बेपटरी तो नहीं हो गया शिक्षा विभाग….?क्या एक – दो अफसरों को हटाने से सुधर जाएगी बदहाली….?

बिलासपुर/रायपुर।छत्तीसगढ़ के  शिक्षामंत्री के ओएसडी और विशेष सहायक को हालिया हुए बखेड़ों के बाद  विगत दिनों हटा तो दिया गया है, लेकिन इससे समस्या का हल हो गया यह कहना सरासर बेमानी होगा। विधायकों और जनप्रतिनिधियों के खुलेआम विरोध के बाद दो अधिकारियों को हटा देने से सब कुछ पाक साफ हो गया हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है।प्रदेश में शिक्षा विभाग में तबादले के बाद भी तबादला बदस्तूर जारी है। समन्वय में अनुमोदन लेकर भी जहाँ लगभग 500 -700 कर्मियों का ट्रासंफर हो जाये,वहा आप समझ लीजिए कि आखिरकार माजरा क्या है ?  बहरहाल आज भी रेट लिस्ट के आधार पर तबादले की तैयार जंबो सूची का इंतजार किया जा रहा है….!सीजीवालडॉटकॉम के व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करे

जहां देखो  त्रुटि सुधार, संशोधन के नाम पर उगाही के हल्ले है। तबादले रुकवाने में भी लंबे फॉर्मूले लग रहे है। विभागीय सचिवालय और संचालनालय में अनेक शिक्षा माफिया सक्रिय मनमाने फैसले करवा रहे है जिससे एजुकेशन सिस्टम का भट्टा बैठा जा रहा है।

देश के विभिन्न राज्यों की एजुकेशन रेटिंग में छत्तीसगढ़ का स्थान पिछड़े श्रेणी वाले राज्यो में है। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों से दाखिले का अनुपात 5 गुना गिर गया है। विभाग के घटक राजीव गांधी शिक्षा मिशन में अधोसंरचना विकास के नाम पर केवल कागजों में सुविधाएं दी जा रही हैं। अधिकांश जिलों के मिशन कार्यालय कमीशन खोरी का अड्डा बने हुए हैं।

एक अदद इमानदार शिक्षक के लिए आज भी सेवानिवृत्ति के बाद ब्लॉक ऑफिस में बिना चढ़ावे के पेंशन की राशि निकालना भी दूभर कार्य है।

स्कुलो का हाल ऐसा है कि लैब हो या लाइब्रेरी ….ना तो प्रयोगशाला सामग्री का अता पता रहता है ना ही कोई किताबों का ठिकाना। मॉनिटरिंग कार्य के लिए रोज  नए-लागू होते हुए मोबाइल ऐप ग्रामीण स्तर के स्कूलों में ना केवल विद्यार्थी बल्कि शिक्षकों की समझ और पहुंच से बाहर है…एसएलए मूल्यांकन एवं निखार प्रशिक्षण को व्यवहारिक रूप में क्रियान्वित कराना ग्रामीण एवं सुदूर अंचलों में टेढ़ी खीर हो गया है…. नित नए प्रयोगों से दम तोड़ती सरकारी शिक्षा के सुधार के लिए प्रशिक्षण के नाम पर करोड़ों का वारा न्यारा  हो रहा सो अलग। 

स्कूलों में हाजिरी के नाम पर दिए गए टेबलेट धूल खा रहे हैं।अधिकांश संस्थानों का बायोमेट्रिक हाजिरी सिस्टम खराब पड़ा हुआ है। मुफ्त में खाना देने की योजना शालाओं में उपस्थिति का सबसे बड़ा आकर्षण है लेकिन गुणवत्ता की उम्मीदें करना कोरी बेमानी है। साल भर आयोजित होने वाले सैकड़ों प्रतियोगिताओं में खेलकूद  में केवल कुछ चेहरे ही हर जगह से बार-बार भाग लेते हैं। आधे से अधिक शालाओं के शिक्षक और विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धात्मक आयोजनों की न कोई जानकारी ही  होती न कोई रुचि लेते।

राजधानी के एसी ऑफिस और पांच सितारा होटल में बनने वाली योजनाओं, नीतियों कार्यक्रमों और निर्देशों का ग्रास रूट लेवल से कोई सरोकार नहीं होता …।संसाधनों के अभाव में यह योजनाएं ग्राम स्तर में पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है। स्थानीय प्राधिकारी किताबी एलानो को बोझ के रूप में लादे लादे पूरा साल निकाल देते है और यही क्रम चलते रहता है।

नौकरशाही की तमाम बुराइयों ने सरकार के  सबसे ज्यादा कार्मिकों की संख्या वाले स्कूल शिक्षा विभाग को जकड़ रखा है, जिसे व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए पार्ट टाइम मंत्री, शिक्षा सचिव और संचालक की बजाए फुल टाइम संचालन कर्ताओ द्वारा प्राथमिकता के आधार पर  फोकस करने की  नितांत आवश्यकता है, तब जाकर  शायद स्कूल शिक्षा विभाग की साख थोड़ी बहुत पटरी पर आ सके।

आज भले ही स्कूल शिक्षा विभाग के ओएसडी और विशेष सहायक  को मूल विभाग वापस कर दिया गया हो लेकिन यह तो  दो लोगो के सिर  गड़बड़ियों का ठीकरा फोड़ कर   हुए घालमेल की जिम्मेदारी से नजर फेरना ही हुआ….?
मार्च माह से शुरू आवेदनों पर तबादलो का सिलसिला अक्टूबर में अधूरा बताया जा रहा है, उधर शिक्षण  संस्थानों में अध्ययन कार्य बमुश्किल रेंग रहा हैं।

वैसे राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री का यह  फलदार विभाग शुरू से ही विवादों में  फलता फूलता रहा है. मंत्री बनने के बाद अपनी पत्नी को ओएसडी  बनाने के मामले में सबसे पहली बार इनकी किरकिरी हुई। बाद में  ओएसडी पर ठेकेदारों से खरीदी सामान सप्लाई में  मिलीभगत का  मामला आया। फिर कुछ ही दिनों में तबादलों की धंधे बाजी में सत्ता पक्ष के  नुमाइंदों ने ही सरकार की नाक में दम कर दिया।

पिछले दिनों एक  शासकीय दौरे पर ट्रेन में पैसों से भरा बैग गुम हो जाने को लेकर मंत्री टेकाम द्वारा प्रधानमंत्री मोदी  पर टिप्पणी किए जाने से भी खासा विवाद खड़ा हुआ था।  जिससे ठप पड़े विपक्ष को बैठे बैठाए सरकार के पुतले फूंकने के मौका मिल गया…विरोधियो एव विपक्ष का मानना है कि सामने आ रही  तमाम अव्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्कूल शिक्षा विभाग के मंत्री की भी है,पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सभी को साधने के चक्कर में ऐसे ही कुछ चेहरों को  ढोते ढोते अनजान बने रहे और आखिरकार जनता ने उन्हें ही बाहर कर दिया ।

नई सरकार के मुखिया को यह देखना होगा कि अगर कोई अपने  विभाग का संचालन व  नियंत्रण सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं तो समय रहते अन्य किसी  सदस्य को  दायित्व सौंप कर नयी शुरुवात करने में कही देर न हो जाए ।

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