राजपूत बनाकर बेच दी आदिवासी फौजी की जमीन…बेखबर प्रशासन,खरीददार कौन ?

tehsil-bspबिलासपुर— बिलासपुर कार्यालय में कुछ भी हो सकता है। तहसील के होनहार चाहे तो जाति धर्म क्या…किसी. की वल्दियत भी बदल सकते है। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे….। जमीन को ठिकाने लगाने क्रेता विक्रेता और तहसील कर्मचारियों ने फौजी आदिवासी को रिकार्ड में सामान्य बना दिया। बाद में आदिवासी की जमीन को बेच भी दिया।

                अब इस जमीन पर नजूल आरआई पदुमलाल पाटनवार की बेटी का कब्जा है। प्रश्न उठता है कि क्या इस जमीन में आरआई की भूमिका है। क्योंकि जिस जमीन पर आरआई की बेटी काबिज है..उसे तहसील कार्यालय ने सरकारी जमीन मानते हुए बेदखली का आदेश दिया है। दस्तावेज में जमीन का मालिक एक फौजी आदिवासी है।..प्रश्न उठता है कि आदिवासी की जमीन आखिर गयी कहां….। क्योंकि उस जमीन को कभी भी बेचा नहीं जा सकता है। बावजूद इसके जमीन को तहसील कार्यालय के होनहारों नें बेंच दिया है।

                                रमतला स्थित खसरा नम्बर 1361 की जमीन इन दिनों विवादों में है। जानकारी के अनुसार जमीन के पास खसरा नम्बर 1355 में 9 डिसिमिल जमीन ज्योति पाटनवार की है। पास का फायदा उठाकर पदुमलाल पाटनवार की बेटी ने खसरा नम्बर 1361 के पांच एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया है। लोगों की शिकायत के बाद तहसील कार्यालय ने बेदखली का आदेश दिया। बावजूद इसके महीनों बाद भी बेदखली नहीं हुई। आरआई पाटनवार ने ऐन केन प्रकारेण बेदखली आदेश को ही  बेदखल कर दिया है। एक बार फिर तहसील प्रशासन बेदखली को लेकर सक्रिय है। पाटनवार का कहना है कि तहसील का आदेश गलत है। क्योंकि वह सरकारी नहीं बल्कि कश्यप की जमीन पर काबिज है।

                       शायद प्रशासन को नहीं मालूम कि जिस जमीन को कश्यप का बताया जा रहा है वही जमीन किसी समय कलाराम गोंड की हुआ करती थी। कलाराम गोंड़ को राजपूत बनाकर खसरा नम्बर 1361/3 को कश्यप को बेचा गया। कश्यप की जमीन पर इस समय पाटनवार काबिज हैं। जिसे तहसील महकमा सरकारी बता रहा है।

कौन है कलाराम गोंड

                कलाराम गोंड आदिवासी फौजी था। सरकार ने उसे 1-अ/19 के तहत रमतला में 5 एकड़ जमीन दी। कलाराम के भाई द्वारिका सिंह गोड़ को भी 1969 में पांच एकड़ जमीन दी गयी। फौजियों को सरकार के निर्देश में नियमों के तहत कलेक्टर के आदेश पर जमीन दी जाती है। लेकिन इसके खरीद फरोख्त पर फाबंदी है। कलेक्टर के निर्देश पर ही इसमें परिवर्तन किया जा सकता है। लेकिन कलाराम की यह जमीन 2012 के आसपास कवर्धा के किसी कश्यप ने खरीद लिया।

आदिवासी को बनाया राजपूत

                             1969 दस्तावेज के अनुसार 1361/3 में कलाराम पिता सुखसिंह गोड़ आदिवासी है। दलालों ने कलाराम को राजपूत बनाकर जमीन को कवर्धा निवासी नाबालिग रमाकान्त कश्यप को बेच दिया। दस्तावेज में बताया गया है कि कलाराम क्षत्री जाति का है। उसने अपने बेटे जबलपुर निवासी हरभजन सिंह राजपूत को मुख्तयारनाम बनाया है। हरभजन सिंह ने मुख्तयारनाम की हैसियत से जमीन को कवर्धा निवासी कश्यप को बेच दिया। मजेदार बात है कि आज जिस जमीन पर ज्योति पाटनवार काबिज हैं। वह कश्यप की ही है। सरकार को लगता है कि जमीन सरकारी है..जबकि जमीन फौजी आदिवासी कलाराम गोड़ की है। जिसे राजपूत बनाकर बेचा गया।

जमीन बिक्री में जालसाजी

                   सवाल उठता है कि कलाराम को दस्तावेज में राजपूत और क्षत्री क्यों बताया गया। जबकि 1969 के दस्तावेज में कलाराम और उसके भाई को गोंड़ बताया गया है। उसी जमीन को बिलासपुर तहसील में राजपूत बनाकर रमाकान्त कश्यप को बेचा गया..जमीन का खसरा नम्बर भी 1361/3वही है। आखिर इतनी ब़ड़ी जालसाजी क्यों…. पदुमलाल ने बताया कि उनकी बेटी कलाराम गोंड़ की जमीन में नहीं बल्कि कश्यप की जमीन पर काबिज हैं। सवाल उठका है कि क्या यह जमीन उसी कलाराम की तो नहीं..जिसे फर्जी तरीके से कवर्धा के कश्यप को बेचा गया।

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