छतीसगढ़ में ब्लैक लेपर्ड के संरक्षण से संवर्धन की सम्भवना

(प्राण चड्ढा)काले और सामान्य तेंदुए याने लेपर्ड का यह चित्र इन दिनों सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। यह दुर्भल चित्र कर्नाटक के काबिनी अभ्यारण में वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर मिथुन एच, ने लिया है।लगन और लंबे प्रतीक्षा बाद लेने में सफलता मिली है। उनको बधाई यदि छतीसगढ़ का वन विभाग तय कर ले तो उसका अचानकमार टाइगर रिज़र्व दूसरा ‘क़ाबिनी’ बन देश विदेश में ख्यति पा सकता है।पिछली टाइगर गिनतीं के लिए लगे कैमरे और उससे पहले काला तेंदुआ अचानकमार में रिकार्ड हुआ है। इस बारिश के बाद उसका मुव्हमेन्ट एरिया पता किया जाए और फिर इस ब्लैक लेपर्ड से दोस्ती के लिए के कभी कभी किसी निर्धारित स्थल बकरे,भेड़, की कुर्बानी देनी होगी। हाथी यहां है वह इस काम में सहायक हो सकते हैं।CGWALL NEWS के व्हाट्सएप ग्रुप से जुडने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये

वन्यजीवों को जब यह पता लग जाये कि मनुष्य हाथी के भी दोस्त हैं तो दूरियां कम हो जाती हैं, फिर इनसे दोस्ती का रास्ता इनके पेट से सीधे जुड़ा है। अचानकमार में इंडियन गौर बहुत है और चीतल तुलनात्मक कम है। लेपर्ड शक्तिशाली गौर को शिकार नहीं बना पाता और जब घर बैठे भोजन मिला तो इस ब्लैक लेपर्ड से दूरियां कम हो जाएंगी।अगले चरण में इसकी जोड़ी सामान्य रंग के लेपर्ड से बनाये जाने के लिए काम किया जाये। और फिर इनके शावकों की हिफाज़त में हाथी और महावत को तैनात किया जाएं। इनके शावकों में बेशक़ीमती और दुलर्भ शावक उसी तरह हो जायेगे।

जैसे रीवा महाराज मार्तंड सिंह ने वाइट टाइगर एक मात्र मोहन से दुनिया को सौगत दी है।
बस इस बार यही काम केज में नहीं जंगल में प्राकृतिक तरीके से करना होगा। कुछ बातों की अनुमति केन्द्र सरकर से लेनी होगी और विशेषज्ञों से समय समय पर सुझाव।यही छतीसगढ़ के अचानकमार में यह काम कर लिया गया तो वन्य पर्यटन और आय के मामले में यह छोटा राज्य बड़ी छलांग लगा देगा।

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