थ्री आईएएस

 SUNDAY_FILE_SDसरकार ने तीन युवा आईएएस अफसरों को गड़बड़तम सूची में डाल दिया है। इनमें दो जेन्स और एक महिला आईएएस शामिल हैं। बताते हैं, सरकार किसी की भी रहे, इनकी अब अच्छी पोस्टिंग नहीं मिलने वाली। इसलिए…., क्योंकि, उन्हें आईएएस लाबी भी पसंद नहीं करती। वैसे, एहतियात के तौर पर सरकार अब युवा आईएएस को आगाह कर जिलों में भेज रही है कि वे ठीक से काम करें वरना, चैथा नम्बर उनका हो सकता है। पिछले एक साल में जितने भी कलेक्टर बनें हैं, सबको तोता की तरह सीखा कर भेजा गया कि भैया आदत सुधारो, वरना, दोष मत देना। मगर दिक्कत यह है कि कुछ तो तोता की तरह रट भी रहे हैं, आदत सुधारो…..आदत सुधारो, और उधर आने दो, आने दो भी कर रहे हैं। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस लिस्ट में अगला नाम किसका एड होता है।

पेड़ के नीचे कलेक्टर

सरगुजा संभाग में एक पुराना पेड़ है। पेड़ के बारे में किवंदती है कि उसके नीचे बैठकर ध्यान लगाने से मन की मुराद पूरी हो जाती है। फिलहाल, पेड़ इस वजह से चर्चा में है कि एक कलेक्टर ने पेड़ के नीचे बैठकर घंटे भर ध्यान-मनन किया। बताते हैं, कलेक्टर की इच्छा भी पूरी हो गई। अब, कई कलेक्टर उस जगह का पता लगवा रहे हैं।

सिकरेट्री दो, परफारमेंस एक

मंत्रालय के दो सिकरेट्री के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं। एक प्रिंसिपल सिकरेट्री और दूसरा सिकरेट्री। एक नाम वाले हैं तो दूसरा बद-नाम वाले। सरकार के सामने संकट यह है कि नाम वाले का काम नजर नहीं आ रहा और बदनाम वाले आदत से बाज नहीं आ रहे। लिहाजा, अगले फेरबदल में दोनों उड़ जाएं, तो अचरज नहीं।

पीएचई में कितने दिन?

एक्साइज, ट्रांसपोर्ट की तरह पीएचई को भी खाओ-पीओ विभाग माना जाता है। पीएचई में 60 फीसदी से अधिक हैंड पंप कागजों में लग जाते हैं। बचा 40 फीसदी। इसमें रुलिंग पार्टी के नेता अपने प्रभाव के हिसाब से अपने-अपने इलाके में सेंक्शन करा लेते हैं। लेकिन, सरकार ने स्पेशल सिकरेट्री शहला निगार को इस विभाग की कमान सौंप दी है। शहला की खाओ-पीओ वाली छबि रही नहीं। नान में एक बार उनकी पोस्टिंग हुई थी। लेकिन, जल्द ही गिल्ली उड़ गई थी। जाहिर है, शहला पीएचई की स्क्रू टाईट करने की कोशिश करेगी। इस पर बवाल मचेगा। ऐसे में, सवाल तो उठते हैं, शहला कितने दिन पीएचई में रह पाएंगी। और यह भी कि सरकार ने आखिर ऐसा रिस्क क्यों लिया?

सरकार का पीएमयू

पीएमयू बोले तो प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट। नाम से लगता है, किसी प्रोजेक्ट को हैंडल करने वाली यूनिट। मगर ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ का पीएमयू सभी 27 जिलों में चल रहे डेवलपमेंट वर्क पर न केवल नजर रखता है, बल्कि इसका एक अहम काम कलेक्टरों के कामकाज का एसेसमंेट करना भी है। सीधी भाषा में कहें तो पीएमयू से कलेक्टरों की रैंकिंग तय होती है। पीएमयू में 10 का स्टाफ है। चिप्स में कंट्रोल रुम है। चिप्स का मतलब आप समझते ही हैं। यूनिट के पास कलेक्टरों की पूरी कंुडली होती है। इसकी फंक्शनिंग एक एग्जाम्पल के साथ आपको बताते हैं। कुछ दिन पहले एक बड़े जिले के कलेक्टर की रिपोर्ट आई….कलेक्टर हैं तो तेज, काम भी उन्हें आता है….मगर कुछ महीनों से वे बेहद सुस्त हो गए हैं….उनकी परफारमेंस रिपोर्ट 20 हो गई है। इसी तरह एक प्रमोटी कलेक्टर के बारे में पीएमयू की रिपोर्ट आई, कलेक्ट कुछ दिन रिचार्ज रहते हैं, फिर ठंडे पड़ जाते हैं। अच्छा होता सरकार इसी तरह का एक पीएमयू एसपी की भी बना लेती। कम-से-कम थानों में किसी गरीब की पीट-पीटकर जान तो नहीं ले ली जाती।

