रश्मि की महाविदाई….

IMG-20160615-WA0236बिलासपुर—(प्राण चड्ढा)– बैगा आदिवासियों के हकों के लिए लड़ने वाली रश्मि द्विवेदी का आज लोरमी में अंतिम संस्कार कर दिया गया। रश्मि लगभग 55 साल की थीं। सारा जीवन आदिवासियों,दलित शोषितों के लिए संघर्षरत रहीं। फेसबुक प्रोफाइल में रश्मि की फोटो लगी है जो किसी बैगा आदिवासी युवती की है।
साल 85 के आसपास रश्मि द्विवेदी मुझसे मिलने नवभारत बिलासपुर आती थीं। एक बार वहां के एक कमजोर दिल आधिकारी ने इच्छा व्यक्त की कि अब जब रश्मि आये तो मुझसे मिलाना। एक दिन जब वो मिले तो रश्मि ने बातचीत में कहा बैगा आदिवासियों की मांगों के सन्दर्भ में “कलेक्टर को नोटिस” दिया है। अगला कदम बाद सख्त उठाया जाएगा।

                           रश्मि के तेवर देख बेचारे अधिकारी की घिग्घी बन्ध गई। रश्मि के जाने के काफी देर बाद अधिकारी ने कहा कि लड़की नक्सली है। मेरी रश्मि से अचानकमार के जल्दा गाँव में पहचान हुई थी। तब शेर दिल अधिकारी एम. आर ठाकरे और मैं भोजन बनवा रहे थे। रश्मि पीठ पर बोझा लिये वहां पहुंची और पानी पिया।

                 दैनिक भास्कर में सम्पादक बना…तब रश्मि आई और मेरे दोस्त और पत्रकार सूर्यकान्त चतुर्वेदी और रश्मि के बीच विचारधारा को लेकर लम्बी बहस हुई। वह पीवी राजगोपालन के साथ एकता परिषद से जुड़ीं। जल जमीन और जंगल के लिए पदयात्राऍ भी की। बैगा आदिवासी की वन विभाग के द्वारा की गयी निर्मम बेदखली को दिखाने वह बिलासपुर के पत्रकारों को सूमो से खुड़िया बांध के किनारे जंगल ले गयी…मैं भी था। बाद में पता चला वन विभाग के कर्मचारी वर्दी में जंगल नहीं जा रहे हैं। वो लगता है कि हमें कुछ और ही समझ बैठे थे।

                           पत्रकार निर्मल माणिक भी रश्मि के दिए समाचारों को तरजीह देते थे। रश्मि  पीयूसीएल में भी कुछ समय तक पद पर रहीं । लेकिन लोरमी के बैगा आदिवासियों की महापंचायत की संयोजक बनी रही। घर बसाया औलाद भी हुई। कुछ समय बाद फिर अकेली हो गयी। केैन्सर से हार गयीं। अपना घर फूंक कर आदिवासियों के लिए सारी जिंदगी देने वाली बहन रश्मि को महाविदाई पर नमन।। ॐ शांति।।

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  1. By प्राण चड्ढ़ा

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