हमार छ्त्तीसगढ़

सरगुजा की वादियों में लीची की खुशबू

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                 रायपुर  ( वैभव शिव पाण्डेय )। छत्तीसगढ़ में एक गाँव ऐसा भी है जो फलदार वृक्षों वाला गाँव के रूप में जाना जाएगा। जो जाना जाएगा पहाड़ों पर लीची के स्वाद के लिए । चलिए ज्यादा पहेलियाँ नहीं बुझाते और आप को लिए चलते हैं प्रदेश के सबसे सुंदर अंचल सरगुजा में । सरगुजा जिसके गोद में प्रकृति का अथाह खज़ाना है। जहां हरे-भरे सुंदर वन और पहाड़ है, जहाँ कोयला का भंडार है। इसी पहाड़ पर अब लीची के वृक्ष लहलहाने वाले हैं । 
जी हाँ छत्तीसगढ़ में वृक्षारोपण का सरकारी महाअभियान चल रहा है । हर साल करोड़ो पौधे लगाए जाते हैं । लेकिन सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर पौधारोपण के साथ ही लगाने वाली की भूमिका खत्म हो जाती है।  इसके बाद पौधा बचे या या मरे ।
लेकिन एक समाजिक-शैक्षेणिक संस्था ने एक ऐसी पहल कि अगर वो उसमें कामयाब हो गए तो सरगुजा में एक नई क्रांति आ जाएगी ।
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दरअसल सरगुजा में काम कर रही शैक्षेणिक संस्था ‘शिक्षा कुटीर’ ने मैनपाट अंचल के आदिवासी समाज से जुड़े लोगों के लिए आय में एक अतरिक्त साधन जोड़ने की ज़रूरत महसूस की । जिससे उनके स्थानीय ज्ञान और पर्यावरण के अनुकूल हो। इसके लिए संस्था ने पहाड़ के तराई पर बसे रकेली गाँव का चयन किया । रकेली गाँव में लीची के पौधों का रोपण किया है।  संस्था ने पौधों को जीवित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी से ग्रमीणों को जोड़ा है।  संस्था ने रकेली गाँव के साठ घरों में लीची के पेड़ अपने खर्च से लगवाए । सबसे पहले संस्था ने इसके लिए रकेली गाँव का चयन किया। चूंकि सरगुजा और जशपुर की आबोहवा लीची के लिए उपयुक्त है लिहाज़ा संस्था ने गाँव के कुछ लोगों से चर्चा करके तय किया कि गाँव वालों को घरों में लीची लगवाई जाएं। संस्था ने इसके लिए पैसे इकट्ठे किए और जुलाई के पहले हफ्ते में कृषि महाविद्यालय से उन्नत किस्म के लीची के पौधे खरीदे।
जिन 60 घरों में पौधे लगाए गए उनके साथ एक शर्त भी जोड़ी।  शर्त यह कि अगर लापरवाही से लीची के पेड़ नष्ट होते हैं, तो लीची के पौधे  की कीमत उस व्यक्ति को अदा करनी पड़ेगी। गांव वालों ने इस शर्त को स्वीकार किया और  साठ घरो में लीची के पेड़ लगा दिए गए। शिक्षा कुटीर ने अपनी जिम्मेदारी सिर्फ पेड़ बांटने तक नहीं रखी बल्कि इसकी देखरेख अच्छे से हो एवं पौधों का सर्ववाइवल रेट बेहतर हो , इसके इंतज़ाम के लिए संस्था ने पौधे बांटने और लगवाते समय दो कृषि वैज्ञानिकों डॉ एस आर दुबोलिया और डॉक्टर जी पी पैकरा की सेवाएं ली। उनके मार्गदर्शन में पौधे लगवाये। वैज्ञानिकों ने गाँव वालों को समझाया कि कैसे पौधे की देखभाल करनी है । और अगर कोई बीमारी पौधे को लग जाए तो कैसे बचाव करना है । संस्था ने अभी ये प्रायोगिक तौर पर किया है और शुरुआती परिणाम अभी ठीक हैं । अगर ये प्रयोग सफल रहा तो संस्था इसे अगले साल वृहद स्तर लीची के पौधों को रोपण करेगी।

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