बिलासपुर के प्रति अपनापन का अभाव–अटल

IMG-20160117-WA0167बिलासपुर—बिलासपुर का सुनियोजित विकास नहीं हुआ। नेतृत्व में मेरा अपना बिलासपुर बोध का अभाव है। अधिकारियों ने बिलासपुर को कभी अपना समझा नहीं। समय काटा और चले गए। जब अधिकारियों और नेतृत्व में मेरा बिलासपुर यानि अपनापन का भाव नहीं आएगा..तब तक बिलासपुर का चहुंमुखी विकास नहीं होगा। कभी हम रायपुर से विकास में सिर्फ दो तीन कदम पीछे थे। अब मीलों पीछे हो गए हैं। राजधानी के लोगो और अधिकारियों में रायपुर के प्रति अपनापन का भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। दिल्ली से विकास का रास्ता रायपुर में बंद हो जाता है। बिलासपुर को जो भी हासिल हुआ…उसमें केवल और केवल जनता का योगदान है। इसमें किसी अधिकारी या नेता का योगदान नहीं है। यह बातें पीसीसी महामंत्री और युवा नेता अटल श्रीवास्तव ने सीजी वाल से कही।

          अटल ने कहा कि किसी क्षेत्र की पहचान स्थानीय कला,संस्कृति साहित्य और परम्पराओं से होती है। देश की साहित्य,कला और संस्कृति के विकास में बिलासपुर का अहम् योगदान है। लेकिन विकास की अधकचरी आंधी और स्वार्थी अधिकारियों ने बिलासपुर की मौलिकता को चर लिया है। इसमें नेतृत्व का बहुत बड़ा योगदान है। पिछले पन्द्रह साल में यदि रायपुर देश के आधुनिक शहर में शुमार हो सकता है तो बिलासपुर क्यों नहीं हो सकता था। इससे जाहिर होता है कि प्रदेश में हमारे बिलासपुर को काफी ओछी नज़र से देखा जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो बिलासपुर की झोली में आईआईटी होता। कहने के अर्थ है प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े शहर पर अब दुर्ग और भिलाई को तरजीह दे जा रही है। क्योंकि वहां का नेतृत्व हमसे कहीं ज्यादा सक्षम है।

          अटल ने बताया कि इंदिरा गांधी और बी.आर.यादव की कार्यशैली ने उनके जीवन पर बहुत प्रभाव डाला है। मैं इंजीनियर हूं, मेरे घर के सभी सदस्य शासकीय सेवा से जुड़े हैं लेकिन मुझे बंधकर काम करना कभी रास नहीं आया।   इंदिरा गांधी की कार्यशैली से मैं बचपन से प्रभावित रहा। इंजीनियर की डिग्री लेने के बाद तात्कालीन मध्यप्रदेश के बड़े नेता बीआर यादव के सम्पर्क में आया। कांग्रेस की टिकट पर पार्षद का चुनाव लड़ा। हार का सामना करना पड़ा। लेकिन कांग्रेस की राजनीति को नजदीक से पढ़ने और समझने का अवसर मिला। नौकरी का चक्कर छोड़कर जनता की सेवा में अपने आपको लगा दिया।atal

           अटल ने बताया कि राजनीति सेवा का बहुत बड़ा मंच है। लेकिन निजी स्वार्थ ने राजनीति के पवित्र मंच को गंदा बना दिया है। जनहित की भावनाएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। लोग मैं से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। देखकर दुख होता है। खासतौर बिलासपुर की जनता के साथ पिछले बीस साल से नेतृत्व ने केवल छलावा किया है। अधिकारियों पर लगाम नहीं है। बिलासपुर नेतृत्व की सबसे बड़ी कमजोरी है। नतीजन बिलासपुर कबाड़खाना बन गया है। सड़कों पर रोज नए प्रयोग हो रहे हैं। जनता खून की आंसू रो रही हैं। सिवरेज का जिन्न बोतल में जाने को तैयार नहीं है। अब स्मार्ट सिटी ने शहरवासियों को बेचैन कर दिया है। जनता डरी सहमी है. कि कहीं इसकी भी हालत सिवरेज जैसा ना हो जाए।

