कहां है मेरा गणतंत्र दिवस ?

 ( रुद्र अवस्थी)

    जरहू कान में ठूंठी बीड़ी खोंसकर, लहराते गणतंत्र को देखता है,

कुछ कहता है

यदि यह गणतंत्र मिल जाए तो, अपना गणतंत्र ढंक लेता।

IMG_2621जाने – माने कवि मोहन श्रीवास्तव की ये पंक्तियां बरबस जेहन में आ जाती हैं, जब गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने की तैयारी करते स्कूली बच्चे और अन्य लोग काफी उत्साह में नजर आते हैं। जब सभी के चेहरे पर एक सवाल झांकता हुआ नजर आता है-कहांहै मेरा गणतंत्र-? कोई भी जानकार यह पूछ सकता है कि जब अपना संविधान है….अपनी व्यवस्था है……दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र है……। फिर यह सवाल क्यों? तो एक आम आदमी खुद ही अपने आस-पास इसका जवाब ढूढ़ने लगता है…..। सहत-सरल और सीधे-सपाट लहजे में में उसे लगता है कि गणतंत्र का एक लाइन में मतलब शायद यही होना चाहिए कि सभी के साथ बराबरी का सलूक हो …। लेकिन बाकी सभी दिनों में तो आम आदमी गैरबराबरी की सूरत का सामना करता ही है।  झंडा जब फहराया जाता है, तब भी यह फर्क छिप नहीं पाता। दो हिस्सों में बंटे समाज और व्यवस्था के बीच की लकीर साफ नजर आ जाती है। एक तरफ झंडे के नीचे सम्मान के साथ सावधान खडे लोगों का हुजूम है तो दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं , जिनके हाथों में झंडे की रस्सी है और उसे फहराने का ओहदा है। इसी भीड़ के बीच खड़ा जाने-माने कवि मोहन श्रीवास्तव का पात्र जरहू यह कहता दिखाई देता है कि यह गणतंत्र मिल जाए तो मैं अपना गणतंत्र ढंक लेता।

jhanda                      एक साथ कई तिरंगे दाहिने हाथ पर रखकर बाएं हाथ से माथा पकड़े एक मासूम बच्चे की तस्वीर पिछले कई राष्ट्रीय त्यौहारों के समय सोशल मीडिया पर वायरल होती देखता हूं…..। साथ में यह कैप्शन भी पढ़ता हूं – खाली पेट वाले झंडे बेच रहे हैं ……और भरे पेट वाले मुल्क…..। तो मुल्क के दो तबकों के बीच की खाई और भी गहरी दिखाई देती है। एक तरफ वे लोग नजर आते है, जो लोगों में देश-भक्ति का जुनून पैदा कर लोगों को झंडे के नीचे इकठ्ठा करते हैं…..। और एक…दो….तीन…दस….सौ….हजार …..लाख…..की गिनती कर हिसाब लगाते हैं कि कितने इकठ्ठे हुए। फिर खुशफहमी के साथ सीना तन जाता है कि पिछली बार से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा हो गई….।

एक रोटी बेलता है दूसरा सेंकता है

तीसरा खेलता है

मैं पूछता हूं, तीसरा कौन है

संसद चुप-सड़क मौन है…

IMG_20160125_113857कवि धुमिल की ये पंक्तियां भी सोचने पर मजबूर करती हैं। बचपन से देखते आ रहे हैं- हर एक राष्ट्रीय त्यौहार पर सुबह से सज-धज कर स्कूल जाते बच्चे, ध्वजारोहण, देश-भक्ति में डूबे सांस्कृतिक कार्यक्रम, मिष्ठान वितरण और फिर घर वापसी……। यह सब हौसला तो बढ़ाता है…..। देश भक्ति का जज्बा भर देता है। लेकिन कवि धुमिल की पंक्तियों की तरह यह सवाल भी अपने जेहन में आज भी बना हुआ है कि तीसरा ,जो रोटी से खेलता है, वह है कौन…?जवाब नहीं मिल पाता…।

बचपन में पढ़ी राजा-रनियों की कहानिया…..। राजे-रजवाड़ों की कल्पना इन्ही कहानियों के जरिए बालमन से ही घुसी हुई हैं । जिसके  एक हिस्से में राजा सरकार और उसका राजमहल है, वहीं दूसरे हिस्से में  प्रजा……। इतिहास बोलता है कि किसी राजा के कार्यकाल में उनकी प्रजा बहुत सुखी तो किसी के राज में प्रजा शोषण और प्रताड़ना का शिकार रही है,…….। सभी किस्सों में राजा, सरकार, राजमहल और फौज-फटाका की गिनती हमेशा संख्यात्मक हिसाब से प्रजा से कम ही रही है।लगता है जैसे  कहानियां प्रागैतिहासिक काल से चलकर –भक्तिकाल, मध्यकाल और मौर्य-मराठा-चोल-मुगल- ब्रितानी हुकूमत से चलते हुए आधुनिक काल तक पहुँचकर भी अपना यह स्वरूप नहीं बदल सकी है।जम्हूरियत की  खुली हवा में पूरी साँस लेते हुए भी ऐसा लगता है कि सुल्तान और उसकी रियाया का दस्तूर अब भी आज की सच्ची कहानियों में जिंदा है। नाम बदल गए , राजा तय करने के तरीके बदल गए। प्रजातंत्र में प्रजा ही सरकार की निर्णायक हो गई। लेकिन  कहानी से राजा-सरकार और प्रजा के बीच की जो रेखा है वह अब भी इतनी तो बची है कि उसे कई जगह या अपने आस-पास ही देखा जा सकता है। सरकार बनाने का फैसला जनता करती है और जनता के भविष्य का फैसला सरकार करती रहती है।

