शाह का संकेत..विधायकों के कामकाज की होगी समीक्षा..भाजपा नेताओं की उड़ी नींद…?

बिलासपुर(वरिष्ठ पत्रकार अमित मिश्रा) — भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उड़ीसा दौरे के दौरान रायपुर आते-जाते छत्तीसगढ़ में पार्टी की सरगर्मी से लेकर बेचैनी तक बढ़ा दी। शाह ने जाते वक्त एयरपोर्ट पर दिग्गज भाजपाइयों से चुनावी तैयारी को लेकर मंत्रणा की तो लौटते वक्त चुनाव से सम्बंधित हर तरह की रपट मांगी। टिकट वितरण के समय इसके आधार पर प्रत्याशी तय करने में सावधानी बरती जा सके। खबर है कि छत्तीसगढ़ की तरह लोक सुराज अभियान और संगठन के जनसम्पर्क अभियान को अन्य भाजपा शासित प्रदेशों में लागू करने की बात कहकर पार्टी अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और प्रदेश संगठन की हौसला अफजाई की है। लगे हाथ गोपनीय सर्वे की वे तमाम रपट तलब की जो विभिन्न स्तरों पर तैयार की गई हैं।

                         सर्वे में मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन, उनकी छवि और चुनावी सम्भावनाओं पर आधारित है। सम्भावित उम्मीदवारों को लेकर भी पुख्ता जानकारी जुटाई गई है। सारी कसरत यह जानने की है कि कितने विधायक फिर से जीत पाने की स्थिति में हैं और कितनों को टिकट देना घाटे का सौदा साबित हो सकता है। मौजूदा विधायकों में जहां रिपोर्ट नकारात्मक होगी, वहां दमदार विकल्प तलाशना पहली अनिवार्यता है। इसलिए संगठन अपने स्तर पर अच्छी छवि, व्यापक जनाधार वाले जुझारु विकल्प तलाशने कड़ी मेहनत कर रहा है।

              मौजूदा विधायकों की टिकट भाजपा पहले भी काटती रही है। ऐसा होने पर आरम्भिक विरोध भी होता रहा है । लेकिन पार्टी इसे शांत करने की युक्ति निकाल लेती है। पिछली बार भी कई विधायकों की टिकट काटी गई थी, इसे लेकर काफी असंतोष उभरा था। लेकि तब बागियों के लिए कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था। वैसे कांग्रेस में भी टिकट को लेकर काफी महाभारत मची थी और वहां के असंतुष्ट अपने-अपने काम में लग गये थे। यहां प्रसंग भाजपा के सम्भावित प्रत्याशियों का है तो याद दिला दें कि वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा अपने सभी तत्कालीन विधायकों के बारे में बारीक मैदानी स्थिति से या तो वाकिफ नहीं थी अथवा चेहरा देखकर ‘‘टिकट और कट’’ का फार्मूला परवान चढ़ा। क्या भाजपा यह स्वीकार सकती है कि उसे तत्कालीन मंत्री रामविचार नेताम, हेमचंद यादव, लता उसेण्डी, पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर और रेणुका सिंह जैसे धुरंधर नेताओं की मैदानी स्थिति के बारे में सटीक जानकारी नहीं थी या फिर पार्टी को यह भरोसा था कि ये अपने दम-खम पर बाजी मार लेंगे या कि इन्हें टिकट देने में कोई चूक हो गई ?

                           दरअसल इस बात की कोई गारंटी नहीं रहती कि कोई दमदार प्रत्याशी किसी चुनाव विशेष में जीत ही जायेगा। हो सकता है, वह किन्हीं कारणों से हार भी जाये। छत्तीसगढ़ में भाजपा  प्रदेश अध्यक्ष रहे विष्णु देव साय विधानसभा चुनाव हार गये..लेकिन कुछ ही समय बाद लोकसभा चुनाव में धमाकेदार जीत भी हुई। साय आज  केन्द्र में मंत्री हैं। हार की सूची में सरोज पाण्डेय जैसी जबरदस्त मैदानी नेता का भी नाम है। लेकिन अब वे पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सांसद हैं। विधानसभा चुनाव हारने वाले रामविचार नेताम भी पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद हैं। कई बार अघोषित कारणों से दिग्गज उम्मीदवार हार जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में नेताम, कंवर, रेणुका, हेमचंद और लता के साथ भी सम्भवतः यही हुआ। ऐसा ही कुछ लोस चुनाव में सरोज पांडेय के साथ हुआ।

                      चुनाव में जीत-हार तो चलती रहती है। अजीत जोगी जैसे धुरंधर चंदूलाल साहू से हार गये तो सरोज ताम्रध्वज साहू से। हारने वाला अपने हुनर से दूसरी बाजी जीत ही जाते है। बात यह नहीं कि कोई भी पार्टी जिसे टिकट दे, वह जीतेगा ही। चुनाव परिणाम कई कारणों से प्रभावित होते हैं। वरना देश में विपक्ष बचेगा ही नहीं। बात यह है कि टिकट उन्हें दी जाये जो पार्टी की कसौटी पर खरा उतरने का माद्दा रखते हों। मौजूदा  विधायक स्वयं को जीत की गारंटी मानते हैं तो टिकट की कतार में लगे नेता उनकी विफलताओं को पार्टी के लिए घातक मानकर अपने लिए टिकट मांगते हैं। इस बार चुनाव काफी जटिल हैं। सियासी समीकरण बदले हुए हैं। लगातार 15 बरस की सत्ता से कहीं कुछ क्षेत्रों में नाराजगी भी है। पार्टी का शिखर नेतृत्व मौजूदा विधायकों को अच्छे से परख लेना चाहता है। प्रदेश भाजपा को सावधानी बरतनी होगी कि अपने विधायकों के कामकाज का निष्पक्ष विश्लेषण करे।

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