मेरा बिलासपुर

रजवा़ड़े को मिला देवेन्द्र का आशीर्वाद…

election_sahkariबिलासपुर–वेवपोर्टल की दुनिया में प्रदेश में अपनी एक अलग पहचान बना चुके सीजीवाल.काम की खबरों को एक बार फिर सभी ने गंभीरता से लिया है। समाचार,विचार,संवाद का सबसे सशक्त माध्यम बन चुके सीजीवाल.कॉम ने सहकारी बैंक के चुनाव को लेकर जिन बातों को आलेख के जरिए सबके सामने रखा था वह अक्षरसः सच साबित हुआ।

         सीजीवाल ने 2 सितम्बर मतलब मतदान की तारीख को अपने लेख में कहा था कि सहकारी बैंक पर देवेन्द्र पाण्डेय का ही कब्जा होगा। बिलकुल वैसा ही हुआ। यह सच है कि उस समय देवेन्द्र पाण्डेय को दुरपा सहकारी समिति की प्राथमिक सदस्यता से निकाल दिया गया था। देवेन्द्र  चुनाव की दौड़ से भी बाहर हो चुके थे। बावजूद इसके सीजीवाल.क़ॉम ने लिखा कि निर्विरोध जीतने वाले सभी प्रत्याशी देवेन्द्र पाण्डेय के ही हैं। बिल्हा और पथरिया-मुंगेली चुनाव में कौन जीतेगा इसका भी एलान सीजीवाल.काम ने कर दिया था। कुल मिलाकर कोरम के सभी संचालक पूर्व चेयरमैन के ही जीत के आएंगे।

             संगठन हारा प्रत्याशी जीता आलेख में सीजीवाल ने अपने पाठकों को बताया था कि संगठन के प्रत्याशी को देवेन्द्र समर्थक प्रत्याशी ने ही बिल्हा में एक मात्र वोट से हराया। संचालक पदों के चुनाव परिणाम के बाद सीजीवाल की टीम ने लिखा था कि अध्यक्ष चुनाव में रामकमल सिंह पूर्व चेयरमैन के रास्ते में रोड़ा बन सकते हैं। लेकिन सहकारी बैंक का अध्यक्ष कोरबा क्षेत्र का ही होगा। आज का परिणाम भी वही आया। रामकमल सिंह ने बाद में अपना नाम अध्यक्ष की दौड़ से वापस लेकर सीजीवाल की खबर को सच कर दिया।

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           सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यदि ऐसा नहीं होता तो सहकारी बैंक की वागडोर ओआईसी के हाथों में चली जाती। जबकि इस बात को पहले से ही जान रहे सहकारिता के दिग्गजों ने चुनाव से अपने आप को दूर ही रखा था। कारण भी स्पष्ट था कि बैंक इस समय जिस दौर से गुजर रहा है उसका सरताज बनने का अर्थ है कि आ बैल मुझे मार । सबको मालूम था कि सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनना.. मतलब… कांटों का ताज पहनना है।

        यह सच है कि इस समय बैंक को देवेन्द्र की और देवेन्द्र को बैंक की बहुत जरूरत है। यदि दोनों एक दूसरे से दूर हुए तो नुकसान भी दोनों को ही है। खासतौर पर किसानों को कुछ ज्यादा ही नुकसान होता।

           यद्पि देवेन्द्र पाण्डेय इस सिनारियों में कहीं नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि कोरम के सभी संचालकों के पीछे देवेन्द्र ही खडें हैं। समझा जा सकता है कि ऐसा क्यों। बाद में देवेन्द्र पाण्डेय ने कोर्ट से स्टे भी हासिल कर लिया। संभावना ही नहीं पूरा विश्वास है कि देवेन्द्र को कोर्ट से राहत भी मिलेगी। अंत में मुन्नालाल को गद्दी छोड़ना पड़ेगा।

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