मेरा बिलासपुर

लोहार की थाली पर आखिरी कील …..

 

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                   इन दिनों शहर में सरकारी अमला बेजा-कब्जा हटाने का अभियान चला रहा है। कई सड़कों के किनारे साफ हो गए हैं…। आने-जाने वाले खुश हैं। साफ-सुथरी ,चौड़ी सड़कें सभी को अच्छी लगती हैं। लेकिन इस मुहिम ने कई लोगों की रोजी-रोटी भी छीन ली है..। यह सही है कि सड़क पर अपना धंधा फैलाकर कुछ लोग राहगीरों के लिए दिक्कत पैदा करते हैं और उन्हे ऐसा करने के रोका जाना चाहिए। मगर रोक-थाम तो तब ही कारगर ही जब पहले ही दिन रोक दिया जाए..। कहर तो तब टूटता है जब किसी परिवार के दो जून की रोटी का सहारा बन चुके किसी आशियानें को जमींदोज कर दिया जाता है…..और बेबस सवालों के साथ कई जिंदगियां फिर पूरी व्यवस्था की ओर ताकती रहती हैं।

कुछ ऐसा ही हुआ है, मुंगेली रोड पर मंगला चौक के आगे एक लोहार के साथ….। सड़क किनारे की दुकान में  न जाने कितनी बार गरम लोहे को नई-नई शक्ल देने वाले लोहार की थाली में सरकारी मुहिम ने आखिरी कील ठोककर ऐसी  भयानक सूरत बना दी है कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा है…। इस पर कलम चलाई है, किशोर सिंह ठाकुर ने—। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे किशोर सिंह इन दिनों डा. सीवी रामन् विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं..। सोशल मीडिया पर प्रकाशित उनकी भावनाओँ को जस-का-तस पेश कर रहे हैं।

( सीजीवॉल)   

kishor fb

किशोर सिंह का लिखा……

मित्रों,

विश्वविद्यालय आने के लिए मैं मंगला चौंक से कुछ दूर आगे तक तक बाइक से आता हूं और यहां पर एक लोहार की छोटी सी छत में टपरी और बोरे के दीवार से बनी दुकान में कुछ देर बैठ कर अपने साथियों का इंतजार करता हुं….।  फिर हम सभी यहां से चार पहिया वाहन में विश्वविद्यालय के लिए रवाना होते हैं। हर दिन यहां इंतजार के लिए बैठने के कारण लोहार से अच्छी जान पहचान हो गई है और उसका हाल भी जानता रहता हुं।

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कुछ दिन पहले लोहार ने बताया था कि विश्वकर्मा पूजा के दिन वह अपने औजार और दुकान की पूजा करेगा और दो दिन तक दुकान बंद रहेगी। अपनी रोजी रोटी के देवता की पूजा करने और परिवार के साथ समय बीताने की बात से काफी खुश था। विश्वकर्मा पूजा और उसके दूसरे दिन मैं हर दिन की तरह उसकी दुकान में अपने साथियों का इंतजार करने के लिए ठहरा…., तो मैंने देखा कि दुकान पर लोहार नहीं था। उस टपरीनुमा दुकान की जमीन पर गोबर से लिपाई हुई थी। दुकान में तोरण व झंडे लगे हुए थे और दीवार पर भगवान विश्वकर्मा के चित्र पर पूजा हुई थी। लोहा गर्म करने की भट्टी में चंदन और गुलाल लगा था और पूरे दुकान में फूल थे। मुझे उसकी काम के प्रति आस्था अच्छी लगी तो मैंने उसे दिखाने के लिए अपने मोबाइल पर दुकान की तस्वीर ले ली।

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इसके बाद जब तीसरे दिन लोहार की दुकान पर पहुंचा तो देखा कि वो टपरीनुमा दुकान तोड़ दी गई है और वह लोहार भी आस-पास नजर नहीं आया। मैंने स्थाई दुकान वालों से जानकारी ली तो पता चला कि निगम के बेजाकब्जा तोडू अमले ने उसकी दुकान तोड़ दी है और वह आज नहीं आया है। मैंने सोचा एक दो दिन में मुलाकात हो जाएगी लेकिन आज भी दुकान में कोई नहीं था, मैंने मोबाइल पर खाली दुकान की फिर से तस्वीर ली। विश्वविद्यालय आते समय मेरा मन उसकी दुकान में ही था, कि लोहार का क्या होगा और उसकी रोजी कैसे चलेगी। मैं विकास की परिभाषा तो नहीं जातना पर अब तक जो देखकर समझ आ रहा है कि गगनचुंबी ईमारते, शॉपिंग मॉंल, चौड़ी – सड़के, फर्राटे भरते चमचमाते वाहन,बजबजाती लोगों की भीड, खत्म होती हरियाली, बढ़ता प्रदूशण, मनुष्य को थका देने वाली जीवन शैली,फ्लैट में सिकुड़ता परिवार, सामाजिकता खत्म कर बढ़ता बाजारवाद और खत्म होती मानवता ही विकास है।

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तो इस विकास की भेंट एक और परिवार चढ़ गया है। जो तपती गर्मी, मुसलाधार बारिश और कड़कडती ठंड में सुबह से रात तक लोहे को पीट-पीट कर दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करता है। न जाने कितने ऐसे परिवार हैं जो इस पीड़ा को सह रहे हैं और कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं हैं। किसी के परिवार के रोजी रोटी का साधन छिन कर क्या विकास हो सकता है…? इस कीमत में शहर का विकास करना सही होगा…? यह बात अलग है कि विकास के नाम पर कागजी दावों में इठलाने वाले जिम्मेदार लोग क्या तय करते है, लेकिन यदि विकास ही करना है तो उसकी एक प्रक्रिया तय होनी चाहिए। जिसमें इस प्रक्रिया में प्रभावित होने वाले लोगों का जमीनी सर्वे हो, इसके बाद एक निश्चित समय तय कर ऐसे लोगों को विस्थापित किए जाने की जरूरत है। जिससे उनकी रोजी रोटी भी चलती रहे। लोहार के दुकान की दोनों तस्वीर पोस्ट कर रहा हुं एक में तोरण से सजी दुकान है और दूसरे तस्वीर में उजड़ी दुकान।

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