बैंक को किसने डुबाया…अधिकारी या नेता ?

SAHKARITA_GRADE_VISUAL 003बिलासपुर— अजब है लेकिन सच है..कल सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल विभागीय समीक्षा बैठक लेंगे। काम काज की जानकारी हासिल कर कुछ कर्मचारियों को कुछ नया टिप्स भी देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या यह टिप्स अब ताला लगने के कगार पर पहुंचे जिला सहकारी बैंक के काम आएगा। यदि ऐसा हुआ तो बस एक ही बात कहा जाएगा कि अजब है लेकिन सच है।

                   सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल मंत्री बनने के बाद पहली बार बिलासपुर आ रहे हैं। सहकारिता विभाग में उनके स्वागत को लेकर आज जमकर रिहर्सल हुआ। व्यवस्था की छेद पर कर्मचारियों ने पैबंद लगाने का भरपूर प्रयास किया। काफी हद तक कर्मचारी मानकर चल रहे हैं कि वे अपने प्रयास में सफल हो गये हैं। क्या इन तमाम प्रयासों का अब कोई मतलब रह गया है।

                 यद्यपि सहकारी बैंक को पटरी पर लाने का भरपूर प्रयास किया गया। संचालक चुनाव के समय जमकर खरीद फरोख्त हुई। 9 निर्दलीय संचालक बैंक तक पहुंचे। डमी को अध्यक्ष बनाया गया। बाद में वह भी जालसाज निकला। पर्दे के पीछे से मास्टर माइंड इस खेल में कितना सफल हुआ अभी इसका खुलासा होना बाकी है। लेकिन इतना सच है कि पिछले पांच साल से चमचमाते सहकारी बैंक को लाइलाज बीमारी को दूर करने का प्रयास किसी ने नहीं किया। अधिकारियों ने तो बिलकुल नहीं किया। सहकारिता मंत्री को बैंक लाइलाज बीमारी का निदान कर पाते है या नहीं अब कल ही पता चलेगा। लेकिन अधिकारियों ने अपने बचाव का पूरा प्रबंध कर लिया ह।

                 जानकारी के अनुसार जिला सहकारी बैंक चार सौ करोंड़ के नुकसान में है। यदि किसान एक साथ अपनी जमा पूंजी मांग लें तो बैंक दीवालिया हो जाएगा। अधिकारी इस बात को भली भांती जानते हैं। प्रश्न उठता है कि लाखों रूपए प्रति माह वेतन पाने वाले अधिकारी आखिर बैंक की खस्ता हालत देखकर पांच साल तक चुंप क्यों रहे।

                 संभागीय पंजीयक ने सीजी वाल को बताया कि कुछ विशेष अधिनियम के तहत बैंक का कुछ मामला हमारे अधिकार में नहीं है। शायद वह अपना पीछा छुड़ाने के लिए ऐसा कहा हो। लेकिन अब बैंक घाटे में है तो इसका रोना वे क्यों रो रहे हैं। फिलहाल समझ से परे है। पिछले पांच साल में संभागीय पंजीयक ने सिर्फ बरबाद होते सहकारी बैंक का गवाह बनना उचित समझा। आखिर क्यों…उस समय इतनी सक्रियता उनकी क्यों नहीं रही। जितनी इन दिनों दिखाई दे रही है।

                       जानकारी के अनुसार संयुक्त पंजीयक ने जमकर लिखा पढ़ी की। लेकिन परिणाम कुछ नहीं हासिल हुआ। जो हासिल हुआ वह काफी भयावह है। सहकारी बैंक को अपेक्स बैंक ने ऋण देने से मना कर दिया है। किसानों के सामने अब विकट स्थिति पैदा हो गयी है। वे अब अपना ही रकम हासिल नहीं कर पा रहे हैं।

               संयुक्त संचालक पंजीयक ने सीजी वाल के प्रश्नों को टालते हुए कहा कि मैने पांच साल तक काम किया। जहां जरूरत पड़ी परामर्श भी दिया। इससे ज्यादा मैं क्या कर सकता हूं। लोगों की माने तो पंजीयक ने बैंक को बचाने के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग ही नहीं किया। आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया यह सोचने वाली बात है।

               पिछले पांच साल से पंजीयक कार्यालय के मुखिया बनकर बिलासपुर में गद्दीनसीन हैं। इस दौरान उन्होंने कर्मचारियों के हितों का बहुत ख्याल रखा। जिसने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया उसका वेतन रोक लिया।

                     ऐसा ही एक मामला उनके अधीनस्थ कर्मचारी पण्डा का है। जिसे पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला है। वह अपनी बीमारी का इलाज कर्ज लेकर करवा रहा है। कार्यालय की सेवा करने के बाद उनका ज्यादातर समय अस्पताल में गुजरता है। वह पिछले तीन महीने से वेतन नही मिलते से परेशान है। तात्कालीन कलेक्टर परदेशी ने संभागीय पंजीयक कार्यालय के मुखिया को फटकार लगाते हुए वेतन देने को कहा। लेकिन संभागीय पंजीयक ने कलेक्टर के आदेश को न मानते हुए मामले को सचिव के सामने भेज दिया। आज पण्डा अपने ही वेतन के लिए बिलासपुर से रायपुर का चक्कर काट रहा है। यदि उसने व्यक्तिगत रूप से पंजीयक से मिलकर बातचीत कर लिया होता तो पण्डा को इतनी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

               फिलहाल यह एक वानगी है पंजीयक कार्यालय की। देखना है पांच साल तक मानिटरिंग के बाद भी सहकारी बैंक की हालत आज ताला लगने की स्थित में क्यों पहंची इस पर मंत्री समीक्षा करते हैं या नहीं। समीक्षा के बाद ही समझ में आ जाएगा कि बैंक को किसने डुबाया अधिकारी या नेता। यदि नेता का नाम आया तो अजब है और अधिकारी का नाम आया तो कहेंगे गजब है।

Comments

  1. By shailesh upadhyay

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