सरकारी स्कूल के शिक्षकों का दर्द समझने वाला कोई नहीं..! शिक्षक नेताओं ने कही यह बड़ी बात

बिलासपुर।प्रदेश के शिक्षको का एक बड़ा वर्ग 23 सालो के बाद शिक्षा कर्मी से सरकार का नियमित कर्मचारी हुआ ये वर्ग प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हड्डी है। यह वर्ग अपनी जड़ों को देखता है और महसूस करता है कि इस व्यवस्था से शिक्षक ने क्या खोया क्या पाया। लोग सरकारी और निजी स्कूल से तुलना करते है।सीजीवालडॉटकॉम के टेलीग्राम ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करे

साल भर के 230 से 246  दिन के शैक्षणिक सत्र के दौरान स्कूल शिक्षा विभाग, पंचायत विभाग जिला, कलेक्टर कार्यालय ,शिक्षा अधिकारी कार्यालय, ब्लॉक स्तर के कार्यालय, संकुल स्तर से लगभग हर दिन एक आदेश , दिशा निर्देश, जारी होते रहते है।  अब तो ग्रीष्मकालीन अवकाश पर अधिकारियों की नज़र अपने नए नए प्रयोग को अमलीजामा पहनाने में लग गए है।

शिक्षक के जीवन का चित्रण सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सही नही हो रहा है। सोशल मीडिया में वायरल हुआ  पोस्टर जिसमे सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की बिल्डिंग दिखाई जाती है। और वही दूसरी ओर सरकारी शिक्षक और निजी स्कूल के शिक्षक का घर बताया जाता है इससे सरकारी शिक्षक समुदाय सहमत नही होता है।

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सीजीवालडाटकाम ने जब इन सब विषय पर सरकारी कर्मचारी शिक्षक  LB संवर्ग के शिक्षक प्रदीप पांडेय, देवकांत रुद्राकर, आलोक पांडेय, साधे लाल पटेल, अश्वनी कुर्रे, कार्तिक गायकवाड़, ममता मंडल सहित कई शिक्षको से बात की तो शिक्षक का दर्द सामने आया  चर्चा में शिक्षक कहते है।

अक्सर लोग सरकारी विद्यालय एवं निजी विद्यालय की तुलना करते नज़र आते हैं।और हर बार सरकारी विद्यालय को निजी विद्यालय से कमतर आंका जाता है।बच्चों की न्यून शैक्षिक उपलब्धि के लिए अक्सर लोग सरकारी विद्यालय के शिक्षक को दोषी ठहराते हैं किन्तु सरकारी विद्यालय के शिक्षक का दर्द क्या है इसे समझने वाला कोई नहीं है।

सरकारी विद्यालय का शिक्षक किसके अधीन है और किसके प्रति जवाबदेह है यह खुद शिक्षक ही नहीं समझ पाते हैं शिक्षा विभाग, पंचायत विभाग,स्थानीय निकाय,राजस्व विभाग ऐसे अनेक विभाग हैं जो समय समय पर सरकारी शिक्षकों पर अपना धौंस दिखा जाते हैं

सरकारी शिक्षक सिर्फ शिक्षा विभाग या पंचायत निकाय विभाग का कर्मचारी मात्र बन के रह गया है वहीं निजी स्कूल का शिक्षक कारपोरेट जगत का एम्प्लाई है।उनके नियम कायदे उसके मालिक ही तय करते हैं जो समयानुसार बदलते नहीं है।

सरकारी प्रपंचो से उन्हें छूट है। निजी स्कूल में नौकरी मिलने की संभावना योग्यता धारियों के लिए सरल है। जबकि सरकारी स्कूल में नौकरी योग्यता रखते हुए भी काफी जद्दोजहद से मिलती है।फिर ऐसी क्या समस्या है जिसके कारण उच्च योग्यता रखने के बावजूद सरकारी विद्यालय के शिक्षक बेहतर रिजल्ट देने से पीछे रह जा रहे हैं।

इसके कई कारण हो सकते हैं मसलन सरकारी विद्यालय के शिक्षकों पर नियम कायदों का दवाब इतना अधिक है कि उन नियम कायदों का पालन करते करते शिक्षक का मूल कार्य पढ़ना गौढ़ हो जाता है।एLक वर्ष में कोर्स पूरा करना है तो करना है फिर चाहे बच्चे सीखे या ना सीखे।शिक्षक अपने मन से पढ़ा भी नही सकता है और ना ही समयावधि में कोई फेरबदल कर सकता है। शासन का नियम अंकों के आधार पर छात्रों के वर्गीकरण का है। जबकि कक्षा में प्रत्येक के सीखने की अपनी एक गति एवं स्तर होता है।

