शिक्षा कर्मी नेता आलोक पांडेय बोले – संविलयन में विसंगतियां – कमियां हैं…….लेकिन आँदोलन समझदारी भरा कदम नहीं..

रायपुर । सोशल मीडिया में यह चर्चा है कि  छत्तीसगढ़ सरकार के लिए शिक्षा कर्मियो का  संविलियन गले में फ़ांस गया है। सरकार यही संविलियन छोटे छोटे संविदा समूहों पर करती तो उसके ओर बेहतर परिणाम होते ..!  शिक्षा कर्मियो के संविलियन के बाद भी विरोध का सुर ऐसा है कि कुछ शिक्षाकर्मी संघ 30 तारीख को धिक्कार रैली निकालने वाले है। जबकि संघो को मुख्यमंत्री को हाथों हाथ लेना चाहिए था।
मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार ने अध्यापकों के शिक्षा विभाग में संविलियन की घोषणा के कुछ दिन बाद नीति नियम बने ।  उसके बाद  से मध्यप्रदेश के अध्यापक विरोध के लिए सड़को पर आ गए थे। जिसका नतीजा यह रहा है कि संविलियन की प्रक्रिया धीमी हो गई। और अब तक एमपी में संविलियन के आदेश जारी नही हो पाए है।
 ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में भी सरकार ने मध्यप्रदेश से सीख लेते हुवे अपनी रणनीति बदल दी है। रमन सरकार की जो शिक्षा कर्मियो का संविलियन प्रक्रिया जिस तेजी से चल रही थी। उसमें विराम लग गया है।जिसका कारण कौन है …?  क्या  संविलियन पाए हुए शिक्षाकर्मियो के विरोध की वजह से सरकार ने रणनीति बदली है…? क्या शिक्षा कर्मियो के संविलियन से अन्य संविदा कर्मचारी वर्ग सरकार से नाराज है ….? क्या सरकार  विरोध की वजह से भविष्य में संविलियन वापस ले लेगी।चर्चाओं में ऐसे बहुत से सवाल है जो आम शिक्षक और शिक्षा कर्मियों से जुड़े लोग जानना चाहते है।
इस विषय में बात करने पर शिक्षक नेता आलोक पांडेय ने बताया कि संविलियन शिक्षाकर्मियों के 23 वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। इसके लिए कई लोगो ने कुर्बानी दी है। मध्यप्रदेश की तुलना में संविलियन की घोषणा में छत्तीसगढ़ पिछड़ गया था ।  किन्तु जिस त्वरित गति से दो दिनों के अंदर प्रदेश के एक लाख चार हजार शिक्षाकर्मियों का संविलियन किया गया वह अपने आप में एक रिकॉर्ड है।आलोक  ने बताया कि संविलियन में अभी भी अनेक कमियां -विसंगतियां हैं। जिसके निराकरण के लिए हमारा छ.ग.पं.न. नि.शिक्षक संघ सहित कुछ अन्य संघ लगातार प्रयासरत है।किन्तु संविलियन के पश्चात कुछ लोगों ने विसंगतियों को मुद्दा बनाकर सरकार व विभिन्न शिक्षाकर्मी संगठनों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। और आंदोलन की शुरुवात कर दी है।
आलोक पान्डेय ने बताया कि  मैं यह नहीं कहता कि उनका यह रास्ता गलत है  । किन्तु वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आंदोलन का रास्ता समझदारी भरा कदम नहीं कहा जा सकता।हम सभी देख और महसूस कर रहे हैंकि जिस तत्परता के साथ संविलियन की प्रक्रिया शुरू हुई थी उसमें अब शिथिलता आ गई है। संविलियन के नीति नियम का राजपत्र का प्रकाशन नहीं हो पाया है।
आलोक ने बताया कि मजे की बात यह है कि जो लोग आज संविलियन में विसंगति बताकर आंदोलन कर रहे हैं। उन्होंने भी संविलियन को सहर्ष स्वीकार किया है।अब यदि संविलियन में इतनी विसंगति थी तो पहले विसंगति दूर करवाना था। उसके बाद संविलियन स्वीकार करना था। लेकिन विरोध करने वालो ने ऐसा नहीं किया। शिक्षक नेता आलोक पाण्डेय ने बताया कि  हम शुरू से कहते आए हैं प्रदेश के समस्त शिक्षाकर्मियों का प्रमुख लक्ष्य मूल विभाग शिक्षा विभाग में संविलियन था। जिसे हमने प्राप्त कर लिया है इसके लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री धन्यवाद के पात्र हैं। ऐसा नहीं है कि विसंगतियां नहीं है…विसंगतियां हैं।  जिसके लिए हम सचेत हैं और उसे दूर करवाने के लिए अपना प्रयास जारी रखा है।
आलोक ने बताया कि हमारे संघ ने अभी विकास यात्रा के दौरान प्रत्येक जिले में आभार/मांग कार्यक्रम के तहत  मुख्य मंत्री को संविलियन के लिए आभार पत्र व संविलियन के बाद उत्पन्न विसंगतियों के लिए मांग पत्र सौंपा है।मुख्यमंत्री तक हमारी मांग पहुंच चुकी है ।अब इस विषय में फैसला लेना उनके हाथ में है।आलोक ने बताया कि मुख्यमंत्री ने संविलियन का अपना वादा निभाया है। संविलियन हुए तीन महीने होने वाले है। यह वापस नही हो सकता है।

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