सिर्फ दो एसपी

मुलमुला थाने में दलित युवक की मौत के बाद एक दिन पीएचक्यू जाना हुआ। वहां एक बहुत बड़े पुलिस अफसर के साथ चर्चा छिड़ गई…..अधिकांश कलेक्टरों में काम को लेकर कांपिटिशन शुरू हो गया है, एसपी में क्यों नहीं। ये बहस इस बात पर जाकर एंड हुई कि पुलिस में पानी वाले अफसर ही नहीं हैं। जो हैं, वे इस जल्दी में हैं कि घर में कैसे अधिक-से-अधिक पेटी, खोखा जुटा ले। सो, आला अफसर ने मैदानी इलाके के अच्छे एसपी की गिनती शुरू की तो यह दो के आगे नहीं जा पाई। समझ सकते हैं कि पुलिस का क्या हाल है।

सिस्टम दोषी

अविभाजित मध्यप्रदेश में लोगों ने पन्नालाल और रुस्तम सिंह सरीखे एसपी देखा है। पन्नालाल के नाम से तो अपराधी कांपते थे। मगर अब ऐसे एसपी इतिहास की बात हो गए। असल में, पुलिस का सिस्टम ऐसा है कि सिर्फ तीन की चलती है। इंस्पेक्टर, एसपी और डीजीपी। आईपीएस की बात करें तो मजेदारी सिर्फ एसपी तक है। रेंज आईजी में मुश्किल से 15 परसेंट जलवा रह जाता है। पवनदेव और जीपी सिंह जैसे आईपीएस जरूर अपवाद हो सकते हैं। पीएचक्यू जाने के बाद तो स्थिति बहुत खराब हो जाती है। ट्रेन की टिकिट कटाने के लिए थानेदार नहीं मिलते। प्लेन की तो बात अलग है। पीएचक्यू में माल-मसालेदार पोस्टिंग होती हैं तो सिर्फ दो। खुफिया और प्लाानिंग एंड प्रोविजिनिंग। इसके अलावा सभी डीजीपी के बड़े बाबू होते हैं। जबकि, आईएएस में उल्टा है। आईएएस में एसडीएम से जो चालू होता है, रिटायरमेंट के आखिरी दिन तक गुंजाइश बनी रहती है। इसलिए, चतुर आईएएस जल्दीबाजी नहीं रहते। उन्हें मालूम है कि कलेक्टरी में बिना कहें जो महीना आ रहा है, उसे आने दो। छबि भी बनी रहेगी। बाकी तो सिकरेट्री बनने के बाद एक झटके में भरपाई हो जाएगी। फिर, सीएस बनने तक पांचों उंगली घी में रहनी है। मिनिस्ट्री आफ होम अफेयर को आईपीएस में भी एक सेवा सुधार आयोग बनना चाहिए। आईएएस की तरह आईपीएस में भी आखिरी दिन तक वाली व्यवस्था बन जाए, तो एसपी भी पेटी-खोखा की चिंता छोड़ काम करने लगेंगे।

दोनों को लाभ

राजधानी के एक होटल में कांग्रेस विधायक दल की बैठक हुई। इसमें हिस्सा लेने मैडम जोगी पहुंची तो आश्चर्यजनक ढंग से सबने उनका वेलकम किया। चरणदास महंत ने तो उन्हें आग्रहपूर्वक नेता प्रतिपक्ष के बगल में बिठाया। दरअसल, कांग्रेस ने अब रेणू जोगी के प्रति रणनीति बदल दी है। जोगी कांग्रेस बनने के बाद मैडम जोगी अगर बैठकों में जाती थी कि पार्टी के नेता असहज महसूस करते थे। लेकिन, अब नफे का सौदा लग रहा है। मैडम का हवाला देकर कांग्रेस नेता अब जोगी के साथ जाने वालो को अगाह कर रहे हैं, देखों अजीत जोगी को भरोसा नहीं है, इसलिए घर के एक मेम्बर को कांग्रेस में रख छोड़ा है तो आप लोग क्यों रिस्क ले रहे हैं। और, मैडम को कांग्र्रेस में रहने से जोगी कांग्रेस को वहां के फीडबैक मिलते रहते हैं। याने, फायदा दोनों ओर है।

शून्य बट्टा सन्नाटा

कांग्रेस पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष बनने के लिए शह-मात का खेल चल रहा है। चरणदास महंत से लेकर सत्यनारायण शर्मा, रविंद्र चैबे, धनेंद्र साहू, मोहम्मद अकबर, अमितेश शुक्ल जैसे कई नेताओं के नाम चल रहे हैं। और, उधर पार्टी में एक नेता का निलंबन समाप्त करने पर बवाल हो गया है। कांग्रेस नेता पूछ रहे हंै…. तो फिर अजीत जोगी क्या बुरा थें। जोगी के पास कम-से-कम कुछ वोट भी थे….उनके साथ एक वर्ग था। इधर तो शून्य बट्टा सन्नाटा है।

अंत मेें दो सवाल आपसे

1. किस कलेक्टर के दामाद को सरकार ने अनुसचित जनजाति आयोग का सदस्य बनाया है?
2. कांग्रेस के प्रभारी महासचिव हरिप्रसाद से पार्टी विधायक रामदयाल उइके की बंद कमरे में क्या बात हुई?

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