शिक्षा कर्मियों का हक छीनने कब-कब हुई नियमों की अनदेखी…? केशकर ने संचालक के सामने पेश किए दस्तावेज

रायपुर । शिक्षा कर्मियों की मांगों के संबंध में शिक्षा कर्मी संगठन  शिक्षक पंचायत/ नगरीय निकाय संघ छत्तीसगढ़ के प्राताध्यक्ष डॉ. गिरीश केशकर ने दस्तावेजी प्रमाण के साथ पंचायत संचालक को सुझाव पेश किए हैं। जिसमें सभी शासकीय शिक्षकों का विभाग एक कर सभी को एक समान सुविधाएँ प्रदान करने औऱ पदोन्नति के साथ ही क्रमोन्नत वेतनमान देने की माँग की गई है। संगठन ने दस्तावेजों के साथ पंचायत संचालक के सामने यह बात रखी कि किस तरह शिक्षा कर्मियों को उनके हक से वंचित रखने के लिए नियमों की अनदेखी की गई। इसका पूरा ब्यौरा पेश किया गया है।

सिलसिलेवार सुझाव में कहा गया है कि शासकीय शिक्षकों एवं शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग का एक ही विभाग करके समान सेवा शर्तें, समान वेतनमान, भत्ते एवं सभी सुविधाएं प्रदान  की जाए। भारत के पवित्र संविधान में हुये 73 वें संसोधन के तहत अविभाजित मध्यप्रदेश में संविधान संसोधन का पालन करते हुए सभी स्कूलों को शाला, भवन एवं स्टाफ सहित पंचायतों को सौपे जाने के आदेश- निर्देश जारी किये गये थे। 1 नवंबर सन 2000 को पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के उदय होने के पश्चात छत्तीसगढ़ राज्य के द्वारा भी उक्त संविधान संसोधन को अपनाया गया है और प्रथम अधिसूचना में अविभाजित मध्यप्रदेश के सभी नियमों को तब तक के लिये अंगीकृत किया गया था जब तक छत्तीसगढ़ राज्य का अपना कोई नियम नहीं बना लिया जाता। उक्त तथ्यों के आधार पर शासकीय शिक्षक एवं पंचायत विभाग के शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग एक ही विभाग के होने चाहिये एवं सेवा शर्ते, वेतनमान, भत्ते एवं सभी सुविधाएं समान होना चाहिये। 24 अप्रैल 2001 को तात्कालिक शिक्षा सचिव  डी.एस. मिश्र के द्वारा एक आदेश जारी कर शिक्षा विभाग की पुर्ववत व्यवस्था स्थापित किये जाने के संबंध में आदेश जारी किया गया। नियमतः संविधान में हुये संसोधन और उसे राज्य में अंगीकृत किये जाने के बाद किसी अधिकारी द्वारा उसे बिना संविधान में पुनः संसोधन के बदले जाने का अधिकार नही होना चाहिये था। अगर ऐसा आदेश जारी किया जाना विधि संगत है तो शिक्षा कर्मियों की भर्ती स्कूल शिक्षा विभाग के स्कूलों में पंचायतों के बजाय स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा ही किया जाना था। उक्त सभी तथ्यों का सीधा अभिप्राय यह है कि प्रारंभ से ही शिक्षाकर्मियों के साथ भेदभाव कर उनका शोषण किया जाता रहा है। ये भेदभाव और विसंगति दूर किया जाकर शासकीय शिक्षकों और शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग का एक ही विभाग करके सेवा शर्ते, वेतनमान, भत्ते एवं सभी सुविधाएं एक समान किया जाना चाहिये।

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि शिक्षा विभाग के सहायक शिक्षक, शिक्षक एवं व्याख्याता के पद माननीय उच्चतम न्यायालय में अविभाजित मध्यप्रदेश शासन के द्वारा एक हलफनामा देकर उक्त पदों को मृत संवर्ग (डाईंग कैडर) घोषित किया गया ।जो छत्तीसगढ़ राज्य में भी वे पद छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम अधिसूचना के अनुसार मृत संवर्ग (डाईंग कैडर) ही है। डाईंग कैडर का तात्पर्य जैसे जैसे वे शिक्षक रिटायर होते जायेगे या उक्त पद धारित शिक्षक की मृत्यु पश्चात वो पद स्वमेव समाप्त होता जायेगा। जब छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उन मृत संवर्ग पदों पर जो पद रिक्त हैं ही नही शासकीय शिक्षकों को बड़ी संख्या में पदोन्नति दी गई । क्या कभी उन मृत संवर्ग पदों को छत्तीसगढ़ राज्य में पुर्नजीवित किया गया है? जब मृत संवर्ग पदों पर शासकीय शिक्षकों को पदोन्नति दिया जा सकता है तो फिर उन पदों पर शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग का संविलियन करने में कोई अड़चन नहीं होना चाहिये। अतः शासकीय शिक्षक एवं पंचायत विभाग के शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग एक ही विभाग कर सभी के वेतन भत्ते, सेवा शर्तें एवं सुविधाएं एक समान किया जाना चाहिये। माननीय उच्चतम न्यायालय का भी सभी प्रकार के शिक्षकों को समान काम के बदले समान वेतन दिये जाने और भेद भाव नहीं किये जाने का आदेश एवं निर्देश है।

