मौत पर कोहरामः आखिर क्या छिपा रही सरकार

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बिलासपुर—-आजादी के कुछ साल बाद किसी शायर ने तात्कालीन समय की परिस्थितियों पर अपनी पीड़ा को कुछ इस अंदाज में पेश किया था कि कहां तय था चरगां हर घर के लिए..कहां मयस्सर नहीं चरगां किसी घर के लिए…उन्होंने क्या सोच कर लिखा यह तो नहीं मालूम। लेकिन इतना सच है कि छत्तीसगढ़ में दो रूपए किलो चावल मिलने की बाद भी गरीब मर रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता था यदि गुमनाम मरने वालों पर किसी की नजर होती तो। अंबिकापुर के बाद अब पेन्ड्रा में जंगल सिंह की मौत ने प्रशासन को हिला दिया है। जैसे जैसे मामला तूल पकड़ता जा रहा है प्रशासन की किरकिरी होनी स्वाभाविक है। साथ में लीपा पोती भी। जंगल सिंह की मौत के बाद अब कुछ ऐसा ही हो रहा है।

यह कड़वा लेकिन सच है कि सरकार मौत के बाद ही जागती है। जब जागती है तो लीपा पोती का खेल शुरू हो जाता है। यह जानने का प्रयास नहीं किया जाता कि आखिर उसकी मौत क्यों और किसकी लापरवाही से हुई है। जंगल सिंह ठाकुर के मौत पर भी अब यही हो रहा है। बात प्रतिष्ठा की है तो.अब अपनी गलती को ढांकने के लिए चाहे झूठ बोलना पड़े या फिर किसी प्रकार के हथकंडों को ही क्यों ने अपनाना पड़े। सरकार और प्रशासन पूरी मुस्तैदी के साथ जुट गया है।

मस्तूरी के किरारी से जंगल सिंह ठाकुर पिछले दिनों पेंड्रा पहुंचा…क्यों गया लोगों के अपने अपने तर्क हैं। पेन्ड्रा में अचानक उसकी तबियत खराब हो गयी। खबर बिजली की तरह फैलती इसके पहले पेन्ड्रा प्रशासन ने आनन-फानन में पेंड्रा शासकीय अस्पताल में भर्ती कराया। जहां डाक्टरों ने उसकी मौत की पुष्टि कर दी। शुरूआती तौर पर मौत के कारणों पर प्रकाश डालते हुए एस.डी.एम पेंड्रारोड ने कलेक्टर को बताया कि जंगल सिंह की मौत सिर पर चोट लगने से हुई है। प्रभारी कलेक्टर ने यहा भी जल्दबाजी करते हुए बिना किसी चिकित्सीय जानकारी के रिपोर्ट को सीएम को भेज दिया। रिपोर्ट की सत्यता को जानने का प्रयास भी नहीं किया गया। दूसरे दिन बीएमओ ने कलेक्टर को रिपोर्ट दिया कि जंगल सिंह की दिमागी हालत खराब होने के कारण मौत हुई है।

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दो अलग-अलग रिपोर्ट का मतलब है कि जंगल सिंह की मौत को प्रशासन ने छिपाने की कोशिश तो कि लेकिन छिप नहीं पायी। लिहाजा प्रशासन की छवि ना बिगड़े आनन-फानन में अधिकारियों ने अपने  आकाओं के निर्देश पर जैसा चाहा वैसा रिपोर्ट लिख दिया। और अब वही अधिकारी रिपोर्ट की सत्यता को लेकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं.

