राम के भक्त रहीम के बन्दे

caption_spp(सत्यप्रकाश पाण्डेय)। “उनकी माँ को मरे हुए अभी तेरह दिन भी पूरे नहीं हुए थे, बेटे संपत्ति बटवारे को लेकर निर्वस्त्र सड़क पर बैठ गए । कोई कह रहा था कलह सालों पुराना है, माँ के मरते ही बाज़ारू हो गया । जर-जोरू और ज़मीन के विवाद सालों पुराने हैं । इनके परिणाम कभी सुखद नहीं रहे फिर भी लोग लड़ते रहे, लाशें गिरती रहीं। संपत्ति को लेकर आदम की नग्नता सदियों पुरानी है। महाभारत हुई, इतिहास गवाह है किसे क्या मिला ? कल जब उसके बेटे निर्वस्त्र होकर संस्कारधानी में अपने ही खून से हिस्सा-बँटवारा मांग रहे थे उस दौरान तमाशाइयों का लगा मज़मा अफवाहों के बाजार में गर्माहट पैदा करता रहा। किसी ने धर्म से जोड़कर कुछ बाते कह दीं तो कोई कुछ और कहता रहा । जितने मुंह उतनी बातें, मानसिक नग्नता के शिकार तीन लोग निर्वस्त्र होकर सड़क पर क्यों मौन धरे बैठ गए तमाशाइयों को आज के अखबारों ने बताया ।”

         best-attractive-hd-nature-wallpaperscvअमूमन रविवार को मेरे शहर की दुकाने बंद रहती हैं लेकिन फुटपाथ पर लगा बाज़ार लोगों की भीड़ से गुलज़ार रहता है । लाखों का व्यापार फुटपाथ से होता है । कल भी सब कुछ पिछले रविवारों की तरह ही चल रहा था, अचानक सदर बाज़ार में लोगों की आवाजाही थम सी गई । देखते ही देखते भीड़ की शक्ल बड़ी दिखाई दी । जिस किसी को देखो भीड़ में हिस्सेदार बनता रहा । दरअसल भीड़ के बीच का नज़ारा ही कुछ ऐसा था । एक व्यक्ति स्कार्पियो की छत पर नग्न अवस्था में आसन लगाये बैठा था, दूसरा सामने की दुकान के चबूतरे पर और तीसरा नंगा वाहन के भीतर । भीड़-भाड़ वाले इलाके में तीन इंसान निर्वस्त्र, मौन साधे। तमाशाइयों के मन में कौतूहल, आखिर ये निर्वस्त्र त्रिदेव कौन हैं ? कुछ ने उन्हें तपस्वी मान लिया, तो कोई बाज़ार में इस लीला को कुछ और नाम देता रहा ।

                  इस तमाशे की हकीक़त सिर्फ पुश्तैनी संपत्ति और मौत के बाद बूढी माँ के जेवरात का बँटवारा थी । शहर में रहने वाले एक जैन परिवार के तीन सदस्यों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नग्नता कल बीच बाज़ार थी । अंग प्रदर्शन की तस्वीरें मोबाईल के जरिये सोशल मिडिया फिर अख़बार में सुर्खियां बनी । इस जैन परिवार का सदर बाज़ार में मकान और एक कपड़ा दुकान है । 29 जून को इस परिवार को सहेजकर रखने वाली महिला संसार से हमेशा हमेशा के लिए रुख़सत हो गई । माँ को संसार छोड़े अभी 10 ही दिन हुए थे कि बेटे आपस में लड़ बैठे । बेटों को माँ के गहनों और पुरखौती संपत्ति में बराबर का हिस्सा चाहिए । घर के भीतर का विवाद जब बाहर सड़क पर नग्नता की शक्ल में आया तो हर आने-जाने वालो को खबर हो गई कपड़ा बेचने वाले जैन व्यापारी कितने खोखले हैं । शहर के आवाम की नज़रों में कपड़ा बेचने वाला परिवार आज सिर्फ शारीरिक रूप से नंगा नहीं था बल्कि उसने अपनी संवेदनहीनता के साथ पशुवत आचरण की नई मिशाल पेश कर दी थी । माँ की तेरही कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले का ये मंजर आज के इंसान की असल सूरत दिखा रहा था जिस पर कभी मच्छर तो कभी मख्खियाँ भिन-भिना रहीं थी । घर के भीतर का क्लेश जब सड़क पर कपड़ा उतारकर खड़ा हुआ तो पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा ।

                मौके पर पहुंची पुलिस ने पहले उन तमाशाइयों को खदेड़ा जो सारा काम काज छोड़कर सदर बाज़ार की मुख्य सड़क पर यातायात अवरुद्ध कर रहे थे । उसके बाद जेवरात और संपप्ति के लालचियों को थाने लाकर समझाईश दी गई, चूँकि पुलिस हस्तक्षेप लायक मामला नहीं था लिहाज चेतावनी देकर लोगों को छोड़ दिया गया । इधर पूरे मामले में तमाशाइयों के फुर्सत भरे लम्हों को सोचकर हंसी आती है । लोग अक्सर दूसरों के विवाद या घटनाक्रम में भीड़ का हिस्सा तो बन जाते हैं मगर उन्हें घटनाक्रम की वस्तु स्थिति की जानकारी नहीं होती । इस तरह की भीड़ अक्सर सामान्य माहौल बिगाड़ने में अहम् भूमिका निभाती है । साथ ही इस तरह के नंगों को बल देती है ।

                                      समाज के भीतर का खोखलापन और हम इंसानों की बदलती मनोवृत्ति का सबूत देती ये घटना उस हकीकत से भी वाकिफ़ करवाती हैं जहां एक ही कोख से जन्मी संताने ताउम्र एक दूसरे की दुश्मन बनी हुई हैं । विवादों की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं । एक बात और इस दौर में अपनापन, संवेदना जैसे शब्दों को लिए हम जब भी चेहरे तलाशने निकलेंगे हाथ खाली ही मिलेगा । एक घर, एक छत के नीचे रहकर लोग सिर्फ अपने लिए जी रहें हैं । कवि प्रदीप जी दशकों पहले लिख गए …

                                  राम के भक्त रहीम के बन्दे ,रचते आज फरेब के फंदे

कितने ये मक्कार ये अंधे ,देख लिए इनके भी फंदे

इन्ही की काली करतूतों से, बना ये मुल्क मसान

कितना बदल गया इंसान….आज भाई-भाई का नहीं, बेटा माँ-बाप की मौत की बाट जोहता मन के भीतर लालसा के पौधे की जड़ों को मजबूत कर रहा  । बीवी पति को लेकर अलग रहने को व्याकुल । क्यों आखिर ?

क्यूँ ये नर आपस में झगड़ते , काहे लाखों घर ये उजड़ते

क्यूँ ये बच्चे माँ से बिछड़ते….  सच ही तो है आखिर कहाँ पहुँच गए हम लोग, किस दौर में हैं जहां कोई अपना नहीं ?

loading...
loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

loading...