3 विभागों की खाक छानकर लौटी फाइल..नहीं बुझी आदिवासियों की प्यास…सहायक आयुक्त ने कहा..मार्गदर्शन का इंतजार

बिलासपुर— जहां आस..वहीं प्यास…विभागीय कर्मचारियों का ऐसा ही कुछ सिस्टम है। यह सिस्टम देश के कमोबेश सभी विभागो में चलता है। ऐसे में भला बिलासपुर कैसे अछूता रहे। दो साल पहले शासन ने मरवाही क्षेत्र के दो आदिवासी गांवों में बोर के साथ पम्प लगाने और पाइप लाइन बिछाने का आदेश दिया। राशि भी स्वीकृत हो गयी। लेकिन काम करने वाले तीनों विभागों ने पल्ला झाड़ लिया।  दरअसल कामचोर अधिकारियों को इसमें कोई लाभ होता नहीं दिखाई दिया…। नतीजन बैगा आदिवासी बिना पानी के दो साल तडपते रहे…इस साल भी कमोबेश यही स्थिति है। मामले की खबर किसी को नहीं हुई। आदिवासी विभाग सहायक आयुक्त ने बताया हमने उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन मांगा है। बैगा आदिवासी क्षेत्र के दोनों गांवों में बोर उत्खनन और पम्प लगाने की जिम्मेदारी किसे दी जाए।

                                       मरवाही क्षेत्र में गर्मी के दौरान इस बार आदिवासियों को पानी के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा है। पिछले साल से चिन्हांकित दो गांवो में पानी की समस्या को दूर करने शासन ने दस लाख स्वीकृत किए। लेकिन बोर उत्खनन और पम्प सेट करने के लिए जिम्मेदार तीन विभागों ने कोई ना कोई बहाना बनाकर पल्ला झाड लिया। फिलहाल मामला अभी कुछ दिनों के लिए टल गया है। यदि सब कुछ इसी तरह रहा तो आने वाले साल में दोनों बोर काम करने शुरू कर दें…फिलहाल इसकी संभावना कम ही है। बहुत कुछ संभावना है कि आने वाली गर्मी में तीनो विभाग एक बार फिर बारी बारी से हाथ खड़ा करेंगे। फिर आदिवासी बैगाओं को एक बार फिर पानी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

                       जानकारी के अनुसार मरवाही बैगा आदिवासी बाहुल्य गांव में शासन ने दो बोर उत्खनन के  साथ पंप लगाने का आदिवासी विभाग को आदेश दिया। लोक निर्माण विभाग, कृषि और क्रेडा समेत तीनों विभागों ने बोर उत्खनन से ना केवल इंकार किया..बल्कि लाभ नहीं मिलने की सूरत में अधिकारियों ने मामले को दो साल से एक दूसरे विभाग पर टालते रहे। जिसके चलते आदिवासी बैगा दो साल से पानी को तरसते रहे। अब विभाग  के अधिकारी अपने उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन मांग रहे हैं कि आखिर मामले में किया क्या जाए।

                       मरवाही क्षेत्र में बैगा आदिवासी बाहुल्य दो गांव में बोर उत्खनन के  अलावा सोलर पंप लगाने के लिए शासन ने दस लाख रूपए आदिवासी विकास विभाग को दिया। योजनानुसार दोनों बैगा आदिवासी बाहुल्य गांव में दो बोर उत्खनन किया जाना था। पानी सप्लााई के लिए पंप और पाईप लाईन बिछाया जाना था। पंप ऐसी जगह लगाया जाना था जहां से बैगा आदिवासियों की ना केवल पेयजल की समस्या दूर हो..बल्कि बाड़ी या खेत को भी पानी मिल सके। शासन से राशि मिलने के बाद आदिवासी विभाग ने पीएचई को पत्र लिखकर योजनानुसार बोर उत्खनन के साथ पम्प लगाने का प्रस्ताव भेजा। साथ ही योजना में खर्च होने वाली राशि की भी जानकारी दी।

                 लेकिन लोक निर्माण विभाग ने अधिक काम का हवाला देकर प्रस्ताव को लौटा दिया।  सुझाव दिया कि इस काम को कृषि विभाग से कराना ठीक होगा। आदिवासी विभाग ने प्रस्ताव को कृषि विभाग के पास भेजा। यहांं भी कृषि विभाग के सयाने अधिकारियों ने नया पैतरा खेला। बताया कि  बोर उत्खनन करा देंगे…. लेकिन पंप लगाने का काम क्रेडा करता है। बेहतर होगा कि बोर उत्खनन और पम्प लगाने का काम क्रेडा को दिया जाए।

                    कृषि विभाग की नसीहत को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर आदिवासी विभाग ने फाइल को क्रेडा के हवाले किया। लेकिन यहां भी आदिवासी विभाग को वही सुनने को मिला…जैसा जवाब पहले दोनों विभागों ने दिया था। क्रेडा अधिारियों ने बताया कि विभाग बोर उत्खनन का काम नहीं करता है। केवल पम्प लगा सकते हैं…यदि पीएचई बोर उत्खनन करे तो हम पम्प लगाने को तैयार हैं।

                     आदिवासी विभाग को जब तीन-तीन विभागों से सकारात्मक जवाब नहीं मिलता हुआ नहीं दिखाई दिया तो फाइल को उच्च अधिकारियों की तरफ बढ़ा दिया। पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा है कि शासन बताए कि बैगा आदिवासी गांव में किस विभाग से बोर उत्खनन कराए…और किस विभाग को पम्प लगाने के लिए कहें।फिलहाल पत्र का जवाब भी तक नहीं आया है।

                          बताते चलें कि गर्मी बीत चुकी है…लेकिन आदिवासी विभाग को अभी तक उच्च विभाग से परामर्श का इंतजार है। कहने का मतलब उच्च अधिकारियों के दिशा निर्देश के इंतजार में फाइल धूल फांक रही है। दूसरी तरफ मरवाही के बैगा गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। लेकिन यह निश्चित है कि बरसात का मौसम है…ऐसे में फाइल को धूल से बाहर निकलने में आठ महीने जरूर लग जाएंगे। और बैगा गंदा पानी ही पीते रहेंगे।

अधिकारियों के निर्देश पर करेंगे काम

             मामसे में आदिवासी विभाग की सहायक आयुक्त रेशमा खान ने बताया कि मरवाही क्षेत्र के बैगा आदिवासी गांव में दो बोर करने का आदेश शासन ने दिया था। इसके अलावा पंप लगाए जाने का भी आदेश है। लेकिन तीनों विभाग ने काम को नहीं करने के अलग अलग कारण बताए हैं। इसलिए विभाग ने एक पत्र उच्च अधिकारियों को लिखा है। मार्गदर्शन मांगा गया है कि बोर करने और पम्प लगाने की जिम्मेदारी किस निर्माण एजेंसी को दी जाए।

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