मेरी नज़र में… Archive

पर्यावरण दिवस मनाने का काँग्रेसी अँदाज…

“हम लोग 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाते हैं…। इस दिन नए पौधे लगाते हैं…। पेड़-पौधों की हिफाजत करने की कसमें खाते हैं…..।हमारे लिए यह दिन महत्वपूर्ण होता है…। इस बार भी हम यही कर रहे हैंं…।हम सब चाहते हैं कि हमारे आस-पास सब साफ-सुथरा रहे…। हमारे आस-पास का पर्यावरण हमारे अनुकूल रहे…।हम जिस पेड़

अब आएगा मजा…..खेल में…..

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की ओर से नई पार्टी बनाने के ऐलान के बाद कांग्रेस की सियासी विसात पर एक बार फिर से गोटियाँ तेजी से सरकने लगी हैं। हाल-फिलहाल इस सवाल का जवाब सभी के सामने है कि जोगी पार्टी से खुद अलग होंगे या निकाले जाएंगे  ? हालाँकि एक तरफ नई

चल-चल मेरे भाई…

“चल…चल मेरे भाई, तेरे हाथ जोड़ता हूँ…हाथ जोड़ता हूँ…तेरे पाँव पड़ता हूँ… बोला ना…नहीं जाता…अरे..घुसता ही चला आ रहा है…याँ…।“ अपने जमाने की मशहूर मल्टी स्टार फिल्म “नसीब” के इस गाने का यह छोटा सा हिस्सा याद आ जाता है (हालांकि गाने के बीच सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के इस डॉयलाग “–अरे घुसता ही चला

सावधान! प्रशासन की हाण्डी में पेड़ों के कत्लेआम की साजिशें …….

  (शशिकांत कोन्हेर ) पहले लिंक रोड, फिर रायपुर रोड और अब उस्लापुर-नेहरू चौक व महामाया चौक से रतनपुर की ओरं सैकड़ों हरे भरे पेड़ों को बलि चढाने की साजिश चुर-पक कर तैयार है । प्रशासन सडक़ चौडीकरण के नाम पर इन पेडों का कत्ल करने के लिये अपनी कुल्हाडी की धार तेज करने में

घोड़ा और मतदाता..रहमोकरम पर

(सत्यप्रकाश पाण्डेय)”अगर आपको व्यापार में घाटा हो रहा हो… परीक्षा में लगातार असफल हो रहें हों। माशूका किसी बात से रूठकर चली गई हो… घर में बीवी के कलह से परेशान हों या फिर घर में कोई वास्तु दोष हो । सिर्फ 10 रूपये… 10 रूपये में इन सारी समस्याओं का समाधान हमारे पास है

36 गढ़- मैं भी “छत्तीस”…तुम भी “छत्तीस”…!!

हम लोग छत्तीसगढ़ में रहते हैं। हमारे सूबे के नाम के आगे “छत्तीस” लिखा है इसलिए छत्तीस के आँकड़े पर अधिक भरोसा करते हैं। छत्तीस के आँकड़े को कोई हिंदी में लिखे या अंग्रेजी में लिखकर देखे तो ऐसा दिखता है , जैसे दो लोग एक-दूसरे की तरफ पीठ करके बैठे हैं…..। हमारे यहाँ राज-काज

चाहिए अजय चँद्राकर जैसा ही मंत्री… !

 “नौकरशाही ऐसे घोड़े के समान है, जो अपनी पीठ पर बैठे सवार की समझ के हिसाब से चलता  दौड़ता है….।“ राज-काज के बारे में ये बातें कभी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कहीं थी…..। वही जोगी जिन्हे कलेक्टरी (आईएएस) औऱ मुख्यमंत्री दोनों का तजुर्बा है…….। जोगी के धुर विरोधी रहे भाजपा के कद्दावर

‘लोकतंत्र’ खतरे में है

न कोई प्रजा है  न कोई तंत्र है    यह आदमी के खिलाफ़     आदमी का खुला सा    षड़यन्त्र है ।  [धूमिल] (सत्यप्रकाश पाण्डेय)प्रख्यात कवि सुदामा प्रसाद पांडेय ‘धूमिल’ की इन पंक्तियों को पढ़कर अपने सूबे के हालात पर जब सोचने बैठता हूँ तो लगता है ‘धूमिल’ कितने दिव्यदर्शी थे। लोकतंत्र की लाचारी,

भाजपा की “छठ्ठी”-सेहत की “घुट्टी..”

उसी जगह नगाड़े की थाप पर फाग की स्वर-लहरियां भी गूँज रही थी…उसी जगह मस्ती और उत्साह का भी माहौल था….उसी जगह भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेताओँ की मौजूदगी में इस बात को लेकर गंभीर चर्चा हुई कि संवाद के नए तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर पार्टी किस तरह देश और प्रदेश के एक-एक घर,एक-एक

टैेम्प्रेचर बढते ही हायतौबा मचा रहे,निर्दोष वृक्षों के हत्यारे

0 पहले निर्ममता से कर दी मां की हत्या और फिर सर पर ममता भरा आंचल न होने का रोना रो रहे 0 पचास डिग्री तक जायेगा तापमान तभी अकल आयेगी बिलासपुर की जनता को शशिकांत कोन्हेर।अभी गर्मी ठीक से शुरू नहीं हुई है ! यह भी कहा जा सकता है कि गर्मी का असल

