तारीख रीडर नहीं…बल्कि न्यायधीश करें-जस्टिस गुप्ता

high court me do divasiya karyashala  (2) बिलासपुर—-न्यायिक अधिकारी आम जनता के सेवक बनकर काम करें। पेशियों की तारीख रीडर नहीं बल्कि खुद जस्टिस करें। मामले की सुनवाई कब, कितनी देर तक करनी है इसका फैसला भी खुद करें। यह बातें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने प्रदेश न्यायिक अधिकारियों की दो दिवसीय कार्यशाला उद्घाटन के दौरान कही। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जज को अपनी अदालत पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए।

                            छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सभागार में शनिवार से प्रदेश भर के न्यायिक अधिकारियों की दो दिवसीय कार्यशाला शुरू हुई। उद्घाटन सत्र में  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट चीफ जस्टिस थोट्टाथिल भास्करन नायर राधाकृष्णन, आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के जज जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम विशेष रूप से मौजूद थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मुख्य अतिथि दीपक गुप्ता ने न्यायिक अधिकारियों से कहा कि जज को अपनी छवि का ध्यान रखना होगा। उनका फैसला पक्षपात रहित और निर्भीक होना चाहिए। एक जज को अखंडता, ईमानदारी, समझौता से दूर भ्रष्टाचार के विरुद्ध शून्य सहिष्णु होना चाहिए। कानून की किताबों के अलावा उन्हें अध्ययन के लिए समय निकालना चाहिए। क्योंकि निर्णय तो कानून की किताबों को देखकर दिया जा सकता है पर न्याय देने के लिए संवेदनशीलता अध्यय़न से मिलती है।

                         जस्टिस गुप्ता ने कहा कि न्यायिक अधिकारी अपनी अदालत की प्रत्येक गतिविधि के लिए जिम्मेदार होता है। high court me do divasiya karyashala  (3)किसी भी मामले में आरोपों का निर्धारण करते समय जज को उस केस की पूरी फाइल पढ़नी चाहिए। वकील या अभियोजक के ऊपर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अदालतों में जो लोग आते हैं उनके साथ आपको सामान्य शिष्टाचार का बर्ताव करना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि एक फरियादी के पास न्याय पाने का अधिकार है। अधिकार देश के संविधान से मिला है।

                       जस्टिस गुप्ता ने कहा कि प्रदेश की निचली अदालतों में करीब 2 लाख 19 हजार केस हैं और प्रदेश में जजों की संख्या 350 है। औसतन एक कोर्ट में 6-7 सौ केस हैं, जो देश के औसत एक हजार से कम है। इसलिए काम के दबाव में फैसले की गुणवत्ता प्रभावित होने की बात यहां लागू नहीं होती।

             छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थोट्टाथिल भास्करन नायर राधाकृष्णन ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को सर्विस मोड में रहना चाहिए। उन्हें न्याय की गरिमा और संविधान के मूल्यों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। उनके फैसलों में मानवीय संवेदनाओं को स्थान होना चाहिए।

न्यायिक अकादमी निगरानी समिति के चेयरमेन जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने स्वागत भाषण दिया। आभार प्रदर्शन जस्टिस मनीन्द्र मोहन श्रीवास्तव ने किया।

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