सुखी मीन जो नीर अगाधा–शारदानंद जी

IMG_20151203_063802बिलासपुर— भक्तों का चरित्र…भगवान की कथा से ज्यादा रोचक है। भगवान भी भक्तों की चरित्र सुनते और पढते हैं। उन्हें भक्तों के चरित्र सुनने और पढ़ने में आनन्द मिलता है। भक्तों के चरित्र पढ़ने से मन को धैर्य और सहनशक्ति मिलती है। जो भक्त भगवान के चरण को ध्याते हैं ..तब भगवान का हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में भक्त के सिर तोता है। सच्चे भक्त का अनुशरण भगवान तक पहुंचने का रास्ता है। भगवान कहते हैं कि कोई मुझे नन्द यशोदा का बेटा कहता है तो कोई दशरथ कौशल्या नन्दन । लेकिन मै यह सब कुछ होकर भी इससे परे हूं। मुझे समझने के लिए आत्मचिन्तन की जरूरत है। यह बातें भक्तों को संबोधित करते हुए स्वामी शारदानन्द सरस्वती जी ने उपस्थित भक्तों से कही।

             विनोवानगर स्थित बृजेश अग्रवाल के निवास में रूद्राभिषेक के बाद भक्तों को आशीर्वचन में महाराज शारदानन्द जी ने कहा कि चरित्र और कथा ही ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता है। भगवान की लीलाओं को समझना मुश्किल है। उन्हें भक्तों के चरित्र और भगवान की कथा से ही समझा जा सकता है। खुद भगवान भी अपने भक्तों के चरित्र और आचरण को पढते हैं। क्योंकि भक्तों को भगवान तक पहुंचने के लिए दुनिया की तमाम बाधाओं को पार करना होता है। स्वामी जी ने कहा कि भगवान की कथा सुनने से परमशांति मिलती है।

              उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए महाराज ने कहा कि भगवान का जन्म और कर्म दोनों ही दिव्य हैं। उनकी कथाएं मन को परमशांति देती है। उन्हें पाने और समझने के लिए आत्मचिंतन की जरूरत है। लोगों ने आत्मचिंतन करना छोड़ दिया है। यही कारण है कि हम अपने आप के साथ भगवान से दूर होते जा रहे हैं। दूसरों के परपंच में मस्त है कि किसी को आत्मचिंतन की फुर्सत नहीं है। यही परपंच आज दुख का सबसे बड़ा कारण है।

            स्वामी जी ने कहा कि भगवान लेते कम देते बहुत ज्यादा है। हमारे पास जो भी है सब उन्ही का है। उन्हें अर्पित किया गया कोई भी चीज कई गुना होकर वापस आती है। स्वामी जी ने कहा कि संत और भगवान किसी के ऋणी नहीं होते। मन वचन कर्म से इन्हें जो दिया जाता है भक्तों के पास कई गुना वापस होकर आता है। द्रोपदी को एक चिन्दी के बदले साड़ियों का पहाड़ मिला। संतों ने थोड़ी से उपकार के बदले अजामिल और रत्नाकर को भगवान का दर्जा हासिल हो गया।

           शारदानंद जी ने कहा कि हम सब ईश्वर के संतान हैं। ना जाने हम उनकी कौन सी पीढी हैं । इसका शायद ही किसी को ज्ञान हो। सामान्य पोते पोतियों की तरह हमसे उन्हें बहुत प्यार है। लेकिन हम है कि उनके प्यार को समझने को तैयार नहीं है। सब कलिकाल का दोष है। मान सम्मान, लूट,मार, काट, छल, प्रपंच जैसे हथियार ने हमारे सोचने और समझने की शक्ति का हरण कर लिया है। भौतिक आसक्ति में हम अपने परम पिता के प्यार और वात्सल्य को भूलते जा रहे हैं। हमारी हालत बकरे जैसी हो गयी है। सारा जीवन में–में कर रहे हैं।

           सरस्वती जी ने हरि चरणों का बखान करते हुए कहा कि  “सुखी मीन जो नीर अगाधा” । स्वामी जी ने बताया कि  मझली को छिछले पानी में शिकार होने का भय रहता है। गहरे पानी में पहुंचकर मस्त और निश्चिंत रहती है। मनुष्य को भी दयानिधान के चरणों में पहुंचने के बाद सुरक्षा और शांति मिलती है। लेकिन  इसके लिए आत्मचिंतन की जरूरत है।

IMG_20151203_063805             शारदानंद जी महाराज ने बताया कि छोड़ने का सुख अनमोल है। नींद को छोड़ने के बाद जिस प्रकार की आनंद प्राप्ति होती है। स्वामी जी ने बताया कि अनियंत्रित मन भगवान और भक्त के बीच सबसे बड़ी बाधा है। जिसने मन पर निंयत्रण किया उसे भगवान का साक्षात्कार हुआ है।

         शारदानंद जी ने कहा कि काम, क्रोध, मोह रूपी सर्प ने हमारे जीवन को अंधेरे में धकेल दिया है। इन दुगुर्ण रूपी सर्पो से छुटकारा पाने का केवल एक हथियार हरि कथा ही है। उन्होंने कहा कि अहंकार भगवान और भक्त के बीच सबसे रोड़ा है। गरूण को भी अहंकार के सर्प ने निगला था। हरि प्रेरणा से कागभुषुण्डी के दरबार में पहुंचते ही अहंकार के सर्प ने उन्हें छोड़ दिया।

         स्वामी जी ने कहा कि भगवान का सब पर बराबर प्यार बरस रहा है। हमे इसका अनुभव इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि हम कलिकाल के दुर्गुणों से घिरे हुए हैं। इन दुर्गुणों से छुटाकारा पाने के लिए  मनुष्य को हरि कथा और भक्तों के चरित्र को सुनना और गुनना होगा। तभी हमें भगवत् चरण हासिल होगा।

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