उन्होने वेतन पुनरीक्षण में 8 वर्ष का बंधन समाप्त किये जाने के संबंध में यह तथ्य रखा कि  भारत में किसी भी राज्य के, केन्द्र शासित प्रदेश के, केन्द्रीय कर्मचारियों के या अन्य किसी भी कर्मचारी संवर्ग का जब जब वेतन पुनरीक्षण किया गया है तो उसे उस संवर्ग के समस्थ कर्मचारियों के लिये लागू किया गया है। पूर्व में 2013 के पूर्व भी जब 2003 एवं 2007 में शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग का वेतन पुनरीक्षण किया गया तब भी उसे संवर्ग के सभी शिक्षकों के लिये लागू किया गया। वेतन पुनरीक्षण कोई संमयमान वेतन और क्रमोन्नत वेतनमान नहीं है जिसके लिये कोई वर्ष बंधन का प्रावधान हो। 2013 में लागू किये गये वेतन पुनरीक्षण के लिये 8 वर्ष का बंधन नियमों से परे एवं शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग के शिक्षकों को मानसिक एवं आर्थिक रूप से शोषित करने वाला है। अतः पुनरीक्षित वेतनमान में 8 वर्ष का बंधन समाप्त कर इसका लाभ संवर्ग के सभी शिक्षकों को दिया जाये।

संगठन ने सहायक शिक्षक पंचायत के वेतन के संबंध में कहा कि  प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की नींव हैं। यदि नींव के साथ ही इतना अन्याय होगा, उनको आर्थिक रूप से निम्न श्रेणी में रखा जायेगा तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शिक्षा की नींव किस कदर कमजोर होगी। वास्तव में होना तो ये चाहिये की प्राथमिक शिक्षकों का वेतनमान सर्वोच्च रखा जाये। यदि इतना भी नहीं किया जा सकता तो कम से कम उन्हे शिक्षक पंचायत के समकक्ष वेतनमान दिया जाना चाहिये।

इसी तरह संगठन ने सी.पी.एफ. कटौती समग्र वेतन पर किये जाने के संबंध में कहा कि वर्ष 2004 के बाद से जी.पी.एफ. कटौती पूरे देश में बंद कर वर्ष 2004 के बाद नियुक्त किसी भी प्रकार के शासकीय एवं अर्धशासकीय कर्मचारियों के लिये पेंशन बंद किया गया। और इसके बाद पूरे देश में अंशदायी पेंशन योजना (सी.पी.एफ) लागू किया गया । जिसका नियम पूरे देश में एक समान रूप से लागू है। इसके तहत कर्मचारी के समग्र वेतन का 10 प्रतिशत कटौती किया जाना है और नियोक्ता या शासन द्वारा उतना ही अंशदान कर्मचारी के सी.पी.एफ. खाते में जमा किया जाना है।  पूरे देश में एक समान रूप से लागू अंशदायी पेंशन योजना (सी.पी.एफ) नियमों के तहत शिक्षक पंचायत/नगरीय निकाय संवर्ग की भी सी.पी.एफ कटौती समग्र वेतन पर किया जाये।

संगठन ने सुझाव रखा है कि वर्ष 2013 में संवर्ग के शिक्षकों के लिये लागू किये गये पुनरीक्षित वेतनमान को पुनरीक्षित वेतन निर्धारण नियम 2009 के तहत संवर्ग के शिक्षकों के उस समय के विद्यमान मूल (समयमान एवं क्रमोन्नत वेतनमान सहित) वेतन पर नियमानुसार 1.8 से गुणा कर वेतन निर्धारण किया जाये। क्रमोन्नति के संबंध में सुझाव है कि  पंचायत विभाग छत्तीसगढ़ शासन का ही नियम था कि पदोन्नति से वंचित संवर्ग के शिक्षकों को 10 वर्ष पूर्ण होने पर क्रमोन्नत वेतनमान का लाभ दिया  जाएगा , जो वर्ष 2013 के पहले मिल भी रहा था। परंतु उसे शासन द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से निरस्त किये जाने का आदेश जारी कर समाप्त कर दिया गया। यह आदेश पूर्ण रूप से नियमो के विपरीत एवं अव्यवहारिक है। पदोन्नति से वंचित संवर्ग के शिक्षकों को क्रमिक रूप से उच्चतर पद का क्रमोन्नत वेतनमान दिया जाये।

संगठन ने यह बात भी रखी कि संवर्ग के अप्रशिक्षित शिक्षकों की सवैतनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था – अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिये अवैतनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था किये जाने के संबंध में विभाग द्वारा आदेश जारी किया गया था जो अव्यवहारिक है। आज शिक्षक अपना परिवार के भरण – पोषण से लेकर पारिवारिक हर जिम्मेदारी के लिये वेतन पर ही निर्भर है। यदि उसे वेतन नहीं दिया जायेगा तो वह किस तरह अपने परिवार का भरण पोषण और जिम्मेदारियों को निभा पायेगा स्वतः ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है। संवर्ग के सभी अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिये सवैतनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था किया जाये।

 

 

Comments

  1. By मनोज कश्यप मुँगेली

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  2. By Nandkumar Kashyap

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  3. By Omprakash tonder

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  4. By Kiran Singh bhardwaj

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  5. By Laxmi Narayan Sahu S.P.

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  7. By हरि पटेल

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