बाल मजदूरीः कानून से नहीं भरता पेट….

m..मजदूर तो मजदूर है…पेट के आगे मजबूर है..पेट मे आग लगती है…तो मासूम पैर पिता का साथ देने घर से निकल पड़ते हैं। सारे अधिकार पीछे छूट जाते हैं…यदि कुछ याद रह जाता है तो कर्तव्य और पेट की आग..कहने को तो सरकार ने नन्हें हाथों की लकीर बदलने के लिए कई अधिकार किताबों में लिख रखे हैं। उन तमाम अधिकारों में से एक है शिक्षा का अधिकार। इस अधिकार के पीछे शासन का उद्देश्य बहुत साफ है कि जीवन में शिक्षा को पहली प्राथमिकता मिले। क्या ऐसा हो रहा है। शायद नहीं…। इसके कई कारण हो सकते हैं। इन कारणों में प्रशासनिक लापरवाही के अलावा घर और पेट की मजबूरी भी छिपी है। यद्यपि शासन ने पेट और शिक्षा के रास्ते में आने वाले तमाम बधाओं को दूर करने बेहतर प्रबंध कर रखे हैं। बावजूद इसके बाल मजदूरी पर अंकुश हाल फिलहाल लगते हुए दिखाई नहीं दे रहा है। नन्हे मजदूरों की ही नहीं बल्कि उन कामगारों की भी स्थिति ठीक-ठाक नहीं दिखाई दे रही है। जिनके कुशल हाथों ने हमारी तामीर को नया आयाम दिया है।

                                          मजदूरों की बेहतर स्थिति और बाल मजदूरी पर रोक लगाने जैसे मुद्दों पर कई बार शासन और प्रशासन को बड़ी-बड़ी डींग हांकते हमने सुना है। कई बार जिम्मेदार अधिकारी और संगठनों को मजदूरों के हित में काम करने के लिए सम्मानित होते हुए भी देखा है। लेकिन संस्कारधानी बिलासपुर में बाल मजदूरों की हालत बहुत खराब है। ये बाल मजदूर चलती फिरती लाश की तरह शहर में जगह-जगह दिखाई दे जाते हैं। उन्हें कहीं ढूढने की जरूरत नहीं है।

                           बिलासपुर के चौक चौराहों और हॉटलों में बाल मजदूर जब ढूंढने निकला तो एक नहीं दस मजदूर दिखाई दिये। इनमें से ज्यादातर लोगों ने यही बताया कि गरीबी के कारण काम कर रहे हैं। सभी बाल मजदूरों का कहना है कि हम लोग घर चलाने के लिए काम कर रहे हैं। कम से कम भीख तो नहीं मांग रहे हैं। सीजी वाल ने जिन मजदूरों से बातचीत की उनमें से ज्यादातर लोग 15-17 साल के बीच के हैं। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है और पैसा हमारे पास है नहीं। जब घर में खाने के लिए कुछ ना हो तो पढाई का खर्च हमारे माता पिता कैसे उठाएंगे। इसलिए हम घर से शहर आते हैं जो भी काम मिलता है करते हैं। बाल मजदूरों ने बताया कि दिन भर हड्डी तोड़ मेहनत के बाद उन्हें 150 से 250 के बीच रूपए मिल जाते हैं। जिसके बाद घर आराम से चलता है।

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                   सीजी वाल ने देखा जिस काम को वयस्क लोग करते हैं उसी काम को बाल मजदूर भी करते हैं। लेकिन भुगतान के समय सेठ भेदभाव करता है। बाल मजदरी करने वाला एक लड़के ने बताया कि हम काम तो बड़ों का करते हैं लेकिन भुगतान के समय सेठ हमें बालक समझकर वयस्क मजदूरों की तुलना में आधा दाम देता है। फिर भी हम लें लेते हैं। यदि कभी इंकार किया तो पैसे का मिलना तो दूर उल्टी गाली और मार मिलती है। चूंकि हमारा सुनने वना कोई नहीं है। इसलिए मजबूरी में जो कुछ मिलता है ले लेते हैं।

                           कहने को तो प्रदेश में बाल मजदूरी पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध है। नए नियम के अनुसार सरकार ने 14 साल के घर के बच्चों से निजी व्यवसाय और घरेलु कामकाज में सहयोग लिया जा सकता है। पूंजीपतियों इसका जमकर फायदा उठा भी रहे हैं। जब कोई लेबर इंस्पेक्टर जांच पर पहुंचता है तो मालिक उसे घर का लड़का बताकर खुद को बचा लेता है। यदि ऐसा नहीं है तो इंस्पेक्टर केवल मालिक से मिलकर बिना कार्रवाई किए लौट जाता है।

