मेरा बिलासपुर

बाघ गणना में गए और भटक गए…….

caption_pranchaddha( प्राण चढ्डा )  ।बाघ की गणना जान का जोखिम है, ये नहीं कि जंगल में बाघ हमला कर देगा, अपितु घने जंगल राह भटक सकते हैं. पांच साल पहले बाघों की गणना उसके दरी पगचिन्ह देख कर की जाती थी तब न तो जीपीएस का उपयोग होता था और न ही कैमरे से बाघ की फोटो की तकनीक की वैज्ञानिक पद्धति का ईजाद हुआ था. हाँ, वनविभाग बाघों की गणना में ‘नेचर’ से जुड़ी संस्थाओं की मदद लेता ज़रूर था.

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वो मई का महीना था इसलिए मैं सुबह अचानकमार सेंचुरी के सरहदी इलाके में सिहावल सागर सुबह-सुबह इस गणना में  पहुँच गया था, इस जलाशय से bagh 1मनियारी नदी निकलती है. मेरे साथ पत्रकार दिनेश ठक्कर और शरद पाण्डेय थे. इस जलाशय में मगर हैं . घने साल वन के बीच इस सुंदर जलाशय में संध्या होने के पहले आज भी बायसन का झुण्ड पानी पीने पहुँच जाता है. मेरा अनुमान था कि जलाशय के किनारे कीचड़ में बाघ के पदचिन्ह जरूर मिलेंगे. अभी ये सोच ही रहे थे की मेरा जांबाज दोस्त अर्जुन भोजवानी पहुंचा. वो कुछ उत्तेजित लग रहा रहा था.मैंने पूछा तब उसने बताया कि बाघ के पदचिन्ह खोजते हुए ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ अवैध लकड़ी कटाई हो रही थी, मना करने पर लकड़ी काटने वालों ने हमला दिया, जान बचाने पिस्टल से तीन गोली चलानी पड़ी है .

  हम सबने तय किया चलो कटाई करने वालों को सबक सिखाया जाए .इस इलाके में पिछले साल बाघों की गणना के लिए मैं  पीसीसीएफ [वन्यप्राणी] के था जिप्सी से आया था तभी एक दर्जन ग्रामीणों ने सड़क पार की, सबके कंधे पर कुल्हाड़ा था. मैंने साथ सफर कर रहे वनकर्मियों से उनको रोकने के लिए कहा और पूछा- ये कुल्हाड़ी क्यों ..? जवाब मिला जंगल में रक्षा के लिए. मैंने फिर पूछा, सबके पास और भारी लकड़ी कटाने वाली ही क्यों..? अब वो भागने लगे. पीछे के गाड़ी से दो-वन कर्मी उनको खदेड़ने थोड़ी दूर गया फिर वापस आ गए. शायद वे  जानते थे आगे जान खतरे में पढ़ जाएगी . मुझे बीते साल की ये घटना याद आ गई. बहरहाल दो जीपों में हम लोग रवाना हुए.

bagh 2करीब जीपें दो किलो मीटर बाद रुक गई आगे की राह दुर्गम थी और चढ़ाई पैदल तय करनी थी. कुछ दूर जाने के बाद दिनेश ठक्कर और डा.मोटवानी ने कहा हम जीप के लिए वापस जा रहे है वहां इंतजार करेंगे . बीटगार्ड साहू ,अर्जुन भोजवानी ,शरद पाण्डेय और मैं आगे बढ़ गये. तीन किलोमीटर के बाद भी कोई न दिखा और न पेड़ कटे मिले..न कटाई की आवाज ,पर अर्जुन के कहने से आगे बढ़े जा रहे थे .आखिर मैंने कहा- अर्जुन हम जंगल में  जितनी दूर आ गए हैं वहाँ से तो वापस जाना ही मुमकिन नहीं लगता. सबको बात सही लगी और फिर जारी हुआ वापसी के लिए जद्दोजहद का सिलसिला ,कभी सूरज को आधार मान के आगे बढ़ाते तो कभी नाले-नाले चले जाते तो किसी पगडण्डी पर चलने लगते .पानी की एक बोतल थी. वो भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गई. भूख लगाने लगी तो तेंदू के कुछ फल गिरे मिले कुछ तोड़े पर ये ऊंट के मुंह में जीरा सा था ..खाई फिर पहाड़ दर पहाड़  पग-पग तय करते गए. साथ गया बीट गार्ड नया था, जब राह न मिलती तो हम अपनी हताशा उस पर उतारते तो वो बोलता ‘भाई मरना है तो मार लो’ मैं भी ये जगह नहीं जानता’’ .. तय हुआ ऊँचे पहाड़ से किसी गाँव को देखें ..दोपहर ढलने लगी पर सूरज तप रहा था. किसी तरह पहाड़ पर चढ़ गए ,पर कोई गाँव दूर-दूर तक नजर नहीं आया. लेकिन मोबाइल पर हल्का सा कवरेज़ दिखा ..जंगल में मदद की लिए किसी को मोबाईल पर बात करना संभव न था लिहाजा बिलासपुर में अपने भटक जाने की खबर वन विभाग को दी और संभावित जगह बताई जहाँ हम लोग होंगे.

वन विभाग ने वायरलेस मेसेज अचानकमार में मौजूद आधिकरिओं को दिया और दो- तीन गाड़ियाँ हमें खोजने निकलीं. हम भी प्यासे चले जा रहे थे ,राह में एक नाले में जगह-जगह रुका थोड़ा पानी दिखा,पत्तों का दोना बना पानी पिया,खाली बोतल भी इसी पानी से भर ली. फिर मैं पानी पीने झुका और शर्ट की जब में रखा मोबाइल पानी में गिर गया. गंदले पानी से खोज कर निकला पर वो बंद हो चुका था. इसी नाले पर आगे बढ़ाते रहे, बाघ के पदचिन्ह खोजना भूल चुके थे. मेरे जूते का सोल उखड़ गया था .कुछ देर ठंडी छांव में बैठ ताकत बंटोर चलाते रहे.

शाम हो चली चली थी, तभी इंजीनिरिंग कालेज का एक छात्र नाले में वनकर्मी के साथ दिखा जो बाघ के पदचिन्ह खोजने आया था. वन कर्मी अनुभवी था. उसे जंगल की राहों का पता था. वो हमें सड़क की और ले आया..वो न मिलाता तो न जाने क्या होता. कुछ देर बाद हमें खोजने निकला दल भी इस राह से गुजरा उसने पस्त हो गये हमें पानी और कुछ खाने का सामना दिया. जान बची और लाखों पाए…! हम सिहावल सागर से मीलों दूर निकल चुके थे..बाद छपरवा पहुंचे जहाँ हमारी प्रतीक्षा हो रही थी..! एक बात और जंगल में कोई वन्य जीव तो न दिखा पर, ये भटकाव यादगार बन गया. तभी मैंने एक वन अधिकारी के मुंह से सुना वो वनकर्मी को डांट रहा था. ‘’साले तुम लोग पहले गाँव में जा कर क्यों नहीं बताते कि बाघों के गणना होगी लकड़ी काटने जंगल में लकड़ी कटाने न आना .।

                                                                                     ( घटना पुरानी पर यादें ताजा)

                   

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