            अटल ने सीजी वाल को बताया कि प्रदेश सरकार और निगम प्रशासन स्मार्ट सिटी को लेकर बहुत उत्साहित है। उत्साह कितनी परवान चढ़ती है समय बताएगा।बताना चाहूंगा कि बिलासपुर में तीस साल पहले ही स्मार्ट सिटी बन चुका है। रेलवे कॉलोनी, इंदिरा विहार,वसंत विहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। यहां दो दशक से वह सारी सुविधाएं हैं जो स्मार्ट सिटी में होती है। सुनियोजित विकास के लिए मास्टर प्लान होता है लेकिन हमारे प्रशासन के पास कोई प्लान नहीं है। निगम शहर तो ठीक से संभाल नहीं पा रहा है। चले हैं स्मार्ट सिटी बनाने।

              अटल ने बताया कि आज से बीस-पच्चीस साल पहले सोंथलिया ने शहर विकास का आधारभूत संरचना पेश किया। उस समय संसाधनों की भारी कमी थी। बावजूद इसके सुनियोजित प्लान पर बिलासपुर ने बेहतर तरीके से विकास किया। विकास में शेख गफ्फार जैसे कार्यकर्ताओं का भी योगदान है। दरअसल बिलासपुर को बीडीए जैसी संस्था की जरूरत है। नगर निगम केवल साफ सफाई का काम करे। विकास का जिम्मा किसी स्वतंत्र संस्था के हवाले कर दिया जाए। फिर देIMG-20160116-WA0020-1खिए बिलासपुर का विकास कितनी तेजी से होता है।

           अटल ने बताया कि राज्य बनने के बाद नेताओं की उदासीनता ने हमारी कला संस्कृति और महोत्सव को बहुत नुकसान पहुंचाया है। हमारे शहर में कभी बीआर यादव के प्रयास से अरपा महोत्सव हुआ करता था। लेकिन प्रशासन की उदासीनता ने उसे अरपा के उथले पानी में डूबाकर खत्म कर दिया। आज भी जिले में डाक्टर शंकर शेष, लोचन प्रसाद पाण्डेय,सुरज बाई खाँण्डे, जैसे साहित्य प्रेमियों और कलाकारों की कमी नहीं है। बिलासपुर न्यायाधानी के साथ संस्कारधानी भी है। यहां कला और साहित्य की नर्सरी हुआ करती थी। लेकिन प्रसाशनिक उदासीनता ने नर्सरी की जड़ में तेजाब डालने का काम किया है। बिलासपुर यंत्र जैसा हो गया है। संवेदनाएं खत्म हो गयी है। नेता पत्थर हो गये हैं। जनता भटकने को मजबूर हैं।

           अटल ने कहा कि मेरा राजनीति में निजी स्वार्थ को लेकर नहीं हुआ। बिलासपुर के लिए आया हूं। ईश्वर की दिया हुआ मेरे पास सब कुछ है। स्कूल के बहाने भविष्य के लिए मेधाएं तैयार करता हूं। घर बनाता हूं। महसूस करता हूं कि मेरा सेवा का दायरा बहुत छोटा है। राजनीति के बहाने लोगों का जब आंसू पोछता हूं तो दिल को शांति मिलती है। जब तक बिलासपुर वासियों की चेहरे पर खुशी नहीं दिखती है तब तक मुझे खुशी नहीं मिलेगी। जब तक राजनीति को संप्रदायिक गतिविधियों और निजी स्वार्थ से जोड़कर देखा जाएगा तब तक बिलासपुर क्या प्रदेश के किसी गांव और गरीब का भला नहीं होने वाला है। राजनीति को निजी स्वार्थ और सांप्रदायिक गतिविधियों से ऊपर होकर लेना होगा। अन्यथा अनर्थ के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। अटल ने कहा कि हमारा बिलासपुर इससे अछूता नहीं है। इसलिए कहता हूं कि मेरा बिलासपुर बिगड़ गया है।

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