मेरी नज़र में...

सावधान! प्रशासन की हाण्डी में पेड़ों के कत्लेआम की साजिशें …….

 

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katl 1(शशिकांत कोन्हेर ) पहले लिंक रोड, फिर रायपुर रोड और अब उस्लापुर-नेहरू चौक व महामाया चौक से रतनपुर की ओरं सैकड़ों हरे भरे पेड़ों को बलि चढाने की साजिश चुर-पक कर तैयार है । प्रशासन सडक़ चौडीकरण के नाम पर इन पेडों का कत्ल करने के लिये अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में लगा हुआ है । और लिंक रोड की तरह किसी भी दिन, इन पेड़ों पर भी जानलेवा हमले शुरू हो सकते हैं । जब लिंक रोड चौडीकरण के नाम पर पेड़ों की कटाई का विरोध शुरू हुआ तो, इसमें लगे पर्यावरण प्रेमियों को विकास विरोधी बताकर बदनाम करने की शर्मनाक कोशिशें भी की गई । और इसे लेकर हाईकोर्ट में चले मामले के बाद प्रचारित किया गया कि लिंक रोड में जितने पेड काटने पडे हैं उसके दस गुने पेड प्रशासन लगवायेगा ।पर ये पेड कहां लगवाये जायेंगे, या लगवाये गये ? ये बात प्रशासन ने, न तब बताई थी और न आज बताने को तैयार है । दरअसल वातानुकूलित कारों और घरों में रहने वाले अधिकारियों को बिलासपुर में आजीवन रहना तो है नहीं ।तब फिर वो क्यों यहां के पेड़ों की, पर्यावरण और प्रदूषण की चिंता करेंगे  ? छत्तीसगढ में गंजेडिय़ों के लिये कहा जाता है कि, गांजा भाई किसके गांजा पिये खिसके,,,,। कुछ ऐसा ही हाल बिलासपुर में अधिकारियों का है । सौ् -दो सौ करोड की सडक़ स्वीकृत कराओ, पेड कटाई व नये पौधे लगाई का पैसा अलग से लो और दो चार साल यहां रहकर राजधानी निकल लो । इसलिये उन्हे दर्द समझ में नहीं आता पर्यावरण के विनाश और बिलासपुर की पीडा का,……..। इन अधिकारियों की सोच ने इस शहर के विकास और यहां के पेडों को एक दूसरे का दुश्मन सा बना दिया है । मतलब यदि विकास चाहिये, अर्थात चौड़ी सडकें और बडे बडे निर्माण व सौदर्यीकरण चाहिये तो पेड़ों के कत्लेआम के लिये तैयार रहिये । बिना उसके विकास की कल्पना न तो यहां के अधिकारी करते हैँ और न नेता ……।

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शायद इसीलिये पृथक छत्तीसगढ बनने के बाद से आज तक बिलासपुर का विकास तो क्या खाक हो पाया, लेकिन इसके नाम पर हरे भरे पेड़ों का कत्लेआम जरूर होता रहा । और अब एक बार फिर बिलासपुर रायपुर मार्ग पर, नेहरूचौक से उस्लापुर ओवरब्रिज मार्ग पर और महामाया चौक सरकण्डा से कोनी-रतनपुर मार्ग पर फोरलेन के बहाने पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है । ये तो ऐसा लगा रहा है मानों शासन बिलासपुर को पेड विहीन बनाने की दिशा में काम कर रहा है …..। आरोप है कि बीते पांच सालों में बिलासपुर और उसके इर्द गिर्द दस हजार से भी अधिक पेड काटे जा चुके हैं । एक ओर एनटीपीसी, केएसके, समेत दो दर्जन से अधिक कोलवाशरियां, स्पंज आयरन संयंंत्र, सैकडों कोल डिपो व तेजी से बढ रही घरों में एसी लगाने की दौड और मोटरगाडियों के धुए से निकलने वाली विशैली गैसों समेत अनेक कारण ऐसे हैँ जो इस पूरे क्षेत्र का पर्यावरण चौपट कर रहे हैं ।

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ऐसे में हरे- भरे पेड़ों की बहुतायत और हरियाली ही हमारी हिफाजत की गारण्टी  ले सकती हैं । लेकिन बिलासपुर में जिस तेजी से विकास के नाम पर हर भरे पेडों को काटने का शगल बढता जा रहा है उसे रोकने के लिये लोगों को अखबारी विज्ञप्तियों और जुबानी जमा खर्च व काफी हाउस टाईप चर्चाओं से परे हटकर पेडों को लगे लगाने के लिये सडकों पर आना होगा ।तभी हम वृक्षों के संभावित कत्लेआम को रोक पायेंगे । सभी को हर हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि,,,,, वृक्ष हैं तो, हम हैं ।

 ( इस आलेख के साथ छपे फोटोग्राफ लिंक रोड पर की गई पेड़ों की बेरहम कटाई के समय के हैं , जो  वरिष्ठ पत्रकार-पर्यावरणविद् श्री प्राण चड्ढा जी के सौजन्य से हम प्रकाशित कर रहे हैं ) 

                   

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