मेरा बिलासपुर

जाति प्रमाण पत्र के लिए चक्कर काट रहे शिक्षक और पालक …… ऑनलाइन सिस्टम के अभाव में आ रही दिक्कतें…

[wds id=”13″] शिक्षक,गैर शिक्षक,पदों ,भर्ती,पात्र,अपात्रों, सूची जारी,दावा आपत्ति ,समय,राजनादगांव,छत्तीसगढ़बिलासपुर । स्कूली बच्चों के जाति प्रमाण पत्र बनाने में सुविधा को लेकर शासन स्तर पर कई प्रयास किए जा रहे हैं।  लेकिन इस काम में शिक्षकों को शामिल किए जाने और कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें आने की वजह से उम्मीद के हिसाब से सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इसे देखते हुए जानकार मान रहे हैं कि इस तरह की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए ,  जिससे शिक्षकों को राजस्व विभाग का चक्कर न काटना पड़े और समय पर जाति प्रमाण पत्र बनकर स्कूल के बच्चों को मिल जाए।स्कूल शिक्षा में मास्टरों के पास पढ़ने पढ़ाने के अलावा सैकड़ो और भो काम है। योजना किसी भी विभाग की हो स्कूल के मास्टर बेधड़क झोंक दिए जाते है।ऐसे ही  शासन की स्कूली बच्चो को जाति प्रमाण पत्र स्कूल में बनाने की योजना है  । जिसमे सरकारी स्कूल का मास्टर साल भर पढ़ाई –  लिखाई छोड़कर जाति प्रमाणपत्र बनवाने में लगा रहता है।सीजीवाल डॉटकॉम के व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करे
राजस्व विभाग के लपेटे में हर दो दिन में स्कूल मास्टर जाति प्रमाण पत्रों के लिए तहसील और लोकसेवा केंद्रों के चक्कर मारता है।जाति प्रमाण पत्रों को सही दस्तवेजो के साथ भरवाने में पटवारियों की परिक्रमा  में स्कूली मास्टर और पालको को चक्कर लगाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में दर्जन भर दस्तावेजों को  ऑनलाइन कराने के लिए गुरुजी और प्रधानपाठक कितनी बार उच्च कार्यालय और कम्यूटर सेंटर का चक्कर मारते है फिर भी लोकसेवा केंद्रों की मुफ्त में खराब होती ग्राहकी से हजारों फॉर्म अपूर्ण दस्तावेजो के नाम वापस हो जाते या फिर निरस्त कर दिए जाते है और  फटकार के साथ नोटिस कार्यवाही का सामना मास्टर को  मुफ्त में ही करना होता है। कुछ हायरसेकंडरी और हाई स्कुलो में जहाँ कम्प्यूटर और नेट सुविधाये है वहाँ से आवेदन भरने का काम कुछ  हो भी जाये तो लोकसेवा केंद्रों से सारे आवेदन अनुमोदन के बाद जाति प्रमाणपत्र बन जाये यह जरुरी नही होता।

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 यद्यपि पिछले दिनो बच्चे के जन्म के बाद ही शिशु का जाति प्रमाणपत्र पिता की जाति के आधार पर बनाये जाने का आदेश छत्तीसगढ़ शासन महानदी भवन से सामान्य प्रशासन सचिव डॉ कमलप्रीत सिंह ने जारी जरूर कर दिया है ।   इससे लोगो को जाति प्रमाणपत्र की सरलीकृत सुविधाएं मिलना शुरू हो जाएगी  ।   लेकिन स्कुलो में जाति प्रमाणपत्र बनाने की बोझिल कवायद जब तक बंद किये जाने का आदेश नही हो जाता,ऐसे ही पालक शिक्षक और शिक्षा विभाग अपना मूल काम छोड़कर तहसील पटवारी और लोक सेवा केंद्रों के चक्कर काटते रहेगा।
जिला कलेक्टरों को साप्ताहिक समीक्षा में समस्या के मूल स्वरूप से कोई सरोकार नहीं होता है।आंकड़ो की जादुगिरी और अफसरों की धौस ने स्कुलो में पढ़ाई का कबाड़ा कर रखा है।अफसरों को इतनी सी बात समझ  नही आती कि आज भी गाँव के स्कुलो विशेषकर मिडिल स्तर के स्कुलो में जिनका कम्यूटर से कोई  कनेक्शन नही है वे लोग कैसे सैकड़ो फार्मो ऑन लाइन करने का कार्य करेंगे ? संकुल और ब्लॉक को मिलाकर ऐसे फार्मो की संख्या हजारो में होती है   । 
जिनको साल भर इधर –  उधर के चक्कर मे निकलने के बाद भी स्थिति जस की तस होती है   । क्योंकि ये ऑनलाइन निःशुल्क बनाये जाने के लिए एन केन प्रकारेण भरे गए फॉर्म तहसील और लोकसेवा केंद्रों की खरी कमाई में रूकावट होते है   । इसलिए आधे से ज्यादा फॉर्म किसी न किसी दस्तावेज की   कमी बता कर वापस भेज दिए जाते है और यही क्रम साल भर चलते रहता है । शालाओ में शिक्षकीय प्रयोजनों के लिए शिविर लगाकर हाथोहाथ जाति प्रमाण पत्र बनाने का कार्य के लिए राजस्व के अमले के पास न तो कोई नीयत बाकी है न कोई नीति बस केवल स्कूल के मास्टरों पर थोप दो वे फॉर्म भरने से लेकर सारा कार्य खुद करेंगे । ऐसे में कलेक्टरों की साप्ताहिक धौस से न तो कोई योजना परवान चढ़ने वाली है और न ही शिक्षा गुणवत्ता में कोई बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।
 
 

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