मेरा बिलासपुर

लोक – सांस्कृतिक जड़ों की तलाश में ” मड़ई ” की अलग पहचान

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बिलासपुर । देवउठनी एकादशी के साथ ही अँचल में रावत नाच की भी शुरूआत हो गई है। बिलासपुर इलाके में इसकी अलग ही पहचान है। यहां आयोजित होने वाले रावत नाच महोत्सव ने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। इस आयोजन के साथ ही रावत नाच महोत्सव  समिति की ओर से पिछले कोई 28 बरसों से पत्रिका मड़ई का प्रकाशन किया जा रहा है। इस पत्रिका  की लोक के रेखांकन के रूप में सांस्कृतिक-साहित्यिक क्षेत्र में अपनी अलग ही छाप है।छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर के कलमकारों की रचनाएँ इसमें छपती हैं और शोधार्थियों के लिए भी यह पत्रिका मददगार साबित हो रही है। इस बार फिर लोक-साहित्य प्रेमियों को मड़ई का इंतजार है।

रावत नाच महोत्सव समिति के संयोजक डा. कालीचरण यादव मड़ई के सम्पादक हैं। सम्पादक मंडल में डा. राजेश्वर सक्सेना, डा. रामगोपाल यादव, रफीक खान,रमेश अनुपम और जीवन यदु शामिल हैं। संपादन में शोभित बाजपेयी, प्रताप ठाकुर और माखन लाल यादव का सहयोग मिलता रहा है। वरिष्ठ पत्रकार पियूष कांति मुकर्जी और केशव शुक्ला के विशेष सहयोग रहा है। यह रावत नाच महोत्सव समिति का वार्षिक-अव्यावसायिक प्रकाशन है।

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मड़ई के पिछले अंकों पर जो प्रतिक्रियाएं छपी हैं , उन पर गौर करें तो लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ इस पत्रिका की पहुंच है ,बल्कि लोगों ने देश की लोक परंपराओँ के दर्पण के रूप में इसे सराहा भी है।रायपुर के जाने-माने साहित्यकार विनोद शंकर शुक्ल लिखते हैं कि इतिहास केवल नायकों को याद करता है, जबकि लोक साहित्य उन साधारण लोगों को भी , जिनके बल पर नायकों का जन्म होता है।चूंकि लोक साहित्य की रचना भी लोक करता है इसलिए वह इतिहास से ज्यादा प्रामाणिक और निरपेक्ष होता है। मड़ई निसंदेह हमारे बहुरंगी और बहुभाव भूमियों वाली समावेशी संस्कृति को उजागर करने वाली पत्रिका है।

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असम विश्वविद्यालय, शिलचर से शुभदा पांडेय ने लिखा कि आंचलिक भाषाएं अब की पीढ़ी से विदा हो चुकी हैं, वे गायेंगे क्या ? और वे इन भाषाओँ को बोलने में लज्जा भी महसूसस कर रहे हैं। भाषाओँ के समाप्त होने का दर्द कमजोर नही है, पर हम सब यह दीप जलाए रखेंगे, जिससे मड़ई जगमगाती रहे। इसी तरह मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच -दिल्ली के राष्ट्रीय संयोजक सुधीर सिंह की कलम से- देश की लोक संसकृति को जब विकृत करने में कुछ लोग लगे हुए हैं, वहीं लोक संसकृति के मूल स्वरूप को बचाए रखने में मड़ई का प्रयास स्वागत योग्य है।

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हरियाणा के टोहाना- जिला फतेहाबाद से रामलाल महमी लिखते हैं कि-विलुप्त होने के कगार पर खड़ी लोक विधाओँ में जान डालने के जो निरंतर प्रयास मड़ई के द्वारा किए जा रहे हैं,उनको साहित्य के इतिहास  में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।गुरूनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर  के डा.सुनील कुमार ने लिखा कि ऐसे समय में जब हमारा समाज , सांस्कृतिक सवालों के घेरे में है,मड़ई का प्रकाशन किसी संजीवनी से कम नहीं है। जड़ों की तलाश और जड़ों से जुड़ाव का आपका यह विनम्र, गंभीर व पावन प्रयास स्तुत्य है। वासुदेवपुर दरभंगा विहार के डा. जीतेन्द्र राय लिखते हैं कि वर्तमान में लोग भूमण्डलीयकरण और शहरीकरण के कारण अपनी मूल-संस्कृति से अलग होकर फैशनवाद का दामन थामते जा कहे हैं। इस दौर में आपकी यह पत्रिका लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन हेतु लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाली ही नहीं बल्कि उसे अपनी मूल संस्कृति को समझने और जुड़ने के लिए प्रेरित करने वाली है।

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427302_102193816574445_1450316517_nमड़ई के सम्पादक डा. कालीचरण यादव कहते हैं कि लोक कलाओँ की जीवंतता बनी रहे । वे अधिक प्रासंगिक बन सकें इसके लिए यह आवश्यक है कि समाज में साहित्य  के समानांतर लोक का भी विमर्श होना चाहिए । लोक के प्रति हमारी उदासीनता के कारणों पर विचार होना चाहिए । मड़ई इस दिशा में ही एक प्रयास है।

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