समझ में नहीं आयी मैक्यनविली राजनीति

IMG_20160226_114033बिलासपुर– (भास्कर मिश्र) निगम कमिश्नर को कांग्रेस ने अकेले रणनीति बनाकर घेरा..कहना गलत होगा। इसमें निगम सरकार नहीं है..इसे भी एक सिरे से नकारा नहीं जा सकता। अन्य सभाओं की तरह निगम सामान्य सभा की बैठक आज शुरू हुई। महापौर और भाजपा पार्षदों ने स्वभाव से हटकर कांग्रेस की बातों को सिर माथे पर लिया…यद्पि ऐसा बहुत कम होता है। कांग्रेस को निगम सरकार ने भरपूर बोलने का अवसर दिया…कुछ ज्यादा ही दिया। तथाकथित सार्थक चर्चा की लंबी पृष्टभूमि में कांग्रेसियों ने मुख्यमंत्री के नाम सदन में बहस के दौरान आयुक्त को हटाने की मांग रख दी। सुनियोजित रणनीति के तहत पूर्व में तैयार पत्र सभापति को सौंप दिया गया । थोड़ा बहुत नियम अधिनियम को लेकर चर्चा हुई। लेकिन इस दौरान भाजपा का कोई भी पार्षद या एमआईसी सदस्य अपने अधिकारी के समर्थन में नजर नहीं आया। शहर का पहला नागरिक ने भी बचाव नहीं किया। देखते ही देखते तेज तर्रार छवि की निगम आयुक्त मैक्यनविली राजनीति की शिकार हो गयीं।

                     हमेशा से कुछ अलग आज नगर निगम में राजनीति का रंग देखने को मिला। एक बार तो समझ में ही नहीं आया कि बिलासपुर के पार्षद ऊंचे स्तर की राजनीति भी करना जानते हैं। पक्ष विपक्ष की नूरा कुश्ती के खेल में निगम आयुक्त पूरे समय तक निशाने पर रहीं। आयुक्त को समझ में आया या नहीं यह तो वही जानें लेकिन दावे के साथ कहा जा सकता है कि आयुक्त को निशाने पर लेने की पटकथा सोच समझकर तैयार की गयी है।  इसमें सत्ता पक्ष के नहीं होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। मतलब आयुक्त को निशाने पर लेने की मैक्यनविली राजनीति की रूपरेखा पहले से ही तय कर ली गयी थी। 

                       हमेशा देखने में आया है कि सामान्य सभा में कांग्रेस के पास बोलने के लिए बहुत कुछ होता है…लेकिन सता पक्ष में सुनने का धैर्य कभी भी देखने को नहीं  मिला। खासकर बिलासपुर नगर निगम के नेताओं में। फिर एजेन्डा को मात्र दो मिनट में नेता प्रतिपक्ष ने पास कर दिया। हमेशा विपक्ष की तरह विरोध करने वाले भाजपाइयों ने इसे मान भी लिया। फिर चर्चा का दौर शुरू हुआ…धीरे धीरे पत्रकारों को समझ में आने लगा कि पक्ष और विपक्ष की जुगलबन्दी आज कुछ नया करने वाली है। अंत में हुआ भी वही…कम अनुभवी अधिकारी मैक्लियनविली राजनीति की शिकार हो गयी।

              समझने में देर नहीं लगी कि कांग्रेस नेता तैयब हुसैन सभापति के एक-एक संवैधानिक प्रश्नों का जवाब बिना किसी आक्रोश के देते रहे। इस दौरान  कांग्रेस में हमेशा की तरह बेचैनियां नहीं दिखाई दी। भाजपा पार्षद भी शांत नजर आए। क्रम में प्रश्न आते गए और पार्षद तैयब हुसैन  नक्शा,गुणवत्ता और आरटीआई को लेकर शिकायत पर शिकायत पढ़ते रहे। हां कुछ एल्डरमैन ने शिकायतों का विरोध किया..लेकिन उनके विरोध में ना तो विश्वास नजर आया और ना ही जोश..जैसा की ऐसा होता नहीं..

                                    पूरे घटनाक्रम में एक बात जाहिर हुई कि आयुक्त को निशाने पर लेने के लिए..सभी ने संयुक्त रिहर्सल जरूर किया गया होगा। यही कारण है कि मंचन के समय मैक्यनविली राजनीति की शिकार आयुक्त ने सदन में अपने आप को अकेला पाया। कर्मचारियों ने भी उन्हें तन्हा छोड़ दिया। सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा की नगर निगम बिलासपुर के सदन में होता रहा। लोग बाहर आकर एक दूसरे का पीठ थपथपाते रहे। लेकिन जिन बातों को लेकर चर्चा होनी थी वह न तो बाहर हुई और ना ही सदन के भीतर।

        स्थानीय नेता अपने मतभेदों को भुलाकर क्षेत्र का विकास करें। स्थानीय निकाय गठन का मुख्य उद्देश्य भी है।  पहली बार बिलासपुर निगम के नेताओं ने मतभेदों को भुलाया..ऐसा भुलाया कि तेज तर्रार अधिकारी के मनोबल को ही तोड़ दिया। विकास तो कहीं दिखा ही नहीं। क्योंकि दोनो ही दलों को पता है कि विकास के लिए एकजुट होना जरूरी है..चाहे विकास किसी का ही क्यों ना हो…मैक्लियनविली राजनीति में महत्वाकाक्षा में बाधा पहुंचाने वालों को बख्शा नहीं जाता है..और आयुक्त को यह बात समझ में नहीं आयी

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