                             आज की पीढ़ी के बच्चों के सिलेबस में राजशाही के दौरान के किस्सें शामिल हैं या नहीं , यह तो पता नहीं। लेकिन सत्तर-अस्सी-नब्बे के दशक के लोग तो तरह-तरह के किताबों में पढ़कर ही इस जीवन शैली से रू-ब-रू होते रहे हैं। लिहाजा उन्हे तो इस बात का अंदाज होगा ही कि राज-पाट के समय के राजा और प्रजा के स्तर में कितना फर्क रहा होगा। तो यकीनन आज भी उन्हे इस तरह के दो तबके के लोगों के बीच का फर्क साफ महसूस हो सकता है। हालांकि हाल के दौर में पारदर्शिता को  लेकर सूचना के अधिकार जैसे हक हासिल होने के बाद कुछ जगह जवाबदेही की आदत बनना शुरू हुई है। साथ ही इन्फर्मेशन टेक्नालाजी नें भी “तोपने” की कोशिश में लगे लोगों को “उघारने” की दिशा में एक माहौल तो बनाया है। जिससे कुछ तो उम्मीद जगती है। लेकिन इसे जब तक सौ फीसदी कामयाब नहीं माना जा सकता जब तक कि कान में बीड़ी खोसे हुए जरहू तक इस तकनीक को नहीं पहुंचाया जाता। उसके तक तकनीक पहुंचे बिना यह नुस्खा पूरी तरह कामयाब कैसे माना जा सकता है। चूंकि आज भी माली हालत और रहन-सहन के हिसाब से लोगों में बड़ा फर्क कायम है। तभी तो समय-समय पर आँकड़ों को सामने रखकर दावा किया जाता है कि अमीर और अमीर बन रहे हैं – दूसरी तरफ गरीब और गरीब हुए जा  रहे हैं।

IMG_20160125_113555                                यह सही है कि लोकतंत्र में जनता के ही बीच से नुमाइंदे चुनकर जाते हैं, जनता के बीच से ही बड़े-बड़े साहब बनते हैं। जनता के बीच के लोग ही कारोबारी बनते हैं। जिन्हे जनता के बीच रहकर जनभागीदारी से जनकल्याणकारी राज्य के सपने को साकार करना है। जिसके लिए गणतंत्र है, संविधान है……। जनभागीदारी तो उदाहरणों में ही सुनने को मिलती है। अपनी-अपनी पार्टी से भले ही पूछते होंगे। पर जनता को नुमाइंदे कहीं जनता से पूछकर काम करते हुए तो आमतौर पर नजर नहीं आते। सत्ता है……सरकार है…….। लेकिन इसका मालिक कौन है ? परिभाषा जनता को मालिक बताती है और हकीकत में जनता की नुमाइंदगी करने वाला ही उसके मालिक जैसा दिखाई देता है। राजशाही की कहानियों और मौजूदा कहानी में एक समानता फिर – तब भी राज-काज चलाने वाले गिनती में थोड़े ही थे और आज भी गिनती के लोगों के ही हाथ में सत्ता है। तब भी संख्याबल में प्रजा अधिक थी और आज भी है। लेकिन यहां सत्ता को लेकर बड़ा उलटफेर नजर आता है। राजवंश की परंपरा में राजा को भगवान का प्रतिनिधि माना जाता था। आज का राजा जनता का प्रतिनिधि होता है। इस लिहाज से जनता को तो भगवान माना जा सकता है। लेकिन कोई भी बोल सकता है कि देख तेरे भगवान की हालत क्या हो गई ………..।  फिर वही राजा और प्रजा के बीच का फर्क…..। जब जनता ही सत्ता है तो फिर यह सवाल क्यों पूछा जाता है कि अभी सत्ता किसके हाथ में है। नुमाइंदा कोई भी हो सत्ता तो जनता के ही हाथ में होना चाहिए ? तब तो कवि धुमिल जी की कविता के पात्र यह जान पाएंगे कि रोटी से खेलने वाला तीसरा आदमी कौन है ? सियासत पॉवर हासिल करने के लिए नहीं अलबत्ता खिदमत करने का जरिया बने तभी तो चैतू-बैसाखू को अपना गणतंत्र दिखाई देगा।  जो हर पर्व पर गणतंत्र की तलाश में तिरंगे को फहराते हुए देखते हैं………।

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  1. By Editor

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