कोई छात्र किसी अवधारणा को कम समय में सिख जाता है तो कोई छात्र उसी अवधारणा को सीखने में अधिक समय लगा सकता है।शिक्षक के पास लगभग 45 मिनट का समय होता है एक विषय के लिए उसमें 30से 40 छत्रों को उनके गति एवं स्तर के अनुसार अध्यापन कैसे कराए यह बहुत बड़ी समस्या होती है।इसलिए शिक्षक अपना कोर्स पूरा करते हुए आगे बढ़ता जाता है।इस परिस्थिति में जो छात्र सीख जाते हैं उनकी शैक्षिक उपलब्धि अच्छी होती है किन्तु देरी से सीखने वाले छात्र पिछड़ते चले जाते हैं।

सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छत्रों के पलकों की भी अपनी अलग समस्या होती है।अधिकांश पालक शिक्षा के महत्व को समझते ही नहीं।स्कूल में नाम लिखा देने के बाद अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।

निजी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के पालक अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर हमेशा जागरूक रहते हैं ।पढ़ने के लिए आवश्यक सामग्री जैसे कॉपी,पेंसिल, बुुक,इत्यादि समय पर उपलब्ध करा देते हैं।जितनी मेहनत निजी विद्यालय के शिक्षक विद्यालय में करते हैं उससे कहीं अधिक मेहनत पालक घर में बच्चों के साथ करते हैं।

95% पालक अपने बच्चों को या तो घर में स्वयं पढ़ाते हैं या कहीं ट्यूशन भेज कर उनका होमवर्क पूरा करवाते हैं।वहीं सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चों के पलकों को बच्चों के होमवर्क से कोई लेना देना नहीं होता।कई बच्चों के पास तो आवश्यक सामग्री जैसे पेन,पेंसिल, कॉपी,स्लेट इत्यादि भी नहीं होती।

ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी अलग है। पालक बच्चों को लेकर कई दिनों के लिए दूसरे गांव भी चले जाते हैं। घर परिवार में छट्ठी, बढ बिहाव, मरनी धरनी में कई बच्चे हफ़्तों हफ़्तों स्कूल नही आते। धान बुवाई धान कटाई के दौरान ग्रामीण स्कुलो में उपस्थिति बहुत ही कम रहती है।

शिक्षा नीति के तहत पहली से आठवीं तक सबको पास करने की नीति भी सरकारी विद्यालय में शैक्षिक विकास में बाधक है।आज बच्चों एवं पलकों के मन में कोई भय ही नहीं है कि यदि बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे तो वो फेल हो सकते हैं।बिना अवरोध के कक्षोन्नती करने के नियम के कारण बिना सीखे भी बच्चे  कक्षा आठवीं से नवमी कक्षा में आसानी से पहुंच जाते हैं।

नवमी कक्षा में पहुंचने के पश्चात जब बच्चा कुछ पढ़ लिख नहीं पाया तब वहां के शिक्षक प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने इस बच्चे को कुछ नहीं सिखाया किन्तु शिक्षकों की यह समस्या को कौन समझे की उन्हे ऐसा बच्चा मिला जिसके पास पढ़ने,सीखने के लिए आवश्यक सामग्री भी नहीं था।

ऐसे पालक मिले जिन्हें अपने बच्चों की शिक्षा से कुछ खास लेना देना नहीं था।ऐसा विभाग मिला जहां नित नवीन प्रयोग होते रहते हैं।ऐसा तंत्र मिला जहां आदेशों, निर्देशों एवं जानकारियों की भरमार है। बावजूद इसके आज भी  लीजिए 10वी 12वी का रिजल्ट देख लीजिए मेरिट में अधिकतम स्थान सरकारी विद्यालय के बच्चों का दिखाई देगा।

Comments

  1. By Bhailendra Ratre

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  2. By Neeru sahu

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  3. By RAJKUMAR KURRE

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  4. By नागेश्वर माझी

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  5. By रवि कुमार दांडगे

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  6. By रमेश पाटिल

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  7. By L. K. Pandey

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