1975 में लोकार्पण के दिन से ही इतिहास का गवाह रहा नेहरू चौक

nehru chowk0आपातकाल का आतंक और तीन गिरफ्तारियां, जिनसे सन्न रह गया था बिलासपुर
0 तत्कालीन मुख्यमंत्री पी सी सेठी के सामने बंटने थे आपातकाल विरोधी पर्चे

(शशिकांत कोन्हेर) बिलासपुर। …. और आखिर सुगम यातायात के बहाने बिलासपुर का इक्तालिस साल पुराना नेहरू चौक का विशाल घेरा,तोड दिया गया । सन् 1975 में लोकार्पित होने से लेकर आज तक बिलासपुर और खासकर इस पूरे क्षेत्र की पहचान सा बना हुआ था नेहरू चौक। इस चौक का घेरा छोटा करने के बाद भी अब शहर का यातायात सामान्य हो पायेगा या नहीं ? ये तो समय ही बतायेगा, लेकिन अब इस चौक की रौनक में वो बात नहीं रह पायेगी जो सालों से रहती आई है। य़ह ठीक है कि यातायात की सुगमता को देखते हुए सडकों के बीचों-बीच, बडे से गोल घेरे में मौजूद, महापुरूषों की प्रतिमाएं अब ट्रैफिक वाले साहबों की आखों में गडने लगी हैं। पहले महाराणा प्रताप की प्रतिमा हटाकर कोन्टे में ले जायी गई , और अब नेहरू चौक का घेरा छौेटा कर दिया गया । हालांकि जिन बडे शहरों की नकल करते हुए महाराणा प्रताप की प्रतिमा को हाशिये पर डालकर नेहरू चौक पर कोकड़ा चलाया गया, उन शहरों और बिलासपुर में बहुत फर्क है । nehru_chowkउन बडे शहरों में सडकों की भरमार है । वहां यातायात का बोझ उठाने के लिये चौडी-चौडी सैकडों सडकें मौजूद हैं,और बिलासपुर में .? यहां तो सडकें ही नहीं हैं । ले-देकर एक मेन रोड ,जिसमें सदरबाजार और गोलबाजार भी पड़ता है । सारे व्यापार, सभाओं और रैलियों का बोझ भी इसे ही उठाना पडता है । वहीं रायपुर रोड, लिंक रोड और एक व्यापार विहार रोड …और घटिया निर्माण के लिये बिलासपुर का सर शर्म से नीचे करने वाला गौरव पथ या रिंग रोड नम्बर टू …! पूरे शहर और यहां बाहर से आने वाले हजारों भारी वाहनों का भार इन पर ही रहता है । बीस से तीस साल पहले भी इन्ही सडकों को यातायात सम्हालना रहता था और आज भी ….। लिहाजा आपातकाल और तानाशाही की खिलाफत से जुडी सुनहरी यादों वाले नेहरू चौक के पर कुतरने की कार्यवाही ने मुझे उस इतिहास की बरबस याद दिला दी जिनकी आज के हुक्मरानों को कोई परवाह भले ही न हो । लेकिन उसी संघर्ष की बिना पर ही उन्हे, आज की लालबत्तियां हासिल हो पायी हैँ, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

                                           अब जरा सुनिये,1975 के उस दौर को,,,जब इसी नेहरू चौक का पूरे तामझाम के साथ लोकार्पण हुआ था ।उस दौर के बिलासपुर में स्वर्गीय डा . श्रीधर मिश्रा की तूती बोला करती थी । चतरू बाबू के नाम से विख्यात स्वर्गीय श्रीधर मिश्रा ने शहर को एक अद्भुत चर्चित और विवादित नौकरशाह दिया था ….  आर डी पाण्डेय । बिलासपुर  नगर पालिका के इतिहास में प्रशासक के रूप में दर्ज इसी शख्स ने बिलासपुर में पुराने बस स्टेण्ड, नेहरू चौक, संजय तरण पुष्कर, बृहस्पतिबाजार, और देवकीनंदन चौक की दुकानों का निर्माण कर पूरे शहर का एक साल में ही मानों कायाकल्प कर दिया ।इसी शख्स के द्वारा बनवाये गये भव्य नेहरू चौक का घनघोर आपातकाल के तानाशाही वाले दौर में 16 सितम्बर 1975 को लोकार्पण होना था ।

