गावों से पलायन करा रहा,लंबी उधारी वाला मनरेगा

00 नेता लोकार्पण शिलान्यास में मस्त 00

00 अकालग्रस्त क्षेत्र की जनता रोजी और पानी के लिये त्रस्त 00

00 सूखते तालाबों का आतंक ? 00

IMG-20160204-WA0035शशि कोन्हेर। जीवनदायी अरपा सूख गई, तालाब सूख रहे हैं, बांधों का पानी सिमटता जा रहा है। ट्यूबवेलों के कण्ठ भी सूखने लगे हैं। पहले निस्तारी फिर पीने के पानी का अकाल पूरे बिलासपुर जिले को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। अफसोस कि जिन्हे इस बात की चिंता करनी चाहिये, उन्हे लोकार्पण और शिलान्यास से फुर्सत नहीं है। और इन सबसे निपटने के लिये जिम्मेदार लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ऐसे ,गुड फार नथिंग, शख्स के पास है, जो गृह मंत्री होते हुए एक हवलदार तक को, न तो हटा सकता है और न किसी को तरक्की या डिमोशन दे सकता है। ऐसा पीएचई मंत्री यदि इन गर्मियों से पहले अपने घर के कोला- बारी में ही, एकाध बोरिंग करा ले तो भी बहुत है। बिलासपुर जिले की बात करें तो,मरवाही में, पेण्ड में, बिल्हा और पथरिया ब्लाक के अलावा कोटा के पहाडी और वनांचल क्षेत्र के गावों में तालाब सूखने लगे हैं ।पानी के दूसरे प्रा$कृतिक स्श्रोत भी विदा मांग रहे हैं।

                   किसानों के टृयूब वेलों में पानी की धार पतली होती जा रही है। साफ दिख रहा है कि मार्च में होली आते-आते मवेशियों और ग्रामीणों के निस्तारी का बोझ ढोने वाले तालाबों का पानी सूखकर कीचड बन जायेगा।सबको पता है कि ऐसे में पानी के लिये हर ओर त्राहि-त्राहि और हाहाकार ही रहेगा। मई जून तो दूर की बात है, अपै्रल आते-आते ही हालात भयंकर त्रासदायी हो सकते हैं।अफसोस की बात यह है कि इस संभावित हाहाकार को रोकने और अकाल पीडित जनता के लिये राहत के इंतजाम करने की जिम्मेदारी जिनकी है। वे कुछ करना तो दूर, इसकी चिंता तक करते नहीं दिखते। यह ठीक है कि प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री डा रमनसिंह ने अकाल राहत के लिये सूखा प्रभावित गावों में मनरेगा और दूसरी योजनाओं के तहत तुरत फुरत रोजगारमूलक कार्य बडे पैमाने पर शुरू करने के निर्देश दे दिये हैं। लेकिन इन योजनाओं के तहत मजदूरी के भुगतान की जो कछुआ चाल है, उससे ग्रामीण मजदूर आजिज आ चुके हैं और उन्होने उत्तर भारत की ओर पलायन करना शुरू कर दिया है। रेलवे स्टेशनों पर गठरी-मोठरी धरे ग्रामीण श्रमिकों का रैला भले ही हमारे नेताओं और कद्दावर अधिकारियों को नहीं दिखता लेकिन होली आते-आते गांव के गांव खाली हो सकते हैं।

                arpa_nagharफिर जिन गावों में पीने और निस्तार का पानी नहीं मिलेगा या उसकी किल्लत होगी, वहां सूखे कण्ठों से मनरेगा के लंबी उधारी वाले राहत कार्यों में भला कौन जिंदगी खपाना चाहेगा। कायदे से सरकार को अकालग्रस्त गावों में बहुत बडे पैमाने पर तुरत फुरत भुगतान की सुविधा वाले राहत कार्य और आसन्न जल संकट से निपटने के भरपूर इंतजाम शुरू करने में जरा भी देर नहीं करनी चाहिये। वरना गोदामों और संग्रहण केन्द्रों में धान की लदी लाखों छल्लियों के बावजूद भूखे मरने के डर में छत्तीसगढिया जनसमुद्र कमाने खाने के लिये अपने घरों से पलायन कर जायेगा। दो दिन पहले ही बिलासपुर-रतनपुर मार्ग पर मोहतराई गांव में राजधानी बस सर्विस की जो 75 सीटर बस दुर्घटनाग्रस्त हुई थी।उसमें मस्तुरी क्षेत्र के 170 से अधिक ग्रामीण ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे और ये सारे के सारे परिवार सहित कमाने खाने अलाहाबाद जा रहे थे।

              पलायन की इस गति में एक एक दिन गुजरने के साथ और तेजी आती जायेगी। कायदे से सरकार को गांव गांव में निस्तारी और पीने के पानी की कमी का अनुमान लगाकर उससे निपटने की जंग अभी से शुरू कर देनी चाहिये।वहीं सुबह मजूरी शाम को चोखा दाम, वाले हिसाब से राहत कार्यों की बाढ ला देनी चाहिए। ऐसा करने पर ही अकाल से भयभीत और संभावित भूख से आतंकित, छत्तीसगढ महतारी के हजारों-हजार परिवारों को पूरे दिन की रोजी और दो वक्त की रोटी के साथ निस्तारी पानी का भरोसा दिलाया जा सकता है। अकालग्रस्त गावों के लोग हालांकि, बिना इसके भी किसी तरह यहां वहां गुजारा कर ही लेंगे पर, तब उनका उस तंत्र से भरोसा उठ जायेगा, जिसके हांथ में उन्होने अपनी जिदगी और छत्तीसगढ के विकास की कमान दे रखी है।

प्यास है तो सब्र कर पानी नहीं तो क्या हुआ।
आज कल दिल्ली मे है जेरे बहस ये मुद्दआ।।

मनरेगा में 28 करोड़ बकाया। मनरेगा के भुगतान के मामले में बिलासपुर जिले की स्थिति बड़ी दयनीय है। इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जिले के तमाम ब्लाकों में मनरेगा के तहत हुए कामों की मजदूरी का भुगतान पिछले काफी समय से बकाया है। यह राशि करीब 28 करोड़ रुपये बताई जा रही है। यही वजह है कि किसी समय मनरेगा के मामले मे एक नंबर पर रहने वाला बिलासपुर जिला काफी पीछे चला गया है।

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