्याय बन गया हैं।  मै ऐसा बिलासपुर चाहता हूं जहां गरीबों को वोट बैंक न समझकर उन्हें विकास के मुख्यधारा से जोड़ा जाए। अंत में चेहरे पर भारी पीड़ा लेकर द्वारिका अग्रवाल सीजी वाल से कहा.. साहब बिलासपुर उन लोगों का शहर है जिनके जेब में पैसा हैजो ईमानदार होते हैं उनके जेब में पैसा नहीं होता…..दुख होता है कि बिलासपुर बदला नहीं हैबल्कि बिगड़ा है।

(जैसा उन्होने भास्कर मिश्र को बताया)

 

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