हमार छ्त्तीसगढ़

भूख से मौत पर प्रशासन की लीपापोतीः कांग्रेस

SHRIMATI JOGI

रायपुर ।  पेण्ड्रा में कथित रूप से भूख से मौत की घटना की जांच के लिये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश  बघेल की ओर से गठित जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। विधआयक डॉ रेणू जोगी के संयोजकत्व में गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट जारी करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री और मीडिया विभाग के अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि गरियाबंद, नर्मदापुर (सरगुजा) और पेण्ड्रा में भूख से हुयी मौतों की जांच से स्पष्ट है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद छत्तीसगढ़ में गरीबों पर लगातार कहर बरपाया जा रहा है। पीडीएस का चांवल गरीबों तक नहीं पहुंच रहा है। मनरेगा के काम नहीं खोजे जा रहे है। किसान मजदूरों की और खासकर गरीबों की जमीनें हड़पी जा रही है। वास्तविक मालिकों को राहत नहीं मिल पा रही है। अधिग्रहित जमीन का दाम किसानों को नहीं मिल पा रहा है। पुर्नवास तो बहुत दूर की बात है।

पेण्ड्रा में जंगल सिंह की कथित रूप से भूख से मौत के मामले की जाँच के लिए गठित कमेटी में संयोजक डॉ. रेणु जोगी के साथ ही धरमजीत सिंह (पूर्व विधायक)  सियाराम कौशिक (विधायक)   विवेक बाजपेयी (सचिव, प्रदेश कांग्रेस कमेटी)    राजेन्द्र शुक्ला (अध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी, ग्रामीण)    श्रीमती अरूणा जायसवाल (अध्यक्ष, नगर पंचायत, पेण्ड्रा)  शामिल थे। जाँच टीम ने मृतक के परिवार से मुलाकात की साथ ही इससे जुड़े सभी तथ्यों के बारे में पता लगाया और अपनी रिपोर्ट सौंपी है। जिसमें कहा गया है कि जंगल सिंह अपने पारिवारिक हालात से परेशान था, उसे उसके गृह ग्राम मस्तूरी में मनरेगा या किसी अन्य साधन से रोजगार प्राप्त नहीं हो रहा था, राशन कार्ड में कटौती होने के कारण उसे मात्र 21 किलो (प्रति व्यक्ति 7 किलो) प्राप्त हो रहा था जिससे गुजारा चलना सम्भव नहीं था वह घर से भूखे-प्यासे काम की तलाश में निकला, उसके पास खाने को भी पैसे नहीं थे और घर से निकलने के दो दिन बाद पेण्ड्रारोड में भूख से उसकी मौत हो जाती है तब जब जनता के बीच इस बात को लेकर हल्ला फैलता है, मीडिया के लोग पहुंचते हैं तो आनन-फानन में सरकार और उनके पेण्ड्रा में बैठे नुमाइंदे जिसमें एस.डी.एम., तहसीलदार, बी.एम.ओ. उपस्थित इलाज करने वाला सकीय डॉक्टर सब सच्चाई छोड़कर शासन की भाषा बोलने लगते हैं और साधारण भूख से मौत को चोट से मौत एवं उसे मानसिक रूप से बीमार दिखाने का प्रयास प्रारम्भ कर देते हैं।
जाँच कमेटी के सामने जो दूसरा गंभीर मुद्दा  आया कि आखिर शासन ने मृतक जंगल सिंह को लावारिश कैसे घोषित कर दिया, मृत्यु के 24 घण्टे के भीतर उसे लावारिश घोषित कर उसे आनन-फानन में लावारिश शव मानकर कफन-दफन भी कर दिया गया और यह बात फैला दी गई कि पता नहीं यह व्यक्ति कौन है। अखबार में फोटो छपने एवं समाचार छपने के कारण दूसरे दिन मृतक जंगल सिंह के घरवाले पहचान कर पेण्ड्रा पहुंचते हैं और कपड़ा तथा अन्य साक्ष्यों से उसे पहचान लेते हैं कि मृतक जंगल सिंह था।
जाँच कमेटी का कहना है कि जिला प्रशासन छत्तीसगढ़ शासन के दबाव में भूख से हुई मौत को छिपाते हुए रिपोर्ट बदलने का कार्य करती रही। अखबारों को अलग-अलग अधिकारियों के द्वारा अलग-अलग जानकारी दी जाती रही, मृतक के शव को दबाव के तहत लावारिश घोषित कर दफना दिया गया। यह मौत छत्तीसगढ़ के आम आदमी की स्थिति को वास्तविक रूप दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ का निवासी यदि भूमिहीन है तो उसकी स्थिति क्या है ? छत्तीसगढ़ शासन की तमाम योजनाएं केवल और केवल कागजी हैं, जिसका लाभ गरीब परिवारों को नहीं मिल रहा है।

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