                                   जबकि स्पष्ट कानूनी आदेश है कि ऐसे किसी स्थान पर जहां खतरे की संभावना ज्यादा है वहां बाल मजदूरी कानूनी की नजर में अपराध है। साथ ही हमारे संविधान में सबको शिक्षा और सबको ज्ञान अर्जित करने का भी उल्लेख है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले श्रमिक विद्यालय भी चलाया। इस विद्यालय में गरीब और सर्वहारा वर्ग के बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की गई थी। की गयी थी हम इसलिए कह रहे हैं कि अब इस व्यवस्था पर प्रदेश सरकार ने ताला लगा दिया है। बहरहाल इस मुद्दे को लेकर आंदोलन चल रहा है। निष्कर्ष समय के गर्भ में छिपा हुआ है।

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                  लेकिन यह सच है कि सिर्फ कानून बना देने से कुछ होने जाने वाला कुछ नहीं है। श्रम अधिकारी एसी से निकलते नहीं। बालमजदूर पेट की आग के आगे धूप से डरते नहीं। यही कारण है कि बाल मजदूरी पर प्रतिबंध अब तक नहीं लग पाया है। अधिकारी अपने लालच के आगे मजबूर हैं तो गरीब पेट की आग को शांत करने के लिए मजबूर है।

माली हालत ठीक नहीं… घर की माली हालत ठीक नहीं है। मौका मिलता है तो किताब पढ़ लेता हूं। मां और बाप इतना नहीं कमा पाते कि घर चल सके। इसलिए पढ़ाई के लिए मजदूरी करता हूं। जब पेट में कुछ नहीं होगा तो पढ़ाई कहां से होगी। मेरे माता पिता बहुत गरीब हैं। उनकी सहायाता के लिए मजदूरी करता हूं। सब कहने को है कि सरकार मुफ्त में शिक्षा देती है। यदि देती तो मै मजदूरी क्यों करता है।

                                                                                                                           विनोद कुमार..बाल मजदूर…मदनपुर

 मां के लिए करता हूं काम-  मेरी उम्र 16 साल है। घर में खाने को नही है।मां बीमार रहती है। मैने इस साल ही पढ़ाई छोड़ी है। काम का दाम मुझे ठीक से नहीं मिलता। मेरे साथ मारपीट हमेशा होती है। घर जाता हूं तो चूल्हा जलता है। मेरी पढ़ने की इच्छा होती है जब पैसे नहीं है तो क्या पढूं.

                                                                                                                                  चंद्र प्रकाश..बाल मजदूर

मजदूरी से चलता है मेरा घर—पढ़ाई में मन लगता था इसलिए मजदूरी करने लगा। काम के दौरान रोज गाली मिलती है। लेकिन काम करना पड़ता है। काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या। शिक्षा का अधिकार के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। और ना ही बाल मजदूरी के बारे में पता है। मै इतना जानता हूं कि मजदूरी से मेरा घर चलता है।

                                    .                                                                                               विकास यादव..बाल मजदूर

 बाल मजदूरी सामाजिक अभिशाप—bhaiyalalबाल मजदूरी सामाजिक अभिशाप है। कानून की नजर में बाल मजदूरी करवाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी।मुझ तक शिकायत यदि पहुंचेगी कि बाल मजदूरी कराई जा रही है। तो मै कठोर कार्रवाई का वादा करता हूं। मै बाल मजदूरी की पीड़ा को अच्छी तरह से जानता हूं। बहुत कष्ट होता है। बच्चों के हाथ में कलम और किताब अच्छे लगते हैं। गैंती और फावड़ा नहीं। आप मुझको बताएं कहां हो रही है बाल मजदूरी। मै कार्रवाई करूंगा।

                                                                                            भैयालाल रजवाड़े..श्रम मंत्री

                             यह सुनकर अटपटा लगा कि मंत्री महोदय को बाल मजदूरी के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है।जबकि वे राजनीति में आने से पहले चर्चा कालरी में श्रमिक थे। कालरी का कर्मचारी यदि कहे कि मुझ तक बाल मजदूरी की शिकायत नहीं पहुंची है। कुछ हास्यास्पद सा लगता है। सीजी वाल साहस के साथ कहता है कि यदि कहीं बाल मजदूरी होती है तो सबसे ज्यादा कालरी क्षेत्र में ।

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