                              IMG-20160327-WA0001इसके लिये उस दौर के मुख्यमंत्री स्वर्गीय प्रकाशचंद्र सेठी का बिलासपुर आगमन होना था । नेहरू चौक पर भव्य सभा की भव्य तैयारियां हो रही थीं । पूरा प्रशासन उसमें जुटा हुआ था । लेकिन इन तैयारियों से अलहदा कहीं और कुछ ठोस तैयारियां हो रही थीं । स्वर्गीय इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेन्सी और उसके जरिये थोपी गयी डिक्टेटरशिप का विरोध करने वाले कुछ लोकतंत्र रक्षक दीवाने भी अपनी अलग ही तैयांरियों में जुटैे थे । इनमें एक थे, शहर के जाने-माने चिकित्सक डा . डी पी अग्रवाल, दूसरे थे स्वर्गीय हरिभाऊ वाघमारे और तीसरे थे सेन्ट्रल बैँक आफ इंण्डिया के मेनेजर स्तर के अधिकारी स्वर्गीय कृपाराम कौशिक….।  इन तीनों ने कुछ लोगों का एक गुट बनाकर नेहरू चौक के लोकार्पण वाले दिन मुख्यमंत्री पी सी सेठी की सभा में उनके सामने ही आपातकाल का खुला विरोध करने और स्वर्गीय इंदिरा गांधी व इमरजेन्सी के खिलाफ पर्चे बांटने का निर्णय लिया था ।

                        तय था कि 1 6 सितम्बर 1975 को नेहरू चौक का लोकार्पण करने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री पी सी सेठी जैसे ही वहीं आयोजित आमसभा को संबोधित करने की शुरूवात करेंगे, वैसे ही बागियों की इस टीम के छह साथी सभा में एक साथ छह ओर से नारे लगाते हुए आपातकाल विरोधी पर्चें बांटना शुरू करेंगे और सरेआम अपनी गिरफ्तारी देंगे । सारी योजना तय हो चुकी थी । इसके ही मुताबिक स्वर्गीय कृपाराम कौशिक 16 सितम्बर से तीन दिन पहले 13 सितम्बर की रात, रायपुर से ट्वेन्टी नाईन डाऊन हावडा मुम्बई एक्सप्रेस से आपातकाल विरोधी पर्चे लेकर आ रहे थे । बिलासपुर स्टैशन में खड़े डा . डीपी अग्रवाल और हरिभाऊ वाघमारे उनका ही इंतजार कर रहे थे । यहां से उन्हे आपातकाल विरोधी पर्चे के बण्डल अज्ञांत स्थान में ले जाना था ,उन्हे ही इसे, 16 सितम्बर को नेहरू चौक के लोकार्पण समारोह में बांटने वाले जांबाज कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना था । लेकिन यह सब हो पाता , इसके पहले ही पुलिस व प्रशासन को पता नहीं कैसे पूरी योजना की भनक लग गयी ।और 13 सितम्बर को ट्वेन्टी नाईन डाऊन एक्सप्रेस से श्री कौशिक जैसे ही इंदिरा गांधी की तानाशाही के साथ ही आपातकाल विरोधी पर्चें के बण्डल लेकर उतरे और डा . डीपी अग्रवाल व हरिभाउ वाघमारे उनके पास पहुंचे , एकाएक पुलिस वहां आ धमकी और तीनों को आपातकाल विरोधी पर्चों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

                      इस तरह किसी मुखबिर की मुखबिरी के कारण नेहरू चौक के लोकार्पण समारोह में मुख्यमंत्री के सामने ही पर्चे बाँटने की योजना विफल कर दी गई और तीनों ही गिरफ्तार लोगों को पहले डीआईआर और फिर आपातकाल के बदनाम मेन्टेनेन्स आफ इन्टरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत जेल भेज दिया, जहां वे डेढ साल तक बंद रहे और 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद ही उनकी रिहाई हो पायी । उस समय इस घटना से पूरा पूरा बिलासपुर सन्न रह गया था । तब  प्रेस  पर भी सेन्सरशिप लगी थी । अर्थात अखबारों में वही छपता था जो सरकार और प्रशासन के अधिकारी चाहते थे । लिहाजा इन गिरफ्तारियों के दूसरे दिन अर्थात 14 सितम्बर की सुबह सभी अखबारों में इसकी खबरें प्रथम पृष्ठ पर और वह भी हेड लाईनों में छापी गई थीं ।

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  2. By सोनल यादव

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