 

मृतक का मासूम बेटा शिवम सिंह ने बताया कि उसका पिता जब घर से पेन्ड्रा गया था तो मानसिक रूप से बीमार नहीं था। आखिर दो दिन के भीतर वह मनोरोगी कैसे हो गया। शिवम ने सीजी वाल को बताया कि अधिकारी अपनी गलती को छिपाने के लिए मेरे पिता को पागल बना दिये हैं। जब मेरा पिता पागल था तो अब इतनी हाय तौबा क्यों । अधिकारी रोज मेरे घर क्यों आ रहे हैं। यदि वे लोग सही हैं तो मेरी मां और बहन से क्यों कहते हैं कि मीडिया के सामने कुछ मत कहना, सरकार तुम्हारी हर संभव मदद करेगी। जंगल सिंह के लड़के ने बताया कि नेताओं और अधिकारियों ने मेरे घर को पागलखाना बना दिया है।

 

जहां एक दिन पहले पेन्ड्रा एसडीएम ने जंगल सिंह की मौत का कारण चोट होना बताया था। दूसरे दिन कलेक्टर की दो सदस्यीय टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जंगल के सिर या शरीर के किसी भी हिस्से में चोट के निशान नहीं पाए गए हैं। लेकिन इस बात का उन्होंने जिक्र नहीं किया कि आखिर उसकी मौत क्यों हुई। जंगल सिंह का प्राथमिक उपचार करने वाले डाक्टर ने इन सबसे अलग रिपोर्ट दिया है कि मृतक के पेट में एक भी दाना नहीं था। शायद इसलिए उसकी मौत हुई है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर रिपोर्ट बनाने और भेजने की इतनी जल्दबाजी क्यों हुई। आखिर एसडीएम ने रिपोर्ट बनाने से पहले डाक्टर से जानकारी नहीं ली। क्या उसने भूख से हुई मौत को छिपाने के लिए झूठा रिपोर्ट बनाकर सीएम को भेज दिया। आखिर क्यों । यह प्रश्न अब सरकार के गले की फांस बन गयी है।

 

बहरहाल प्रदेश में भूख से मौत के इस दूसरे मामले ने सभ्य समाज को झकझोर के रख दिया है। ऊपर से मौत के असली कारणों पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लीपापोती करना शासन को मुंह चिढ़ाने से कम नहीं है। हर बार की भांति एक बार फिर हम उम्मीद करतें हैं कि जिम्मेदारों की जमीर जागे,पीडि़त परिवार को न्याय मिले और मामले में लीपापोती करनेवालों पर कठोर कार्रवाई हो ताकि फिर किसी गरीब के भूख से मौत की पीड़ा को कोई तमाशा बनाने की हिम्मत भी ना करे..

 

मेरे पिता पागल नहीं थे….शिवम् सिंह…मृतक का बेटा

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           मेरे पिता पागल नहीं थे। प्रशासन के अधिकारी पागल बताकर अपनी गलतियों को छिपा रहे हैं। रोज मेरे घर बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं। जब हम भूख से मर रहे थे तो ये लोग कहां थे। मुझे न्याय चाहिए।

 

चोट के निशान नहीं पाए गये…डी.आर कश्यप—तहसीलदार

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जंगल सिंह के शरीर पर कहीं भी चोट के निशान नहीं मिले हैं। हमने इसकी सूचना अधिकारियों को दे दी है। आगे की कार्रवाई अब जिला स्तर के अधिकारियों ही करेंगे।

 

चोट के निशान नहीं मिले…..राजेश श्रीवास्तव–पेंड्रा थाना प्रभारी

जंगल सिंह की मौत चोट से नहीं हुई है। शरीर के किसी हिस्से में चोट के निशान नहीं पाये गये है। चिकित्सकों ने भी बताया कि जांच के दौरान उसके शरीर पर कहीं भी चोट के निशान नहीं हैं।

भूख से हुई मौत— डॉ. हेमन्त उपाध्याय..

doctor.

जंगल सिंह को जब अस्पताल में लाया गया तो उसकी मौत हो चुकी थी। शरीर पर चोट नहीं थे। जांच के बाद जो तथ्य सामने आये हमने इसकी जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों को दे दी है। इतना सच है कि उसके पेट में एक भी दाना नहीं था।

 

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