ओ जाने वफा….रहने भी दे, थोड़ा सा भरम

 बिलासपुर—ओ जाने वफा जुल्म ना कर…रहने भी तो दे थोड़़ा सा भरम…अपनों पर सितम गैरो पर करम्…बहुत मशहूर गाना है…बीच  की पंक्तियां याद नहीं है। याद करने की जरूरत भी नहीं है। बात पटरी पर लाते हैं। इन दिनों शहर में ताबड़तोड़ हेलमेट अभियान चलाया जा रहा है। हर तीसरे दिन सुरक्षा को लेकर नया

यही है,बिलासपुर…(एक)

साफगोई और सीधे सपाट लहजे में अपनी बात रखने वाले द्वारिका प्रसाद अग्रवाल खूब लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं..। जिस सोशल मीडिया को लोग “कट-पेस्ट का हुनर” पेश करने वाली दीवार मानते हैं, वहां अपनी मौलिकता की वजह से द्वारिका जी ने अपनी अलग पहचान बनाई है..।शहर और शहर की जीवंतता का

1975 में लोकार्पण के दिन से ही इतिहास का गवाह रहा नेहरू चौक

0आपातकाल का आतंक और तीन गिरफ्तारियां, जिनसे सन्न रह गया था बिलासपुर 0 तत्कालीन मुख्यमंत्री पी सी सेठी के सामने बंटने थे आपातकाल विरोधी पर्चे (शशिकांत कोन्हेर) बिलासपुर। …. और आखिर सुगम यातायात के बहाने बिलासपुर का इक्तालिस साल पुराना नेहरू चौक का विशाल घेरा,तोड दिया गया । सन् 1975 में लोकार्पित होने से लेकर आज

उसने…खेली,सैकड़ों हाथ से होली…

बिलासपुर(भास्कर मिश्र)। इस फोटो को देखने के बाद एक गीत बरबस ही होठों से फूट पड़ता हैं…गीत के बोल कुछ इस तरह हैं..अपने लिए जिएं तो क्या जिएं..आगे भी है..उसे बताने की जरूरत नहीं है।जब शहर रंग में सराबोर था..लोग ढोल,ताशे मांदर की धुन पर गुलाल उड़ा रहे थे..ठीक उसी समय चीका वाजपेयी..गरीब अनाथ बच्चों

जिंदगी के रंगो की बौछार…जो डूबा सो पार

( रुद्र अवस्थी) ठाकुर- अभी तक दिल नहीं भरा होली से ? जया भादुड़ी- ये…ठाकुर चाचा…।होली रंगो का त्यौहार है..। लाल, पीले, नीले, हरे…कैसे दिल भरेगा इन रंगो से….जरा आप ही सोचिए- अगर ये रंग न हों तो कैसे बेरंग लगेगी ये दुनिया.? यह डॉयलाग शोले का है…।हिंदुस्तानी सिनेमा में सबसे अधिक आम जन-जीवन के

जरा देखिए हम कितने स्मार्ट हैं?..(4)

गुगुदाते हुए भी कटाक्ष की बारीक नोंक का अहसास कराने वाले शब्दों में डूबे व्यंग लेखन की एक अलग ही परंपरा रही है। सीधे कुछ कहे बिना भी झकझोर देना इस लेखन शैली की खासियत रही है। जो क्रिकेट के खेल में “रिवर्स स्विंग” वाली गोलंदाजी की याद दिला जाती है। इस विधा में पहले

जरा देखिए हम कितने स्मार्ट हैं?..(3)

गुगुदाते हुए भी कटाक्ष की बारीक नोंक का अहसास कराने वाले शब्दों में डूबे व्यंग लेखन की एक अलग ही परंपरा रही है। सीधे कुछ कहे बिना भी झकझोर देना इस लेखन शैली की खासियत रही है। जो क्रिकेट के खेल में “रिवर्स स्विंग” वाली गोलंदाजी की याद दिला जाती है। इस विधा में पहले

जरा देखिए हम कितने स्मार्ट हैं?..(2)

गुगुदाते हुए भी कटाक्ष की बारीक नोंक का अहसास कराने वाले शब्दों में डूबे व्यंग लेखन की एक अलग ही परंपरा रही है। सीधे कुछ कहे बिना भी झकझोर देना इस लेखन शैली की खासियत रही है। जो क्रिकेट के खेल में “रिवर्स स्विंग” वाली गोलंदाजी की याद दिला जाती है। इस विधा में पहले

जरा देखिए हम कितने स्मार्ट हैं?..(1)

गुगुदाते हुए भी कटाक्ष की बारीक नोंक का अहसास कराने वाले शब्दों में डूबे व्यंग लेखन की एक अलग ही परंपरा रही है। सीधे कुछ कहे बिना भी झकझोर देना इस लेखन शैली की खासियत रही है। जो क्रिकेट के खेल में “रिवर्स स्विंग” वाली गोलंदाजी की याद दिला जाती है। इस विधा में पहले

सिनेमा की “जिंदगी” का अहसास करा गई एक शाम….

(रुद्र अवस्थी) “जिसने भारतीय सिनेमा के अंदर जिंदगी का सचमुच अहसास किया हो..। जो सिनेमा में जीवंतता के बहाव में खुद गोता लगाता हो और इसके गहरे पानी पैठ –एक अदद मोती ही नहीं , अलबत्ता मोतियों का गुच्छा निकाल लाने का हुनर जानता हो..। जो सिनेमा को दुनिया का सबसे ताकतवर-असरकारक मीडिया मानता हो..।जिसे अच्छे
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