गजेन्द्र मोक्ष कथा का भक्तों ने लिया आनंद..नंदलाल का किया जयघोष

IMG-20170616-WA0008बिलासपुर—-ग्राम जलसो में श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह चल रहा है। शुक्रवार को पं. अनिल शर्मा ने गजेंद्र मोक्ष, समुंद्र मंथन और श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग का वर्णन किया। पं. शर्मा ने कहा कि जब-जब संसार में भक्तों पर विपदा आई, भगवान श्रीमन्न नारायण ने किसी न किसी रूप में अवतार लिया।  दुष्टों का संहार करते हुए भक्तों की रक्षा की है। गजेंद्र मोक्ष की वृतांत पेश कर पंडित शर्मा ने कहा कि गज और ग्राह के बीच युद्ध में भगवान ने गज की पुकार सुनकर उसकी रक्षा की।

              श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के चौथे दिन सर्व प्रथम गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन किया गया । पं. शर्मा ने कहा कि गज एक सरोवर में स्नान करता है। काल रूपी ग्राह उसके पैरों को पकड़ लेता है। गज अपनी तरफ खींचता है और ग्राह अपनी तरफ …। गज अपने पत्नी, बच्चों को सहायता के लिए पुकारता है।  लेकिन कोई मदद नहीं करता। गज असहाय होकर कहता है कि भगवान के अलावा मुझे कोई और नहीं बचा सकता। भगवान गज को ग्राह से बचाकर मुक्त कराते हैं।

                पंडित शर्मा ने कहा मनुष्य संसार रूपी सरोवर में स्नान करता है। एक दिन काल पैरों को पकड़ता है। कोई परिवार नहीं बचा पाता। तब मालूम होता है कि ईश्वर ही उसकी रक्षा कर सकते हैं। समुद्र मंथन की कथा वर्णन करते हुए महाराज ने कहा समुद्र से अमृत के प्याले से जुड़ी है। जिसे पीने के लिए देवताओं और असुरों में विवाद हो गया था। खोई प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए इंद्र भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं। उनकी सलाह पर वह क्षीर सागर का मंथन करने के लिए तैयार हुए। मंदार पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से समुद्र मंथन की तैयारी हुई। मंदार पर्वत के चारों ओर सर्प वासुकी को लपेटकर मंथन हुआ। क्षीर सागर में अमृत मंथन के दौरान सागर से सिर्फ अमृत का प्याला ही नहीं और भी बहुत सी चीजें निकली। जिनका वितरण देवताओं और असुरों में बराबर हुआ।

            पंडित अनिल शर्मा ने कहा मंथन के दौरान सबसे पहले विष का प्याला, हलाहल निकला। जिसे ना तो देवता ग्रहण करना चाहते थे और ना ही असुर। विष इतना खतरनाक था कि ब्रह्मांड का विनाश कर सकता था। हलाहल विष को ग्रहण करने के लिए भगवान शिव आए। शिव ने विष का प्याला पी लिया लेकिन माता पार्वती, ने उनके गले को पकड़ लिया। विष अंदर तक नहीं पहुंच पाया। विष उनके गले में रह गया. जिसके कारण भगवान का गला नीला हो गया। भोेलेनाथ का नाम नीलकंठ पड़ गया। कथा के दौरान शिवकुमार तिवारी, कार्तिकेश्वर शुक्ला, कमलेश पांडेय, महेश कश्यप, ओमप्रकाश कश्यप, प्राची सिंह ठाकुर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

कृष्ण जन्मोत्सव की सजी झांकी

     पंडाल में कृष्ण जन्मोत्सव की झांकी सजाई गयी। श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ के दौरान भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव श्रद्धा और उत्साह के मनाया गया। पं.संतोष दुबे वसुदेव बने। इस दौरान कथा परिसर भगवान श्री कृष्ण के जयकारों गूंज गया। भक्तों ने समूह में गायन किया…नंद के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की गाया।

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